सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

१३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

'सर्ँ +स्कर्त्ता' यहां रँ से पूर्व सकारोत्तर अकार को अनुनासिक हो—'सँर् +
स्कर्त्ता' हुआ। जिस पक्ष में अनुनासिक नहीं होता वहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६२) अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः ।८।३।४॥
अनुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्मात् परोऽनुस्वारागमः स्यात् ॥
अर्थः—जहां अनुनासिक होता है उस रूप को छोड़ अन्य पक्ष वाले रूप में रुँ
से पूर्व जो वर्ण उस से परे अनुस्वार का आगम होता है।
व्याख्या—अनुनासिकात् ।५।१। रोः ।५।१। (मतुवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि से
विभक्ति-विपरिणाम द्वारा)। पूर्वात् ।५।१। (अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा से विभक्ति-
विपरिणाम द्वारा)। परः ।१।१। अनुस्वारः ।१।१। 'अनुनासिकात्' यहां ल्यब्लोपे
पञ्चमी विभक्ति हुई है। यथा—प्रासादात् प्रेक्षते, प्रासादारुह्य प्रेक्षत इत्यर्थः। अतः
यहां 'विहाय' इस ल्यबन्त का लोप समझना चाहिये। 'अनुनासिकं विहाय' ऐसा इस
का तात्पर्य होगा। 'अनुनासिक' शब्द में मत्वर्थीय अच् प्रत्यय हुआ है। अनुनासिको-
ऽस्त्यस्मिन्नित्यनुनासिकम्। अनुनासिकवद् रूपम् इत्यर्थः। अर्थः—(अनुनासिकात्)अनु-
नासिक वाले रूप को छोड़ कर (रोः) रुँ से (पूर्वात्) पूर्व जो वर्ण, उस से (परः)
परे (अनुस्वारः) अनुस्वार का आगम होता है। तात्पर्य यह है कि जिस पक्ष में अनु-
नासिक नहीं होता उस पक्ष में इस सूत्र से रुँ से पूर्व अनुस्वार का आगम होता है।
ध्यान रहे कि पूर्वोक्त अनुनासिक आदेश था और यह अनुस्वार आगम है।
'सर्ँ +स्कर्त्ता' यहां अनुनासिकाभाव-पक्ष में रुँ से पूर्व वर्ण=अकार से परे
अनुस्वार का आगम हो—'संर्+स्कर्त्ता' हुआ। तो अब इस प्रकार—(१) सँर्+
स्कर्त्ता [अनुनासिक-पक्षे] । (२) संर्+स्कर्त्ता [अनुस्वारागम-पक्षे]। अब दोनों पक्षों
में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६३) खरवसानयोर्विसर्जनीयः ।८।३।१५॥
खरि अवसाने च पदान्तस्य रेफस्य विसर्गः स्यात्॥
अर्थः—खर् और अवसान परे होने पर पदान्त रेफ के स्थान पर विसर्ग हो।
व्याख्या—खरवसानयोः ।७।२। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। रः ।६।१।
(रो रि से)। विसर्जनीयः ।१।१। 'रः' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः येन विधिरस्त-
दन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर 'रेफान्तस्य पदस्य' ऐसा बन जायेगा। समास—खर्
च अवसानञ्च=खरवसाने, तयोः=खरवसानयोः। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(खरव-
सानयोः) खर् और अवसान परे होने पर (रः) रेफान्त (पदस्य) पद के स्थान पर
(विसर्जनीयः) विसर्ग आदेश होता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा रेफान्त
पद के अन्त्य अल् रेफ को ही विसर्ग होगा।
'सँर्+स्कर्त्ता, संर्+स्कर्त्ता' यहां सुँट् वाला सकार खर् परे है अतः दोनों
पक्षों में पदान्त रेफ को विसर्ग आदेश हो कर—'सँः+स्कर्त्ता, संः+स्कर्त्ता' हुआ।
अब यहां विसर्जनीयस्य सः (६६) के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र की प्राप्ति होती
है, इस पर नित्यसकार के विधानार्थ अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है—