लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२१
व्याख्या—अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। समासः—परस्य
सवर्णः = परसवर्णः, षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अथवा पर इति लुप्तषष्ठी कं पृथक् पदम्,
सवर्ण इति तु स्वरितत्वादधिकृतम् । अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर (अनुस्वारस्य)
अनुस्वार के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता है। भाव—सब वर्गस्थ
वर्ण तथा अन्तःस्थ वर्ण यय् प्रत्याहार के अन्दर आ जाते हैं; इन के परे होने पर
अनुस्वार को पर अर्थात् यय् का सवर्ण आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा—
शान्तः (शान्त वा नष्ट) । ‘शाम्+त’ [शमुँ उपशमे (दिवा०), क्तः, वा
दान्तशान्तेत्यादिनिपातनान्नेट्, अनुनासिकस्य क्वीति दीर्घः।] यहां नश्चापदान्तस्य
झलि (७८) सूत्र से अपदान्त मकार को अनुस्वार हो ‘शांत’ ऐसा बना; अब इस सूत्र
से तकार यय् परे होने पर अनुस्वार को पर-सवर्ण करना है। तकार के सवर्ण—‘त्,
थ्, द्, ध्, न्’ ये पञ्च वर्ण हैं। इन में नासिकास्थान के सादृश्य के कारण अनुस्वार
के सदृश वर्गपञ्चम नकार है, अतः अनुस्वार को नकार हो कर विभक्ति लाने से
‘शान्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ग का पञ्चम ही अनुस्वार को
परसवर्ण होगा।
इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा—१. अन्+कित = अंकित = अङ्कितः ।
२. अन्+चित = अंचित = अञ्चितः । ३. कुन्+ठित = कुंठित = कुण्ठितः । ४.
दाम्+त = दांत = दान्तः । ५. गुम्+फित = गुंफित = गुम्फितः । ६. मुन्+क्ते
= मुं+क्ते = मुङ्क्ते । ७. गम्+ता = गं+ता = गन्ता । इत्यादि ।
यहां ‘यय्’ ग्रहण स्पष्टार्थ है। यय् ग्रहण न करने से भी कोई दोष नहीं आ
सकता । तथाहि—आक्रंस्यते, दंशनम्, अंहिपः इत्यादि प्रयोगों में रेफोष्मणां सवर्णा न
सन्ति इस वचन के कारण परसवर्ण नहीं होगा तथा अचों के परे होने पर तो अनु-
स्वार ही नहीं मिल सकेगा ।
इस सूत्र का ‘य्, व्, र्, ल्’ के परे होने पर यद्यपि कोई उदाहरण नहीं
तथापि अग्रिम वा पदान्तस्य (८०) सूत्र में इन का उपयोग दिखाया जायेगा ।
नोट—ग्रन्थकार ने इस सूत्र की वृत्ति [जो सूत्र पर संस्कृत में उसका अर्थ
लिखा होता है उसे ‘वृत्ति’ कहते हैं] नहीं लिखी; केवल ‘स्पष्टम्’ लिखा है। इसका
आशय यह है कि इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है अर्थात् इस सूत्र में अन्य किसी सूत्र के पद
की अनुवृत्ति नहीं आती । यह सूत्र ही अपनी आप वृत्ति है। एवमन्यत्र भी समझ लेना
चाहिये।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(८०) वा पदान्तस्य ।८।४।५८॥
(पदान्तस्यानुस्वारस्य ययि परे परसवर्णो वा स्यात्) । त्वङ्करोषि,
त्वं करोषि ॥
अर्थः—यय् परे हो तो पदान्त अनुस्वार को विकल्प कर के परसवर्ण हो।
व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम् । पदान्तस्य ।६।१। अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१।
परसवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से)। अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर
१२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(पदान्तस्य) पदान्त (अनुस्वारस्य) अनुस्वार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के
(पर-सवर्ण) परसवर्ण आदेश होता है। यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है, अतः पूर्वे-
सूत्र अपदान्त अनुस्वार को और यह पदान्त अनुस्वार को यय् परे होने पर परसवर्ण
करेगा। उदाहरण यथा--
त्वङ्करोषि त्वं करोषि (तू करता है)। 'त्वम् + करोषि' यहां 'त्वम्' इस
पद के अन्त्य मकार को मोऽनुस्वार (७७) सूत्र से अनुस्वार हो कर 'त्वं + करोषि'
बना। अब इस सूत्र से पदान्त अनुस्वार को पर = ककार का सवर्ण ङकार करने
से--त्वङ् करोषि। परसवर्णभावपक्ष मे--त्वं करोषि। [पर = ककार के 'क्, ख्,
ग्, घ्, ङ्' ये पाञ्च सवर्ण हैं, स्थानकृत आन्तर्य से ककार का सवर्ण ङकार ही
होगा।]। इसी प्रकार--
तङ् क्यञ् चित्रपक्षण् डयमानन् नभस्थम् पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णपक्षे] ।
तं कथं चित्रपक्षं डयमानं नभस्थं पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णभावे] ।
'य्, व्, ल्' वर्ण सानुनासिक और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते हैं,
यह हम पीछे सञ्ज्ञा-प्रकरण मे बता चुके हैं। य्, व्, ल् के परे होने पर अनुस्वार के
स्थान पर स्थानी अनुस्वार के अनुनासिक होने से स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा सानु-
नासिक यँ, वँ, लँ ही होंगे। यथा -- १ सम् + वत्सर = स + वत्सर = सवँवत्सर ।
२ दानम् + यच्छति = दान + यच्छति = दानयँ यच्छति । ३ अहम् + लिखामि = अह
- लिखामि - अहल्लिखामि । रेफ के परे रहते पदान्त अनुस्वार को परसवर्ण नही
होता क्योकि रेफ का कोई सवर्ण नही--कुलं रोदिति ।
यहा यह विशेष ज्ञातव्य है कि मोऽनुस्वार (७७) से विहित अनुस्वार यद्यपि
सामान्यतः प्रकृतसूत्र से वैकल्पिक परसवर्ण को प्राप्त होता है तथापि र्, श्, ष्, स्, ह् के
परे होने पर वह परसवर्ण को प्राप्त नही होता अनुस्वार अनुस्वार ही रहता है। यथा--
कुलं रोदिति । शिशुं शाययति । तं षट्पदमपश्य । मित्रं सान्त्वयति । शत्रुं हन्ति । कारण--
रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति, किञ्च श्, ष्, स्, ह्, यय्प्रत्याहार मे भी नही आते ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्-- (८१) मो राजि समः क्वौ ।।८।३।२५।।
क्विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् । सम्राट् ॥
अर्थ--क्विबन्त राज् धातु परे हो तो सम् के मकार को मकार ही हो ।
व्याख्या--सम् ६।१। मः ६।१। (मोऽनुस्वार से)। म १।१। मकारादकार
उच्चारणार्थः । क्वौ ७।१। राजि ७।१। क्विप् (प्) यह प्रत्यय है । प्रत्ययग्रहणे तदन्त-
ग्रहणम्--इस परिभाषा के अनुसार व्याकरण मे जहा २ प्रत्यय का ग्रहण होता है
वहा २ तदन्त अर्थात् वह प्रत्यय जिस के अन्त मे होता है ऐसे शब्दसमूह (प्रकृति +
प्रत्यय) का ग्रहण किया जाता है। इस नियम के अनुसार क्विन् से तदन्त-विधि हो
कर 'क्विबन्त' बन जायेगा । अर्थ --(क्वौ) क्विबन्त (राजि) राज् धातु परे हो
तो (सम्) सम् के (म) मकार के स्थान पर (म) मकार आदेश होता है ।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२३
'सम्' यह अव्यय होने के कारण सुबन्त होने से पद-सञ्ज्ञक है। इस के मकार
को क्विबन्त 'राज़्' धातु परे होने पर मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार प्राप्त था।
इस सूत्र से सम् के मकार को मकार किया गया है; इसका अभिप्राय यह है कि
मकार, मकार ही बना रहे अनुस्वार न हो जाये। उदाहरण यथा—
सम् + राट् [चक्रवर्ती राजा। राजृ दीप्तौ (भ्वा०) इत्यस्मात् सत्सूद्विष० इति
क्विपि, क्विव्लोपे, नावागते हल्ङ्याब्भ्यः—इति सोर्लोपे, पदान्ते व्रश्चभ्रस्ज० इति षत्वे,
डत्वे, अवसाने चत्त्वे च कृते 'राट्' इति सिध्यति।] यहां रेफ-हल् के परे रहते मकार
को मोऽनुस्वारः (७७) सूत्र के अनुसार प्राप्त था जो अब प्रकृतसूत्र से नहीं होता,
इस तरह 'सम्राट्' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार—सम्राजी, सम्राजः, सम्राजम्,
सम्राजा। सम्राजो भावः—साम्राज्यम्।
क्विबन्त कहने से 'सम् + राजते = संराजते' में अनुस्वार हो जाता है।
नोट—'सम्राज्ञी' शब्द वेद में देखा जाता है (सम्राज्ञी श्वशुरे भव—ऋ०
१०.४६) परन्तु लोक में यह शब्द चिन्तनीय है; 'राज्ञी' की सिद्धि कर के 'सम्' में
योग होने पर क्विबन्त न होने से 'म्' नहीं हो सकता। अथवा 'सम्राज्' शब्द से भी
ङीप् नहीं हो सकता। तब स्त्रीलिङ्ग में भी 'सम्राट्' ही रहेगा।
[लघु०] विधि-सूत्रम् (८२) हे मपरे वा ॥८।३।२६॥
मपरे हकारे मस्य मो वा। किम्ह्मलयति, किं ह्मलयति ॥
अर्थः—जिस हकार से परे मकार हो, उस हकार के परे होने पर मकार के
स्थान पर विकल्प कर के मकार होता है।
व्याख्या—मपरे। ७।१। हे। ७।१। मः। ६।१। (मोऽनुस्वारः से)। मः। १।१। (मो राजि
