संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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महिषासुरने भैंसेका रूप धारण करके देवीके
गणोंको त्रास देना आरम्भ किया ॥ २१ ॥ किन्हींको
थूथुनसे मारकर, किन्हींके ऊपर खुरोंका प्रहार
करके, किन्हीं-किन्हींको पूँछसे चोट पहुँचाकर,
कुछको सींगोंसे विदीर्ण करके, कुछ गणोंको
वेगसे, किन्हींको सिंहनादसे, कुछको चक्कर देकर
और कितनोंको निःश्वास वायुके झोंकेसे धराशायी
कर दिया ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार गणोंकी सेनाको
गिराकर वह असुर महादेवीके सिंहको मारनेके
लिये झपटा। इससे जगदम्बाको बड़ा क्रोध
हुआ ॥ २४ ॥ उधर महापराक्रमी महिषासुर भी
क्रोधमें भरकर धरतीको खुरोंसे खोदने लगा तथा
अपने सींगोंसे ऊँचे-ऊँचे पर्वतोंको उठाकर फेंकने
और गर्जने लगा ॥ २५ ॥ उसके वेगसे चक्कर देनेके
कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी
पूँछसे टकराकर समुद्र सब ओरसे धरतीको डुबोने
लगा ॥ २६ ॥ हिलते हुए सींगोंके आघातसे विदीर्ण
होकर बादलोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके
श्वासकी प्रचण्ड वायुके वेगसे उड़े हुए सैकड़ों
पर्वत आकाशसे गिरने लगे ॥ २७॥ इस प्रकार
क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्यको अपनी ओर आते
देख चण्डिकाने उसका वध करनेके लिये महान्
क्रोध किया ॥ २८ ॥ उन्होंने पाश फेंककर उस
महान् असुरको बाँध लिया। उस महासंग्राममें बँध
जानेपर उसने भैंसेका रूप त्याग दिया ॥ २९ ॥
और तत्काल सिंहके रूपमें वह प्रकट हो गया।
उस अवस्थामें जगदम्बा ज्यों ही उसका मस्तक
काटनेको उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी
पुरुषके रूपमें दिखायी देने लगा ॥ ३० ॥ तब
देवीने तुरंत ही बाणोंकी वर्षा करके ढाल और
तलवारके साथ उस पुरुषको भी बींध डाला।
इतनेमें ही वह महान् गजराजके रूपमें परिणत हो
गया ॥ ३१ ॥ तथा अपनी सूँड़से देवीके विशाल
सिंहको खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय
देवीने तलवारसे उसकी सूँड़ काट डाली ॥ ३२ ॥
तब उस महादैत्यने पुनः भैंसेका शरीर धारण कर
लिया और पहलेकी ही भाँति चराचर प्राणियोंसहित