संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । राजोवाच ॥ ३९ ॥
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥ ४० ॥
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां बिना।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३ ॥ ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४ ॥ जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
वैश्य बोला- ॥ २९ ॥ आप मेरे विषयमें जो अयं च निकृतः १ पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥
बात कहते हैं, वह सब ठीक है ॥ ३० ॥ किंतु क्या स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।
करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥ ४३ ॥
जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
पत्तिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४ ॥
तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ ४५ ॥
प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते ! गुणहीन राजा ने कहा - ॥ ३९ ॥ भगवन् ! मैं आपसे
बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥ ४० ॥
प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बातको मैं मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात
जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी मेरे मनको बहुत दुःख देती है। मुनिश्रेष्ठ ! जो
साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित राज्य मेरे हाथसे चला गया है, उसमें और उसके
हो रहा है॥ ३१-३३॥ उन लोगोंमें प्रेमका सम्पूर्ण अङ्गोंमें मेरी ममता हो रही है ॥ ४१ ॥ यह
सर्वथा अभाव है तो भी उनके प्रति जो मेरा मन जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है,
निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ॥ ३४ ॥ अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दुःख होता है;
मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥ यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥ ३६॥ होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्योंने
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । इसको छोड़ दिया है ॥ ४२ ॥ स्वजनोंने भी इसका
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथाई तेन संविदम् ॥ ३७॥ परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदयमें
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥ उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा
'मार्कण्डेयजी कहते हैं- ॥ ३५ ॥ ब्रह्मन् ! मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं ॥ ४३ ॥ जिसमें प्रत्यक्ष
तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे
नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है।
सेवामें उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें
न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेकशून्य
वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता
किया ॥ ३६-३८ ॥ प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥ ४४-४५ ॥
१. पा०- निष्कृतः । २. पा०- तत्किमेतन् ।