समः क्वौ से)। वा इत्यव्ययपदम्। समासः—मः परो यस्मादसौ मपरस्तस्मिन् =
मपरे। बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(मपरे) मकार परे वाले (हे) हकार के परे होने
पर (मः) मकार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (मः) मकार आदेश हो जाता
है। यह सूत्र मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है।
उदाहरण यथा—'किम् + ह्मलयति' [क्या चलाता वा हिलाता है ? ह्मल
चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ मित्त्वाद् ह्रस्वः] यहां मकार परे वाला हकार परे है अतः
मकार को मकार अर्थात् अनुस्वाराभाव हो—किम्ह्मलयति। पक्ष में मोऽनुस्वार. (७७)
से अनुस्वार हो—किं ह्मलयति। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी तरह—
कथम्ह्मलयति, कथं ह्मलयति इत्यादि रूप होते हैं।
[लघु०] वा०—(१३) यवलपरे यवला वा ॥
कियँ् ह्यः, किं ह्यः। किव्ँ ह्वल्यति, किं ह्वल्यति। किलँ् ह्लादयति,
किं ह्लादयति ॥
अर्थः—यकार, वकार, अथवा लकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के
स्थान पर क्रमशः विकल्प कर के यकार, वकार तथा लकार हो जाते हैं।
१२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या—यवलपरे ।७।२। हे ।७।२। (हे म्परे वा से)। म ।६।३। (मोऽनु-
स्वारः मे)। यवला ।१।३। वा इत्यव्ययपदम्। समास —यश्च वश्च लश्च = य-व-ला,
इतरेतरद्वन्द्व । एष्वकार उच्चारणार्थ । यवला परा यस्मादसौ यवलपरस्तस्मिन् =
यवलपरे। बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(यवलपरे) य्, व्, ल्, परे वाले (हे) हकार के
परे होने पर (म ) म् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (यवला ) यकार, वकार,
लकार हो जाते। यह वार्त्तिक मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। जिस
पक्ष मे 'य्, व्, ल्' नही होगे उस पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो जायेगा।
यहा यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) से आदेश और निमित्तो को क्रमश समझ लेना
चाहिये। अर्थात् यकार परे वाला हकार परे होगा तो मकार को यकार, वकार परे
वाला हकार परे होगा तो मकार को वकार तथा लकार परे वाला हकार परे होगा
तो मकार को लकार आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'किम् + ह्य' (कल क्या था ?) यहा यकार परे वाला हकार परे है अत.
मकार को विकल्प कर के यकार होगा। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से यकार
दो प्रकार का होता है। यहा स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक मकार को वैसा
ही अनुनासिक यकार हो कर—किंयँ ह्य । पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार
हो कर 'किं ह्य' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए।
'किम् + ह्वलयति' [क्या हिलाता है ? ह्वल चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ
मित्त्वाद् ह्रस्व] यहा वकार परे वाला हकार परे है अत मकार को विकल्प कर के
अनुनासिक वकार होकर—किंवँ ह्वलयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार
हो कर—'किं ह्वलयति' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए।
'किम् + ह्लादयति' (कौन वस्तु प्रसन्न करती है?) यहा लकार परे वाला
हकार परे है। अत मकार को विकल्प कर के अनुनासिक लकार हो कर—किंलँ
ह्लादयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर—'किं ह्लादयति' ये दो
रूप सिद्ध होते हैं।
इसी प्रकार १ मित्रंलँ ह्लादते, मित्रं ह्लादते। २ इदंयँ ह्यस्तनम्, इदं
ह्यस्तनम्। ३. किंवँ ह्वयतु, किं ह्वयतु। इत्यादि।
नोट—सर्वत्र कौमुदीग्रन्थो मे यहा मकार के स्थान पर अनुनासिक 'यँ, वँ,
लँ' ही मुद्रित प्राप्त होते हैं। टीकाकारो का कथन है कि 'य्, व्, ल्' अनुनासिक
और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते है। यहा अनुनासिक मकार के स्थान
पर दोनो के प्राप्त होने पर स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक यकार वकार लकार
ही होते हैं। परन्तु शेखरकार नागेशभट्ट ने इस मत का खण्डन किया है। उन का
कथन है कि 'य्, व्, ल्' यहा विधान किये गये हैं। विधीयमान अण् अपने सवर्णियो
के ग्राहक नहीं होते [देखो—अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११)]। अत यहा अनु-
नासिक 'य्, व्, ल्' नही हो सकेंगे किन्तु जैसे विधान किये गये हैं वैसे निरनुनासिक
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२५
ही होंगे । यथा—'मतुँप्' के अनुनासिक मकार के स्थान पर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽ-
यवादिभ्यः (१०६२) से अनुनासिक वकार नहीं होता किन्तु निरनुनासिक वकार ही
होता है वैसे यहां पर भी करना चाहिये । अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (११६),
संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः (८१७) इत्यादि सूत्रों के 'अर्थवत्' 'यण्वतः' आदि शब्दों
में आचार्य पाणिनि ने स्वयं भी मतुँप् के अनुनासिक मकार के स्थान पर अनुनासिक
वकार नहीं किया इस से भी यही सिद्ध होता है कि आचार्य विधीयमान अण् के
सवर्णग्रहण के पक्ष में नहीं हैं। कौमुदीपक के समर्थकों का कथन है कि ऋत उत्
(२०८) में 'उ' विधीयमान है वह अपने सवर्णियों का ग्रहण नहीं करा सकता, तो
पुनः इसे क्यों मुनि ने तपर किया है ? अतः इस से प्रतीत होता है कि विधीयमान
भी अण् कहीं-कहीं अपने सवर्णियों का ग्रहण कराते हैं । इस विषय का विस्तृत विचार
हमारे नवीन मुद्रित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन में पृष्ठ (२६०) पर देखें ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(८३) नपरे नः ।८।३।२७॥
नपरे हकारे (परे) मस्य नो वा। किन्ह्नुते किं ह्नुते ॥
अर्थः—नकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के स्थान पर विकल्प कर
के नकार हो जाता है
व्याख्या—नपरे ।७।१। हे ।७।१। (हे मपरे वा से) । मः ।६।१। (मोऽनुस्वारः
से)। नः ।१।१। (नकारादकार उच्चारणार्थः) । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) ।
समासः—नः परो यस्मात् स नपरस्तस्मिन् = नपरे । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः—
(नपरे) नकार परे वाला (हे) हकार परे हो तो (मः) म् के स्थान पर (वा) विकल्प
कर के (नः) न् आदेश हो जाता है। यह सूत्र भी मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक
अपवाद है। पक्ष में मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'किम् + ह्नुते' (क्या छिपाता है ?) यहां नकार परे वाला हकार परे है अतः
प्रकृतसूत्र (८३) से मकार को वैकल्पिक नकार होकर—किन्ह्नुते । पक्ष में मोऽनुस्वारः
(७७) से अनुस्वार हो कर 'किं ह्नुते' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए ।
इसी प्रकार—१. कथन्ह्नुते, कथं ह्नुते । २. यन्ह्नुते, यं ह्नुते । ३. तन्
ह्लोतुम्, तं ह्लोतुम् । ह्नुङ् अपनयने (अदा०) के सिवाय अन्य धातु के उदाहरण
यहां दुर्लभ हैं।
अभ्यास (२०)
(१) निम्नलिखित रूपों में सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धिच्छेद करें—
१. तपांसि । २. भूमिङ् खनति । ३. आम्रन् चूपति । ४. फलन् ह्नुते ।
५. पुलिंलिङ्गम् । ६. ऊर्ध्वण्डयते । ७. विद्वांसः । ८. तलूूँ लिखामि ।
९. निष्फलवूँ वित्तम् । १०. नदीन्तरति । ११. कथयूं ह्यः । १२.
सत्यं शिवं सुन्दरम् । १३. धनयूं यच्छति । १४. कान्तः । १५. साम्रा-
ज्यम् । १६. त्वलूँ लोमशः । १७. रामं रमेशम् भजे । १८. सर्वम्वल-
१२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
वताम्पथ्यम् । १६ त्वँ वक्ता । २० पण्डित । २१ अहङ्कार ।
२२ अहँ वलामि । २३ कुलं ह्लादते । २४ इत्थम् ह्वलयति ।
(२) 'मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' यहां अन्त्य मकार को अनुस्वार क्यों नहीं होता?
अपदान्त (?) है तो नश्चापदान्तस्य झलि से हो जाये ।
(३) 'एव लृकारोऽपि आ, पुंस्त्वम्'—क्या ये शुद्ध हैं ? सप्रमाण लिखें ।
(४) 'राजन् + पाहि' यहां नकार को अनुस्वार क्यों न हो ?
