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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 296 में से

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पृष्ठ 187
  • देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध * १८७
    अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ १८ ॥
    इस प्रकार देवताओंके वचन सुनकर भगवान्
    विष्णु और शिवने दैत्योंपर बड़ा क्रोध किया।
    उनकी भौंहें तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया ॥ ९ ॥
    तब अत्यन्त कोपमें भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णुके
    मुखसे एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार
    ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओंके
    शरीरसे भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब
    मिलकर एक हो गया ॥ १०-११॥ महान् तेजका
    वह पुञ्ज जाज्वल्यमान पर्वत सा जान पड़ा। देवताओोंने
    देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त
    हो रही थीं ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण देवताओंके शरीरसे प्रकट
    हुए उस तेजकी कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित
    होनेपर वह एक नारीके रूपमें परिणत हो गया
    और अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंमें व्याप्त जान
    इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः ।
    पड़ा ॥ १३ ॥ भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे
    चकार कोपं शम्भुश्च भुकुटीकुटिलाननौ ॥ ९ ॥
    उस देवीका मुख प्रकट हुआ। यमराजके तेजसे
    ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
    उसके सिरमें बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान्‌के
    निष्क्रान्तं महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च ॥ १० ॥
    तेजसे उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं ॥ १४॥ चन्द्रमाके
    अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः ।
    निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ ११ ॥
    अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
    ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वाला व्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२ ॥
    अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् ।
    एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ १३ ॥
    यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजयत तन्मुखम् ।
    याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ १४ ॥
    सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
    वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ १५ ॥
    ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा ।
    वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ १६ ॥
    तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा ।
    नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ १७॥
    भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।