(५) 'तन्यते' यहां नश्चापदान्तस्य झलि सूत्र क्या प्रवृत्त नहीं होता ?
(६) 'अनुस्वारस्य ययि पर सवर्ण' यहां 'पर' पद को पृथक् क्यों मानते हैं ?
(७) 'सम्राज्ञी' शब्द क्या अशुद्ध है ?
(८) 'किं ह्य' में अनुनासिक यँ करना कहां तक शुद्ध है ? टिप्पण करें ।
(९) 'नपरे, मपरे यवलपरे' पदों में समास बता कर उन का विग्रह लिखें ।
(१०) डुल रोदिति यहां अनुस्वार को परसवर्ण क्यों नहीं होता ?
[लघु०] विधिसूत्रम्—(८४) ङः सि धुँट् ।८।३।२६॥
ङात् परस्य सस्य धुँड् वा ॥
अर्थ—ङकार से परे सकार का अवयव धुँट् हो जाता है विकल्प से ।
व्याख्या—ङः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा
म) । 'ङः' यह पञ्चम्यन्त है । तस्मादित्युत्तरस्य (७१) के अनुसार ङकार से अव्य-
वहित पर का अवयव 'धुँट्' होना चाहिये । 'सि' यह सप्तम्यन्त पद है । तस्मिन्निति
निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) के अनुसार सकार से अव्यवहित पूर्व का अवयव 'धुँट्' होना
चाहिये । अब 'धुँट्' किस का अवयव हो ? यह शङ्का उत्पन्न होती है । इस का समा-
धान यह है—उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् अर्थात् जहां पञ्चमी और सप्तमी
दोनों से निर्देश किया गया हो वहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् होता है । इस
नियम के अनुसार 'ङः' यहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् हुआ । अत ङकार से
अव्यवहित पर=सकार को ही धुँट् का आगम¹ होगा। एवं 'सि' को 'सः' इस षष्ठ्यन्त-
१ व्याकरण प्रक्रिया में जब किसी के साथ कुछ अंश जोड़ा जाता है तो उस जुड़ने
वाले अंश को आगम कहते हैं । आगम मित्र की तरह होते हैं जैसे मित्र घर में
आकर गृहपति के मेहमान वत उस के समीप बैठते हैं वैसे आगमों की स्थिति
होती है । अत एव कहा है—मित्रवदागमा भवन्ति । जिस आगम होता है उसे
प्रायः षष्ठ्यन्ततया प्रस्तुत किया जाता है । जैसे —आर्धधातुकस्येड् वलादेः(४०१),
इदितो नुम् धातोः (४६३), ड्णोः कुक्टुक् शरि (८६) आदि । परन्तु जब
पञ्चमी और सप्तमी दोनों विभक्तियों से निर्देश होता है तब पञ्चम्यन्त निर्देश
के बलवान् होने से सप्तम्यन्त पद को षष्ठ्यन्त के रूप में परिणत होना पड़ता है
और तब आगम उसी का ही अवयव माना जाता है जैसे कि इस प्रकृतसूत्र में
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२६
स्थान पर (द्वितीयाः) वर्गों के द्वितीय वर्ण हों (शरि) शर् प्रत्याहार परे होने पर
(इति) यह (पौष्करसादेः) पौष्करसादि आचार्य के मत में (वाच्यम्) कहना
चाहिये । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प सिद्ध हो जायेगा । पौष्करसादि
पाणिनि से पूर्ववर्त्ती वैयाकरण थे ।
आन्तर्य के कारण वर्गप्रथम को उसी वर्ग का द्वितीय वर्ण हो जायेगा । भाव
यह है कि श्, ष्, स् के परे होने पर क् को ख्, च् को छ्, ट् को ठ्, त् को थ् तथा प्
को फ् आदेश विकल्प से हो जाता है । उदाहरण यथा—
१ संवथ्सरः, संवत्सरः । २ अभीप्सा, अभीप्सा । ३ अख्परम्, अक्परम् ।
४ ख्षीरम्, क्षीरम् । ५ ख्षमा, क्षमा । ६ ख्यितिः, क्षितिः । ७ थ्सरुः, त्सरुः । ८
अफ्सरसः, अप्सरसः । ९ विर्फ्शिन्, विर्प्शिन् । १० अख्षि, अक्षि । इत्यादि ।
‘प्राङ् क्+षष्ठः, सुगण् ट्+षष्ठः’ इन दोनों स्थानों पर पकार=शर् परे
रहने के कारण ककार और टकार को क्रमशः खकार और ठकार होकर निम्नलिखित
रूप बने—
कुँक् पक्ष में { १ प्राङ्ख्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में)
{ २ प्राङ्क्षष्ठः¹ ।
कुँक्-अभाव में— ३ प्राङ् षष्ठः ।
टुँक् पक्ष में { १ सुगण्ठ्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में)
{ २ सुगण्ट्षष्ठः ।
टुँक्-अभाव में— ३ सुगण् षष्ठः ।
इस के अन्य उदाहरण यथा—१ प्राङ्ख्षु, प्राङ्क्षु, प्राङ्षु । २ गवाङ्ख्षु,
गवाङ्क्षु, गवाङ्षु । ३ तिर्यङ्ख् स्वपिति, तिर्यङ्क् स्वपिति, तिर्यङ् स्वपिति । ४ क्रुङ्ख्
श्वसिति, क्रुङ्क् श्वसिति, क्रुङ् श्वसिति । ५ उदङ्ख् शृणोति, उदङ्क् शृणोति, उदङ्
शृणोति । ६ सुगण्ख् सहते, सुगण्क् सहते, सुगण् सहते । इत्यादि ।
नोट — चयो द्वितीयाः शरि० वार्तिक अनचि च (८.४.४६) सूत्र पर पढ़ा गया
है । यद्यपि खरि च (८.४.५४) सूत्र त्रिपादी में इस वार्तिक से परे होने के कारण
इसे असिद्ध नहीं समझ सकता, तथापि वार्तिक के आरम्भसामर्थ्य से उस की यहां प्रवृत्ति
नहीं होती । अन्यथा वार्तिक बनाने का कुछ प्रयोजन ही न रहे ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(८७) नश्च ।८।३।३०॥
नान्तात् परस्य सस्य धुँट् वा । सन्त्सः, सन्सः ॥
अर्थः—नकारान्त से परे सकार को विकल्प कर के धुँट् का आगम होता है ।
व्याख्या—नः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। (ङः सि धुँट् से) । च इत्यव्यय-
पदम् । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) । अर्थः—(नः) न् से परे (सि=सः)
१. ककार और षकार मिल कर ‘क्ष’ हो जाता है । क्+ष्+अ=क्ष ।
ल० प्र० (६)
१३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
सकार का अवयव (धुट्) धुँट् (वा) विकल्प करके हो जाता है। आद्यन्तौ टकितौ
(८५) द्वारा धुँट् सकार का आद्यवयव होगा। उदाहरण यथा—
'सन् + स' (वह सज्जन है) यहा न् से सकार परे है अतः सकार को धुँट् का
वैकल्पिक आगम हो कर उँट् अनुबन्ध का लोप हो जाता है। अब खरि च (७४) सूत्र
से चर्त्व अर्थात् धकार को तकार करने से—सन्त्स। धुँट्-अभाव पक्ष मे—सन्स। इस
प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ अस्मिन्त्समये, अस्मिन्समये। २ भवान्त्सखा, भवान्सखा। ३ सन्त्साधु,
सन्साधु। ४ तान्त्सपत्नान्, तान्सपत्नान्। ५ धनवान्त्सहोदर, धनवान्सहोदर। ६
पठन्त्साद्दृश्यम्, पठन्माद्दृश्यम्। ७ विद्वान्त्सहते, विद्वान्सहते। ८ पुमान्त्स्त्रिया, पुमा-
न्स्त्रिया। ९ नेन्त्सिद्बध्नातिषु च, नेन्सिद्बध्नातिषु च। १० तान्साध्यान्त्साधय,
तान्माध्यान्साधय। इत्यादि।
नोट—वृत्ति में नान्तात्' पद 'न' को 'पदात्' का विशेषण कर देने से येन
विधिस्तदन्तस्य द्वारा प्राप्त होता है। इस से हानि लाभ कुछ नही।
शङ्का—ङ सि धुँट् (८४) नश्च (८७) इन दो ही सूत्रो में 'सि' का ग्रहण
होता है। इन्ही दोना स्थानो पर उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् इस परिभाषा
का आश्रय कर 'सस्य' ऐसा मानना पडता है। इस से तो यही अच्छा होता कि यहा
'सि' पद की बजाय 'स' पद ग्रहण कर लेते।
समाधान—'स' ऐसा स्पष्ट षष्ठ्यन्त पद न कह कर 'सि' इस प्रकार सप्त-
म्यन्त पद के ग्रहण का प्रयोजन लाघव करना ही है। 'सि' मे डेढ मात्रा है परन्तु
'स' मे दो मात्रा होती थी। [स् की आधी, इ की एक, कुल डेढ। स् की आधी,
अ की एक, विसर्गों की आधी, कुल दो। अर्धमात्रा का लाघवगौरव है। अर्धमात्रा-
लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा—यह उक्ति यहा चरितार्थ होती है।]
[लघु०] विधि सूत्रम्—(८८) शि तुँक् ।।८।३।३१॥
पदान्तस्य नस्य शे परे तुंग्वा। सञ्छम्भु, सञ्छ्शम्भु, सञ्शम्भु,
सन्शम्भु॥
अर्थ—शकार परे होने पर पदान्त नकार को विकल्प कर के तुंक का आगम
होता है।
व्याख्या—शि ।७।१। न ।६।१। (नश्च से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत
है)। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा रो)। तुँक् ।१।१। 'न' यह 'पदस्य' का विशेषण
है अतः इस मे तदन्तविधि होती है। अर्थ—(शि) शकार परे होने पर (न०) नान्त
(पदस्य) पद का अवयव (वा) विकल्प करके (तुँक्) तुंक हो जाता है। 'तुँक्' कित्
होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार नान्त पद का अन्तावयव होगा।
उदाहरण यथा—
'सन्+शम्भु' (शम्भु भगवान् सत्स्वरूप है) यहा शकार परे है, अतः 'सन्'
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३१
इस नान्त पद को तुँक् का आगम हो कर उँक् की इत्सञ्ज्ञा लोप करने पर—सन्त्
शम्भुः। स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से त् को च् और न् को ञ् हो कर—सञ्त् शम्भुः।
अब शश्छोऽटि (७६) से विकल्प कर के शकार को छकार हो—सञ्त् छम्भुः। पुनः
झरो झरि सवर्णे(७३)से चकार का विकल्प करके लोप किया तो—(१) सञ्छम्भुः।
जहां चकार का लोप न हुआ वहां (२) सञ्च्छम्भुः। जहां छत्व न हुआ वहां (३)
सञ्श्चाम्भुः। जहां तुँक् ही न हुआ वहां श्चुत्व हो (४) सञ्शम्भुः। इस प्रकार चार
रूप सिद्ध हुए। रूपों के विषय में निम्नलिखित एक श्लोक प्रसिद्ध है—
ञ्छौ ञ्च्छा ञ्चशा ञशाविति चतुष्टयम्।
रूपाणामिह तुँक्-छत्व-चलोपानां विकल्पनात्॥
नोट—विद्यार्थी प्रायः इस रूप की सिद्धि में भूल कर जाया करते हैं। भूल से
बचने के लिये सब से प्रथम एक ही रूप को पकड़ें; जितने विकल्प हों उन सब को
छोड़ दें। अर्थात् प्रथम एक ही रूप में तुँक्, छत्व तथा चकारलोप कर के उसे सम्पूर्ण
सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके बाद अन्तिम विकल्प से वैकल्पिक रूपों को पकड़ना
आरम्भ करना चाहिये। अन्तिम विकल्प चकारलोप है जहां चकारलोप नहीं हुआ उस
रूप को सिद्ध करना चाहिये। इसके बाद छत्व के विकल्प को पकड़ उसे सिद्ध करना
चाहिये। तदनन्तर तुँक् का विकल्प सिद्ध करना चाहिये। इस प्रकार करने से रूपों में
कोई अशुद्धि नहीं आयेगी। याद रखें कि शुद्ध-सिद्धि के रूपों का वही क्रम होता है जो
ऊपर श्लोक में दिया गया है।
इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. बालाञ्छास्ति। २. विद्वाञ्छोभते।
३. पुत्राञ्श्यायति। ४. नमञ् शाखी। ५. श्वसञ्छेते। ६. भजञ्छि्वम्। ७. बुद्धि-
माञ्छृणोति। ८. धनवाञ् शूद्रः। ६. पठञ्शोचति। १०. आगच्छञ्छीनकादयः।
११. पुमाञ्श्रूयते। १२. मतिमाञ् श्लाघते। इत्यादि। प्रत्येक के चार चार रूप
जानने चाहियें।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(८६) ङमो ह्रस्वादचि ङमुँणित्यम्।८।३।३२॥
ह्रस्वात् परो यो ङम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्याचो नित्यं ङमुँट्।
प्रत्यङ्ङात्मा। सुगण्णीशः। सन्नच्युतः॥
अर्थः—ह्रस्व से परे जो ङम्, वह है अन्त में जिस के ऐसा जो पद उस से परे
अच् को नित्य ङमुँट् का आगम होता है।
व्याख्या—ङमः ।५।१। ह्रस्वात् ।५।१। अचि ।७।१। ङमुँट् ।१।१। नित्यम्
इति क्रियाविशेषणं द्वितीयाैकवचनान्तम्। यहां पीछे से अधिकृत 'पदात्' पद आ रहा
है। 'ङमः' यह 'पदात्' का विशेषण है, अतः 'ङमः' से तदन्त-विधि होगी। उभयनिर्देशे
पञ्चमी-निर्देशो बलीयान् इस परिभाषा के द्वारा ङमुँट् 'अचि' का ही अवयव समझा
जायेगा। अर्थः—(ह्रस्वात्) ह्रस्व से परे (ङमः) जो ङम् तदन्त (पदात्) पद से
परे (अचि=अचः) अच् का अवयव (नित्यम्) नित्य (ङमुँट्) ङमुँट् हो जाता है।
'ङमुँट्' में ङम् प्रत्याहार है उँकार उच्चारणार्थ तथा ट् हलन्त्यम् (१) से
इत्सञ्ज्ञक है। ङम् प्रत्याहार को टित् करने का कोई प्रयोजन नहीं अतः सञ्ज्ञियों
An exact line-by-line transcription of the text from the image into pure Devanagari Unicode:
१३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थात् ङ ण्, न के साथ टित्व का सम्बन्ध हो कर—'ङुट्, णुट्, नुट्' ये तीन आगम
प्राप्त होगे । यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार ङकारान्त पद से परे
अच् को ङुट् णकारान्त पद से परे अच् को णुट् तथा नकारान्त पद से परे अच् को
नुट् का आगम होगा । उदाहरण यथा—
(१) 'प्रत्यङ्+आत्मा' (जीवात्मा) यहां यकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे
ङ् = ङम् है, अत 'प्रत्यङ्' ङकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् आकार को ङुट् का
आगम हो, उँट् के चले जाने पर 'प्रत्यङ्ङात्मा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
(२) 'सुगण्+ईश' (सुगणाम् = सुयोग्य-गणितज्ञानाम् ईश = स्वामी, षष्ठी-
तत्पुरुष-समास ) यहा गकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे ण्=ङम् है, अत 'सुगण्'
णकारान्त पद हुआ । इस से परे अच = ईकार को णुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने
पर विभक्ति लाने मे 'सुगण्णीश' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
(३) 'सन्+अच्युत' (अच्युत भगवान् सत्स्वरूप है) यहा सकारोत्तर ह्रस्व
अवर्ण से परे न् - ङम् है, अत 'सन्' यह नकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् =
अकार को नुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने से 'सन्नच्युत' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
नोट—इस सूत्र मे स्थित 'नित्यम्' पद का अर्थ 'प्राय' है, अर्थात् यथा देव-
दत्त नित्य हसता ही रहता है, विष्णुमित्र नित्य खाता ही रहता है इत्यादि वाक्यो मे
'नित्य' शब्द का 'प्राय' (बहुधा) अर्थ है इसी प्रकार यहा भी समझना चाहिये ।
अत इको यण अचि, सुप्तिङ्-अन्त पदम्, सन्-आद्यन्ता धातव. इत्यादि सूत्रो मे ङमुट्
न होने पर भी कोई दोष नही आता । सन्नन्तान्न सन्निष्यते—यहा पर दोनो प्रकार के
उदाहरण हैं। [केचित्तु अनुबन्धो यो ङम् तदन्तात् पदादचो ङमुँडागमे कामचारिता,
अन्यत्र तु नियतेत्याहु ।]
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ कुर्वन्नास्ते । २ तिष्ठन्निट । ३ तस्मिन्निति । ४ एतस्मिन्नहनि ।
५ गच्छन्नवोचत् । ६ जानन्नपि । ७ भगवन्नत्र । ८ तस्मिन्नणि । ६ हसन्ता-
गच्छति । १० पठन्नपठत् । ११ अस्मिन्नुद्याने । १२ सुगण्णालय ।
'ह्रस्वात्' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—भगवान्+अत्र='भगवानत्र' इत्यादि
प्रयोगो मे दीर्घ से परे ङम होने से अच् को ङमुँट् न हो। 'अचि' कहने से—'गच्छन्+
मुञ्चने' आदि मे नकार को ङमुँट् का आगम नही होता ।
अभ्यास (२१)
(१) जहा सप्तमी और पञ्चमी दोनो विभक्तियो द्वारा निर्देश हो वहां तस्मि-
न्निति० तथा तस्मादित्युत्तरस्य इन मे किस परिभाषा की प्रवृत्ति होती है ?
(२) आद्यन्तौ टकितौ सूत्र की आवश्यकता पर सोदाहरण प्रकाश डालें ।
(३) पटत्सन्न् , पट्मन्त — आदि प्रयोगो में चयो द्वितीया शरि० वात्तिक
द्वारा वर्गद्वितीय आदेश क्यों नहीं होता ?
(४) 'प्राङ्घषष्ठ' आदि प्रयोगो में खरि च द्वारा चर्त्व क्यो नहीं होता ?
(५) ङ सि धुट् सूत्र को स्पष्टता के लिये ङः सः धुट् ही क्यो नही कहा ?
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३३
(६) क्या उपाय किया जाये जिस से सिद्धि करते समय 'सञ्छम्भुः' आदि
रूपों का क्रम ग्रन्थोक्तप्रकार से शुद्ध सिद्ध हो ?
(७) ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् सूत्र में ङमुट् को नित्य कहने वाले आचार्य
किस कारण इको यण् अचि आदि में स्वयं ङमुट् आगम नही करते ?
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[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६०) सम्ः सुँटि ।८।३।५॥
समो रुँः स्यात् सुँटि ॥
अर्थः—सुँट् परे होने पर सम् के मकार के स्थान पर 'रुँ' आदेश हो ।
व्याख्या—समः ।६।१। सुँटि ।७।१। रुँः ।१।१। (मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि
से) । अर्थः—(सुँटि) सुँट् परे हो तो (समः) सम् के स्थान पर (रुँः) रुँ आदेश हो
जाता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा के अनुसार सम् के अन्त्य अल् = मकार को
ही रुँ आदेश होगा ।
'सम् + स्कर्त्ता' [यहां 'सम्' पूर्वक डुकृञ् करणे (तना०) धातु से तृच् प्रत्यय
हो सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे सूत्र से कृ को सुँट् का आगम हो कर उँट् का लोप हो
जाता है ।] यहां सुँट् परे रहने से मकार को रुँ आदेश हो, अनुनासिक उकार की
उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा कर तस्य लोपः (३) से लोप किया
तो 'सर् + स्कर्त्ता' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६१) अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ।८।३।२॥
अत्र रुँ-प्रकरणे रोः पूर्वस्याऽनुनासिको वा स्यात् ॥
अर्थः—इस रुँप्रकरण में रुँ से पूर्व वर्ण को विकल्प से अनुनासिक हो ।
व्याख्या — अत्र इत्यव्ययपदम् । अनुनासिकः ।१।१। पूर्वस्य ।६।१। तु इत्यव्यय-
पदम् । वा इत्यव्ययपदम् । मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि (८.३.१) सूत्र के बाद यह पढ़ा
गया है । यहां 'अत्र' इसी रुँप्रकरण के लिये है; अतः ससजुषो रुँः (१०५) सूत्र से
किये गये रुँ वाले स्थानों पर यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होगा ।¹ अर्थः—(अत्र) मतुँवसो रुँ
सम्बुद्धौ छन्दसि सूत्र से आरम्भ किये गये रुँ प्रकरण में (रोः) रुँ से (पूर्वस्य) पूर्व
वर्ण के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (अनुनासिकः) अनुनासिक हो जाता है ।
१. अष्टाध्यायी में रुँ का प्रकरण दो स्थानों पर आता है । एक अष्टमाध्याय के
तृतीयपादस्थ मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि (८.३.१) सूत्र से लेकर कानाम्रेडिते
(८.३.१२) सूत्र तक, और दूसरा ससजुषो रुँः (८.२.६६) आदि सूत्रों में । यहां
'अत्र' शब्द के कथन से प्रथम प्रकरण का ही ग्रहण होता है दूसरे ससजुषो रुँः
(१०५) वाले प्रकरण का नहीं । इस प्रकरण के पांच सूत्र लघुकौमुदी में व्या-
ख्यात हैं—सम्ः सुँटि (६०), पुमः खय्यम्परे (६४), नश्छव्यप्रशान् (६५),
नॄन् पे (६७), कानाम्रेडिते (१००) । अतः इन पांच सूत्रों के विषय में ही प्रकृत
अनुनासिक (६१) तथा अनुस्वार (६२) की प्रवृत्ति समझनी चाहिये ।
१३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'सर्ँ +स्कर्त्ता' यहां रँ से पूर्व सकारोत्तर अकार को अनुनासिक हो—'सँर् +
स्कर्त्ता' हुआ। जिस पक्ष में अनुनासिक नहीं होता वहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६२) अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः ।८।३।४॥
अनुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्मात् परोऽनुस्वारागमः स्यात् ॥
अर्थः—जहां अनुनासिक होता है उस रूप को छोड़ अन्य पक्ष वाले रूप में रुँ
से पूर्व जो वर्ण उस से परे अनुस्वार का आगम होता है।
व्याख्या—अनुनासिकात् ।५।१। रोः ।५।१। (मतुवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि से
विभक्ति-विपरिणाम द्वारा)। पूर्वात् ।५।१। (अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा से विभक्ति-
विपरिणाम द्वारा)। परः ।१।१। अनुस्वारः ।१।१। 'अनुनासिकात्' यहां ल्यब्लोपे
पञ्चमी विभक्ति हुई है। यथा—प्रासादात् प्रेक्षते, प्रासादारुह्य प्रेक्षत इत्यर्थः। अतः
यहां 'विहाय' इस ल्यबन्त का लोप समझना चाहिये। 'अनुनासिकं विहाय' ऐसा इस
का तात्पर्य होगा। 'अनुनासिक' शब्द में मत्वर्थीय अच् प्रत्यय हुआ है। अनुनासिको-
ऽस्त्यस्मिन्नित्यनुनासिकम्। अनुनासिकवद् रूपम् इत्यर्थः। अर्थः—(अनुनासिकात्)अनु-
नासिक वाले रूप को छोड़ कर (रोः) रुँ से (पूर्वात्) पूर्व जो वर्ण, उस से (परः)
परे (अनुस्वारः) अनुस्वार का आगम होता है। तात्पर्य यह है कि जिस पक्ष में अनु-
नासिक नहीं होता उस पक्ष में इस सूत्र से रुँ से पूर्व अनुस्वार का आगम होता है।
ध्यान रहे कि पूर्वोक्त अनुनासिक आदेश था और यह अनुस्वार आगम है।
'सर्ँ +स्कर्त्ता' यहां अनुनासिकाभाव-पक्ष में रुँ से पूर्व वर्ण=अकार से परे
अनुस्वार का आगम हो—'संर्+स्कर्त्ता' हुआ। तो अब इस प्रकार—(१) सँर्+
स्कर्त्ता [अनुनासिक-पक्षे] । (२) संर्+स्कर्त्ता [अनुस्वारागम-पक्षे]। अब दोनों पक्षों
में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६३) खरवसानयोर्विसर्जनीयः ।८।३।१५॥
खरि अवसाने च पदान्तस्य रेफस्य विसर्गः स्यात्॥
अर्थः—खर् और अवसान परे होने पर पदान्त रेफ के स्थान पर विसर्ग हो।
व्याख्या—खरवसानयोः ।७।२। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। रः ।६।१।
(रो रि से)। विसर्जनीयः ।१।१। 'रः' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः येन विधिरस्त-
दन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर 'रेफान्तस्य पदस्य' ऐसा बन जायेगा। समास—खर्
च अवसानञ्च=खरवसाने, तयोः=खरवसानयोः। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(खरव-
सानयोः) खर् और अवसान परे होने पर (रः) रेफान्त (पदस्य) पद के स्थान पर
(विसर्जनीयः) विसर्ग आदेश होता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा रेफान्त
पद के अन्त्य अल् रेफ को ही विसर्ग होगा।
'सँर्+स्कर्त्ता, संर्+स्कर्त्ता' यहां सुँट् वाला सकार खर् परे है अतः दोनों
पक्षों में पदान्त रेफ को विसर्ग आदेश हो कर—'सँः+स्कर्त्ता, संः+स्कर्त्ता' हुआ।
अब यहां विसर्जनीयस्य सः (६६) के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र की प्राप्ति होती
है, इस पर नित्यसकार के विधानार्थ अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है—
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३५
[लघु०] वा०—(१५) सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः॥
सँस्स्कर्ता, संस्स्कर्ता॥
अर्थः—सम्, पुम् तथा कान् शब्दों के विसर्ग को सकार आदेश होता है।
व्याख्या—सम्पुङ्कानाम् ।६।३। विसर्गस्य ।६।१। (प्रकरणलब्ध)। सः ।१।१।
वक्तव्यः ।१।१। समासः—सम् च पुम् च कान् च = सम्पुङ्कान्, तेषाम् = सम्पुङ्कानाम्।
इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(सम्पुङ्कानाम्) सम्, पुम् और कान् शब्दों के (विसर्गस्य)
विसर्ग के स्थान पर (सः) स् आदेश (वक्तव्यः) कहना चाहिये।
'सँः + स्कर्ता, संः + स्कर्ता' यहां सम् के विसर्ग हैं अतः विसर्ग के स्थान पर
सकार आदेश हो कर—१. सँस्स्कर्ता, २. संस्स्कर्ता ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
भाष्य में समो वा लोपमेके द्वारा सम् के मकार का पाक्षिक लोप भी प्रतिपा-
दन किया गया है। यह लोप भी इसी रुँ के प्रकरण में स्थित है अतः अनुनासिक और
अनुस्वार भी होते हैं। इस प्रकार 'सँस्कर्ता, संस्कर्ता' ये एक सकार वाले रूप भी
बनते हैं। अत एव 'संस्कृतम्' में एक सकार देखा जाता है। सिद्धान्त-कौमुदी में इस
के १०८ रूप बनाये गये हैं; विशेष जिज्ञासु वहीं देखें।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६४) पुमः खय्यम्परे ।८।३।६॥
अम्परे खयि पुमो रुँः स्यात्। पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः॥
अर्थः—अम् प्रत्याहार जिस से परे है ऐसा खय् यदि परे हो तो पुम् शब्द के
मकार को रुँ आदेश होता है।
व्याख्या—पुमः ।६।१। रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि सूत्र से)। खयि
।७।१। अम्परे ।७।१। समासः—अम् परो यस्माद् असौ = अम्परस्तस्मिन् = अम्परे।
बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(अम्परे) अम् है परे जिस से ऐसे (खयि) खय् प्रत्याहार
के परे होने पर (पुमः) पुम् शब्द के स्थान पर (रुँः) रुँ आदेश हो जाता है। अलो-
ऽन्त्यस्य (२१) से पुम् के मकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'पुम् + कोकिल' (पुमांश्चासौ कोकिलश्चेति विग्रहः, 'पुंस् + सुँ कोकिल + सुँ'
इति कर्मधारयसमासे विभक्त्योर्लुकि संयोगान्तस्य लोपः इति पुंसः सकारलोपे अनुस्वार-
स्यापि पुनर्मकारः) यहां पुम् से परे ककार खय् विद्यमान है, इस से परे ओकार अम्
भी मौजूद है अतः पुम् के मकार को प्रकृतसूत्र से रुँ आदेश हो कर पूर्ववत् अनुनासिका-
देश (६१) अनुस्वारागम (६२), विसर्ग (६३) तथा सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः (वा०
१५) से विसर्ग के स्थान पर सकार कर विभक्ति लाने से 'पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः'
(नर कोयल) ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
१. समासावस्था में जब 'पुंस्' शब्द के सकार का संयोगान्तस्य लोपः (२०)से लोप
हो जाता है तो निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के अनुसार अनुस्वार को भी
पुनः मकार होकर 'पुम्' हो जाता है। उसी का यहां ग्रहण है; 'पुम्' कोई नया
शब्द नहीं।
An accurate line-by-line transcription of the Sanskrit/Hindi text:
१३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
नोट—‘पुंस्कोकिल, पुंस्कोकिल’ यहां खरवसानयो ० (६३) सूत्र से रेफ को
विसर्ग करने पर कुप्वो ≍क≍पौ च (६८) सूत्र द्वारा जिह्वामूलीय प्राप्त होते थे,
पुन उस के अपवाद सम्पुङ्कानां सो वक्तव्य (वा० १५) वार्त्तिक से सकार आदेश
हो जाता है ।
खय् यो अम्पर्क इस लिये कहा है कि ‘पुंशीरम्’ आदि मे रुँ आदेश न हो ।
यहा सकार का संयोगान्त-लोप हो कर मोऽनुस्वार मे मकार को अनुस्वार हो जाना
है । ‘खय् परे’ होन पर इस लिय कहा है कि ‘पुलिङ्गम, पुदास, पुगव, पुन्नाग’—
इत्यादिया मे रुँत्व न हो जाये ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६५) नश्छव्यप्रशान् ।८।३।७।।
अम्परे छवि नान्तस्य पदस्य रुँ स्यात्, न तु प्रशान्शब्दस्य ॥
अर्थ—जिस से परे अम् प्रत्याहार है ऐसे छव् प्रत्याहार के परे होने पर
नकारान्त पद को रुँ आदेश हो, परन्तु प्रशान् शब्द को न हो ।
व्याख्या—न ।६।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । रुँ ।१।१। (मतुँवसो
रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि स) । अम्परे ।७।१। (पुम खय्यम्परे स) । छवि ।७।१। अप्रशान्
।१।१। (षष्ठ्यर्थे प्रथमा) । समास—अम् परो यस्माद् असौ=अम्पर, तस्मिन्=
अम्परे । बहुव्रीहिसमास । न प्रशान्=अप्रशान्, नञ्तत्पुरुष । ‘न’ यह ‘पदस्य’ का
विशेषण है अत येन विधिस्र्तदन्तस्य द्वारा इस से तदन्त-विधि हो कर ‘नान्तस्य पदस्य’
बन जाता है। अर्थ—(अम्परे) अम् परे वाला (छवि) छव् परे होने पर (न)
नकारान्त (पदस्य) पद के स्थान पर (रुँ) रुँ आदेश होता है, परन्तु (अप्रशान्)
प्रशान् शब्द को नहीं होता । अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा नकारान्त पद के
अन्त्य नकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा—
‘चक्रिन्+त्रायस्व’ (हे चक्रिन् ! त्व त्रायस्व=रक्ष) यहां ‘चक्रिन्’ यह नान्त
पद है। इस से परे तकार छव् है, तथा इस छव् से परे रेफ अम् विद्यमान है, अत
नकार को रुँ आदेश हो पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम तथा खरवसानयोर्विस-
र्जनीय (६३) से पदान्त रेफ को विसर्ग करने पर—‘चक्रिँ +त्रायस्व, चक्रिं +
त्रायस्व’ ये दो रूप हुए । अब विसर्ग को सकारादेश करने वाला अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६६) विसर्जनीयस्य सः ।८।३।३४।।
खरि विसर्जनीयस्य स स्यात् । चक्रिँस्त्रायस्व, चक्रिंस्त्रायस्व । अप्र-
शान् किम् ? प्रशान् तनोति । पदान्तस्येति किम् ? हन्ति ॥
अर्थ—खर् परे होने पर विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश हो ।
व्याख्या—खरि ।७।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीय से एकदेशस्वरित के कारण
‘खरि’ अट्टा) । विसर्जनीयस्य ।६।१। स ।१।१। सकारादकार उच्चारणार्थ । अर्थ—
(खरि) खर् परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर (स) स् आदेश
होता है । उदाहरण यथा—
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३७
'चक्रीँ:+त्रायस्व, चक्रीं:+त्रायस्व' यहां तकार = खर् परे है, अतः विसर्गों
को स् आदेश हो—'चक्रीँस्त्रायस्व, चक्रींस्त्रायस्व' ये दो प्रयोग सिद्ध हुए ।
अप्रशान् किम् ? प्रशान् तनोति । नश्छव्यप्रशान् (६५) सूत्र में 'प्रशान्' शब्द
को रुँ करने का निषेध इस लिये किया है कि 'प्रशान्+तनोति' यहां अम्परक (अकार-
परक) खय् (तकार) के परे होने पर भी पदान्त नकार को रुँ आदेश न हो ।
पदान्तस्येति किम् ? हन्ति । 'पदस्य' का अधिकार होने से 'हन्ति' आदि स्थानों
में अपदान्त नकार को अम्परक खय् परे होने पर भी (६५) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता ।
'छव् परे होने पर' इसलिये कहा है कि—'पुत्रान् पालयति, तान् कामयते'
इत्यादि में रुँत्व न हो जाये । छव् को अम्परक कहने से—'सन् त्सरुः' इत्यादि में रुँत्व
नहीं होता ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) नॄन् पे ।८।३।१०॥
'नॄन्' इत्यस्य रुँर्वा पे ॥
अर्थ:—पकार परे होने पर 'नॄन्' शब्द के नकार के स्थान पर विकल्प कर के
'रुँ' आदेश हो ।
व्याख्या—नॄन् ।६।१। ('नॄन्' यह नृशब्द के द्वितीया के बहुवचन का अनुकरण
है। इस के आगे षष्ठी-विभक्ति के एकवचन का लुक् हुआ है) । रुँः ।१।१। (मतुवसो
रुँ० सूत्र से) । पे ।७।१। [यहां पकारोत्तर अकार उच्चारण के लिये है अतः 'पुनाति'
आदि परे होने पर भी यह सूत्र प्रवृत्त हो जाता है] । उभयथा इत्यव्ययपदम् (उभय-
थर्क्षु सूत्र से) । अर्थ:—(पे) पकार परे होने पर (नॄन्) नॄन् शब्द के स्थान पर
(उभयथा) विकल्प कर के (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) परि-
भाषा द्वारा 'नॄन्' के अन्त्य अल् नकार को ही 'रुँ' आदेश होगा । उदाहरण यथा—
'नॄन्+पाहि' (हे राजन् ! त्वं नॄन्=नरान्, पाहि=पालय । लोगों को बचाओ।)
यहां पकार परे होने से 'नॄन्' के अन्त्य नकार को प्रकृतसूत्र से रुँ आदेश हो पूर्ववत्
अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'नॄँ:+पाहि, नॄं+पाहि'
ये दो रूप हुए । अब विसर्जनीयस्य सः (६६) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद
अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६८) कुप्वोः ≍क≍पौ च ।८।३।३७॥
कवर्गे पवर्गे च परे विसर्गस्य ≍क≍पौ स्तः । चाद् विसर्गः । नॄँ ≍
पाहि, नॄं: पाहि; नॄँ ≍पाहि, नॄं: पाहि; नॄन्पाहि ॥
अर्थ:—कवर्ग पवर्ग परे होने पर विसर्ग को क्रमशः जिह्वामूलीय तथा उप-
ध्मानीय आदेश होते हैं । सूत्र में चकार-ग्रहण से पक्ष में विसर्ग भी रहता है ।
व्याख्या—कुप्वोः ।७।२। विसर्जनीयस्य ।६।१। (विसर्जनीयस्य सः से)। ≍क-
≍पौ ।१।२। च इत्यव्ययपदम् । समासः—≍कश्च ≍पश्च = ≍क≍पौ, इतरेतर-
द्वन्द्वः । यहां ककार पकार ग्रहण इस लिये किया गया है कि जिह्वामूलीय और उप-
१३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
ध्मानीय सदा क्रमशः कवर्ग पवर्ग के ही आश्रित रहते हैं। कुश्च पुश्च=कुपू तयो =
कुप्वोः, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(कुप्वोः) कवर्ग पवर्ग परे होने पर (विसर्जनीयस्य)
विसर्ग के स्थान पर क्रमशः (≍क≍पो) जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय हो जाते हैं।
(च) किञ्च पक्ष में विसर्ग भी बना रहता है¹।
सम्पूर्ण कवर्ग पवर्ग में विसर्ग प्राप्त नहीं हो सकते । विसर्ग केवल क्, ख्, प्,
फ् इन चार वर्णों के परे होने पर ही मिल सकते हैं। क्योंकि विसर्ग विधान करने
वाला खरवसानयो ० (६३) यही एक सूत्र है। यह सूत्र खर् परे होने पर ही विसर्ग
आदेश करता है। खर् प्रत्याहार में कवर्ग पवर्ग का इन चार वर्णों के सिवाय अन्य
कोई वर्ण नहीं आता, अतः यह सूत्र 'क्, ख्, प्, फ्' परे होने पर ही विसर्गों को
जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय करता है ।
'नूॅ + पाहि, नृ + पाहि' यहां पकार परे होने से विसर्गों को उपध्मानीय
हो कर—नूॅ≍पाहि, नृ≍पाहि । विसर्गपक्ष में— नूॅ पाहि, नृ पाहि । जहां नॄन्पे
(६७) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में—नॄन्पाहि । इस प्रकार कुल मिला
कर पञ्च रूप सिद्ध होते हैं। एवम्—'नूॅ≍पश्य' इत्यादि ।
नोट—विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय आदि का पाठ अट् तथा शल् प्रत्या-
हार में स्वीकार किया जाता है । अतः इन के यर्प्रत्याहारान्तर्गत होने के कारण
अनचि च (१८) सूत्र से इन को वैकल्पिक द्वित्व भी हो जाता है। इस से— नूॅ≍
≍पाहि, नूॅ पाहि' इत्यादि प्रकारेण द्वित्व वाले रूप भी बना करते हैं ।
विशेष—शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५)—शर् परे वाला खर् परे हो तो
विसर्जनीय का विसर्जनीय ही रहता है अन्य कोई परिवर्तन नहीं होता । इस बाधकसूत्र
के कारण—'अतः क्षन्तव्य, वासः क्षौमम्, नापित क्षुरमाधत्स्व' इत्यादि में प्रकृतसूत्र से
जिह्वामूलीय नहीं होता । इसीप्रकार—'वालेः प्सात्मोदनम्' आदि में उपध्मानीय तथा
'विलशणः त्सरु' आदि में विसर्जनीयस्य स (६६) द्वारा प्राप्त सकार आदेश का भी
बाध हो जाता है ।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(६६) तस्य परमाम्रेडितम् ।८।१।२॥
द्विरुक्तस्य परम् आम्रेडित स्यात् ॥
अर्थ —दो बार कहे गये का परला रूप 'आम्रेडित' सञ्ज्ञक हो !
व्याख्या—तस्य ।६।१। परम् ।१।१। आम्रेडितम् ।१।१। इस सूत्र से पूर्व सर्वस्य
द्वे इस प्रकार द्वित्व का अधिकार किया गया है, अतः यहां 'तस्य' पद से 'द्विरुक्तस्य'
का ग्रहण हो जाता है। अर्थ —(तस्य) उस दो बार पढ़े गये का (परम्) परला रूप
(आम्रेडितम्) आम्रेडित सञ्ज्ञक होता है । यथा 'किम्' शब्द के द्वितीयाविभक्ति के
१ चकार-ग्रहण से शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५) सूत्र से 'विसर्जनीय' पद की अनु-
वृत्ति आ जाती है। इस से पक्ष में विसर्जनीय भी रहता है। यदि सूत्र में 'च' न
कह कर 'वा' कहते तो पक्ष में (६६) सूत्र से स् हो कर अनिष्ट हो जाता ।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३६
बहुवचन 'कान्' पद को नित्यवीप्सयोः (८.१.४) सूत्र से द्वित्व किया तो 'कान् कान्'
बना। यहां दूसरा 'कान्' शब्द आम्रेडित-सञ्ज्ञक है। अब आम्रेडित-सञ्ज्ञा का इस
रुँ-प्रकरण में उपयोग दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१००) कानाम्रेडिते ।८।३।१२॥
कान्नकारस्य रुँः स्यादाने्रडिते । काँस्कान्, कांस्कान् ॥
अर्थः—आम्रेडित परे होने पर कान् शब्द के नकार को रुँ आदेश हो।
व्याख्या—कान् ।६।१। (यहां 'किम्' शब्द के द्वितीया के बहुवचन 'कान्' शब्द
का अनुकरण किया गया है। इस से परे षष्ठी के एकवचन का लुक् हुआ है)। आम्रे-
डिते ।७।१। रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ० से) । अर्थः—(आम्रेडिते) आम्रेडित परे होने
पर (कान्) कान् शब्द के स्थान पर रुँ आदेश हो। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा से
कान् के अन्त्य अल् नकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'कान्+कान्' यहां दूसरा कान् शब्द आम्रेडित परे है; अतः प्रथम कान् शब्द
के नकार को रुँ आदेश हो कर पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम, रेफ को विसर्ग
तथा जिह्वामूलीय का बाध कर सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः (वा० १५) से विसर्ग को
सकार आदेश करने पर 'काँस्कान्, कांस्कान्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
नोट—ध्यान रहे कि 'ताँस्तान्' मे नश्छव्यप्रशान् (६५) प्रवृत्त होता है।
- अभ्यास (२२)
(१) रुँप्रकरणोक्त अनुस्वार और अनुनासिक में कौन आदेश और कौन
आगम है ?
(२) 'पुमाँश्छली' में पुमः खय्यम्परे से (?) रुँत्व कर कैसे सिद्धि करेंगे ?
(३) सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः वार्त्तिक का सोदाहरण विवेचन करें।
(४) सूत्र- समन्वय-पूर्वक निम्नलिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद करें—
१. विद्वांश्च्यवनः । २. नूँ ᳶ पाठयति । ३. पुंस्खञ्जः । ४. कस्मिंश्चित् ।
५. पुंश्छिद्राणि । ६. पुंस्प्रवृत्तिः । ७. सँस्कृतम् । ८. महांस्तुन्दिलः ।
९. पुंस्पुत्रः । १०. पुंष्टिट्टिभः । ११. सूर्य ᳵ खेचर-चक्रवर्त्ती ।
१२. भवांश्छिनत्ति । १३. पुंस्क्रोधः । १४. नूँ ᳶ पालयस्व ।
१५. संस्करोति । १६. काँस्कान् । १७. पुंश्चली । १८. भास्वांश्चरति ।
१६. पुंस्त्वम् । २०. बुद्धिमाँश्छागः ।
(५) सूत्र-समन्वय करते हुए अधोलिखित प्रयोगों में सन्धि करें—
१. पुम् + प्लीहा । २. पुम् + चर्चा । ३. सम् + कारः । ४. रूपवान् +
ठक्कुरः । १ ५. पुम् + फेरु । ६. नॄन् + पिपर्त्ति । ७. महान् + तिरस्कारः ।
८. कान् + कान् । ६. तान् + तान् । १०. पुम् + चरित्र । ११. रामः +
१. पूर्वोक्त रुँत्वविधि (८.३.७) की दृष्टि में श्चुत्व-ष्टुत्वविधि (८.४.३६-४०)
त्रिपादी में पर होने से असिद्ध है।
. १४० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्रजा + पालयामास । १२ तस्मिन् + च । १३ बाल + थूत्करोति ।
१४ पुम् + चेष्टा । १५ चञ्चुमान् + टिट्टिभ । १६ प्रशान् +
चरति । १७ नॄन् + प्रति । १८ पुम् + टिप्पणी । १९ पुम् + तर ।
२० य + क्षत्रिय ।
(६) 'हन्ति' में नश्छव्यप्रशान् सूत्र से तथा 'पुंदारा' में पुमः खय्यम्परे सूत्र से
रुँत्व क्यों नहीं होता ?
(७) सूत्रों की सोदाहरण व्याख्या करें—
अनुनासिकात्परो०, नश्छव्यप्रशान्, पुमः खय्यम्०, कुप्वो ≍क ≍पौ च ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०१) छे च ।६।१।७३॥
ह्रस्वस्य छे तुक् । शिवच्छाया ॥
अर्थ—छकार परे होने पर ह्रस्व को अवयव तुँक् हो जाता है।
व्याख्या—ह्रस्वस्य ।६।१। तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से) । छे
।७।१। च इत्यव्ययपदम् । संहितायाम् ।६।१। (यह अधिकृत है)। अर्थ—(संहितायाम्)
संहिता के विषय में (ह्रस्वस्य) ह्रस्व का अवयव (तुँक्) तुँक् हो जाता है (छे)
छकार परे हो तो। तुँक् कित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वह ह्रस्व
का अन्तावयव होता है। उदाहरण यथा—
शिव+छाया' (शिव की छाया । शिवस्य छायेति विग्रह, षष्ठी-तत्पुरुष-
समास ) यहां वकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से छकार परे है और समास होने से संहिता
का विषय भी है, अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वकारोत्तर अकार का
अन्तावयव तुँक् हो कर उँक् के चले जाने पर—शिवत् + छाया । अब स्तोः श्चुना श्चुः
(८ ४ ३६) के असिद्ध होने से झलां जशोऽन्ते (८ २ ३६) द्वारा तकार को दकार हो—
शिवद् + छाया । पुनः स्तोः श्चुना श्चुः (८ ४ ३६) के प्रति शर्परे च (८ ४ ५४) के
असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व अर्थात् दकार को जकार पश्चात् चर्त्व अर्थात् जकार को
चकार किया तो—शिवच्छाया । अब 'सुँ' विभक्ति ला कर हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से
उस का लोप हो—'शिवच्छाया' प्रयोग सिद्ध होता है।
ध्यान रहे कि यहां ष्टोः ष्टुः (३०६) द्वारा षवर्ग आदेश नहीं होगा, क्योंकि
जश्त्व, श्चुत्व और चर्त्व तीनों उसकी दृष्टि में असिद्ध हैं। उसे तो 'त्' ही दीखता है।
इस सूत्र के अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें।
[लघु०] विधि सूत्रम्—(१०२) पदान्ताद्वा ।६।१।७४॥
दीर्घात् पदान्ताच्छे तुंग्वा । लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया ॥
अर्थ—पदान्त दीर्घ से छकार परे हो तो विकल्प से तुँक् का आगम हो।
व्याख्या—दीर्घात् ।५।१। (दीर्घात् सूत्र से) । पदान्तात् ।५।१। छे ।७।१। (छे
च सूत्र से) । तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से)। वा इत्यव्ययपदम्। अर्थ—
(दीर्घात्) दीर्घ (पदान्तात्) पदान्त से (छे) छकार परे होने पर (वा) विकल्प कर
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १४१
के (तुँक्) तुँक् का आगम होता है। तुँक् किस का अवयव हो ? पदान्त दीर्घ का हो
या छकार का ? यह यहां प्रश्न है। उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् के अनुसार
तो छकार का अवयव होना चाहिये। पर ऐसा नहीं होना; यह दीर्घ का ही अवयव
होता है। इस का कारण यह है कि यदि यह छकार का अवयव होना तो कित् होने
से छकार के अन्त में होना चाहिये था, परन्तु विभाषा सेना-सुराच्छाया-शाला-निशा-
नाम् (२.४.२५) सूत्र में तो छकार के आदि अर्थात् दीर्घ से परे देखा जाता है अतः
यह दीर्घ का ही अन्तावयव है यह सुतरां सिद्ध होता है। उदाहरण यथा—
'लक्ष्मी + छाया' (लक्ष्मी की छाया। लक्ष्म्याश्छायेति विग्रहः, षष्ठी-तत्पुरुषः)
यहां समास में पदान्त दीर्घ ईकार से छकार परे विद्यमान है अतः दीर्घ ईकार को
विकल्प कर के तुँक् का आगम हो कर पूर्ववत् उँक् के चले जाने पर जश्त्व = दकार,
श्चुत्व = जकार तथा चर्त्व = चकार हो कर विभक्ति लाने से—'लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मी-
छाया' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
स्मरण रहे कि पहला सूत्र पदान्त अपदान्त कुछ नहीं कहता था इस लिये वह
दोनों में प्रवृत्त होता था। परन्तु यह सूत्र पदान्त में ही प्रवृत्त होता है; वह भी तब
जब पदान्त दीर्घ होगा। पदान्त—समस्त, व्यस्त दोनों अवस्थाओं में हो सकता है।
ग्रन्थकार ने समस्तावस्था (समास अवस्था) का उदाहरण दिया है। व्यस्तावस्था
(समासरहित अवस्था) के उदाहरण—'कुलटाच्छिन्ननासिका' आदि अभ्यास में देखें।
नोट—यदि आङ् और माङ् अव्ययों से परे छकार होगा तो दीर्घ पदान्त होते
हुए भी तुँक् का आगम नित्य होगा; तब पदान्ताद्वा (१०२) सूत्र प्रवृत्त नहीं होगा।
इस के लिये नित्य तुँक् विधानार्थ आङ्माङोश्च (६.१.७२) यह नया सूत्र बनाया
गया है। यथा—आच्छादयति, माच्छैत्सीः। इसे सिद्धान्त-कौमुदी में देखें।
सूचना—'मूर्च्छना, मूर्च्छा' आदि में तुँक् नहीं समझना चाहिये, किन्तु अचो
रहाभ्यां द्वे (६०) से वैकल्पिक द्वित्व हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हुआ है।
किञ्च 'वाञ्छति' आदि में चकार जोड़ना अशुद्ध है, क्योंकि तुँक् प्राप्त नहीं।
[लघु०] इति हल्सन्धि-प्रकरणम् ॥
अर्थः—यहां हलों की सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है।
व्याख्या—सन्धि एक प्रकार का वर्णविकार ही है। यदि वह विकार अच् के
स्थान पर हो तो 'अच्सन्धि', हल् के स्थान पर हो तो 'हल्सन्धि' कहाता है। इसी
प्रकार विसर्ग-सन्धि के विषय में भी जान लेना चाहिये। लोक में प्रायः यह प्रचलित
है और हम भी लोकवाद का अनुसरण करते हुए पीछे यही लिख आये हैं कि अच् का
अच् के साथ मेल = विकृति 'अच्सन्धि' और हल् का हल् के साथ मेल 'हल्सन्धि'
कहाता है। पर ध्यान देने से यह ठीक प्रतीत नहीं होता। क्योंकि ऐसा मानने से
वान्तो यि प्रत्यये (२४) आदि अच्सन्धि के सूत्रों तथा ङमो ह्रस्वादचि ङमुँन्नित्यम्
(८६) आदि हल्सन्धि के सूत्रों में व्यवस्था न बन सकेगी। अतः यही उचित प्रतीत
१४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
होता है कि जहां अच् के स्थान पर सन्धि अर्थात् संयोगजन्य वर्णविकार करें चाहे उस
का निमित्त अच् या हल् जो भी हो वहां 'अच्सन्धि' और जहां हल् के स्थान पर सन्धि
अर्थात् संयोगजन्य वर्णविकार करें चाहे उस का निमित्त अच् या हल् जो भी हो वहां
'हल्सन्धि' होती है । [ अचा स्थाने सन्धि = अच्सन्धि , हला स्थाने सन्धि =
हल्सन्धि ] । अच्सन्धि में झलां जश् झशि (१६) आदि सूत्र प्रसङ्ग वश लिये गये हैं ।
इसी प्रकार हल्सन्धि म विसर्जनीयस्य स (६६), कुप्वो ᳵकᳵपौ च (६८) प्रभृति
विसर्गसन्धि के सूत्र तथा कुछ अन्य भी प्रसङ्ग वश लिये गये समझने चाहियें ।
अभ्यास (२३)
(१) निम्नलिखित प्रयोगों में सूत्रसमन्वय करते हुए सन्धिविच्छेद करें—
१ इच्छति । २ द्यूतच्छलेन । ३ कुटीच्छन्ना । ४ दन्तच्छद । ५
असिच्छिन्न । ६ मङ्गलच्छाय । ७ रथाच्छिन्नवा । ८ स्वच्छातप ।
६ वैदिकच्छन्दांसि । १० नवच्छिद्राणि । ११ गच्छति । १२
नूतनच्छात्र । १३ चिच्छेद । १४ गूढाच्छेद्योक्ति । १५ माच्छिद ।
१६ तीक्ष्णाच्छुरिका । १७ स्वच्छन्द । १८ यज्ञच्छाग । १६
गुच्छच्छेद । २० कुलटाच्छिन्ननासिका ।
(२) निम्नस्थ रूपों में सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धि करें—
१ आ+छिद्यते । २ कुमारी+छेत्स्यति । ३. पद+छेद । ४ भूपति
+छाया । ५ बाले+छिद्यते । ६ मधु+छन्दस् । ७ वनानि+
छित्त्वा । ८ मा स्म+छिद् । ६ भूधव+छेद । १० शीतला+
छाया । ११ य+छति । १२ इ+छा । १३ सन्ति+छिद्राणि ।
१४ मा+छित्था । १५ नो+छेद । १६ वि+छेद ।
(३) गच्छति, इच्छति—आदि में तुँक् करने पर जश्त्व, चत्त्वं होंगे या नहीं ?
(४) पदान्ताद्वा द्वारा विहित तुँक् किस का अवयव है ? स्पष्ट करें ।
(५) क्या 'महाविद्यालयछात्र ' प्रयोग शुद्ध है ?
(६) 'उच्छेद' में तुँक् (?) किस सूत्र से होगा ?
(७) यदि 'मूर्च्छा' शुद्ध है तो 'वाञ्छति' क्यों नहीं ? सहेतुक लिखें ।
(८) अच्सन्धि-हल्सन्धि शब्दों का विवेचन कर 'सन्धि' पर टिप्पण लिखें ।
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-
सिद्धान्तकौमुद्यां हल्सन्धि-
प्रकरणं समाप्तम् ॥