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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 633 में से

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पृष्ठ 154

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३६
बहुवचन 'कान्' पद को नित्यवीप्सयोः (८.१.४) सूत्र से द्वित्व किया तो 'कान् कान्'
बना। यहां दूसरा 'कान्' शब्द आम्रेडित-सञ्ज्ञक है। अब आम्रेडित-सञ्ज्ञा का इस
रुँ-प्रकरण में उपयोग दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१००) कानाम्रेडिते ।८।३।१२॥
कान्नकारस्य रुँः स्यादाने्रडिते । काँस्कान्, कांस्कान् ॥
अर्थः—आम्रेडित परे होने पर कान् शब्द के नकार को रुँ आदेश हो।
व्याख्या—कान् ।६।१। (यहां 'किम्' शब्द के द्वितीया के बहुवचन 'कान्' शब्द
का अनुकरण किया गया है। इस से परे षष्ठी के एकवचन का लुक् हुआ है)। आम्रे-
डिते ।७।१। रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ० से) । अर्थः—(आम्रेडिते) आम्रेडित परे होने
पर (कान्) कान् शब्द के स्थान पर रुँ आदेश हो। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा से
कान् के अन्त्य अल् नकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'कान्+कान्' यहां दूसरा कान् शब्द आम्रेडित परे है; अतः प्रथम कान् शब्द
के नकार को रुँ आदेश हो कर पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम, रेफ को विसर्ग
तथा जिह्वामूलीय का बाध कर सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः (वा० १५) से विसर्ग को
सकार आदेश करने पर 'काँस्कान्, कांस्कान्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
नोट—ध्यान रहे कि 'ताँस्तान्' मे नश्छव्यप्रशान् (६५) प्रवृत्त होता है।

  • अभ्यास (२२)
    (१) रुँप्रकरणोक्त अनुस्वार और अनुनासिक में कौन आदेश और कौन
    आगम है ?
    (२) 'पुमाँश्छली' में पुमः खय्यम्परे से (?) रुँत्व कर कैसे सिद्धि करेंगे ?
    (३) सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः वार्त्तिक का सोदाहरण विवेचन करें।
    (४) सूत्र- समन्वय-पूर्वक निम्नलिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद करें—
    १. विद्वांश्च्यवनः । २. नूँ ᳶ पाठयति । ३. पुंस्खञ्जः । ४. कस्मिंश्चित् ।
    ५. पुंश्छिद्राणि । ६. पुंस्प्रवृत्तिः । ७. सँस्कृतम् । ८. महांस्तुन्दिलः ।
    ९. पुंस्पुत्रः । १०. पुंष्टिट्टिभः । ११. सूर्य ᳵ खेचर-चक्रवर्त्ती ।
    १२. भवांश्छिनत्ति । १३. पुंस्क्रोधः । १४. नूँ ᳶ पालयस्व ।
    १५. संस्करोति । १६. काँस्कान् । १७. पुंश्चली । १८. भास्वांश्चरति ।
    १६. पुंस्त्वम् । २०. बुद्धिमाँश्छागः ।
    (५) सूत्र-समन्वय करते हुए अधोलिखित प्रयोगों में सन्धि करें—
    १. पुम् + प्लीहा । २. पुम् + चर्चा । ३. सम् + कारः । ४. रूपवान् +
    ठक्कुरः । १ ५. पुम् + फेरु । ६. नॄन् + पिपर्त्ति । ७. महान् + तिरस्कारः ।
    ८. कान् + कान् । ६. तान् + तान् । १०. पुम् + चरित्र । ११. रामः +
    १. पूर्वोक्त रुँत्वविधि (८.३.७) की दृष्टि में श्चुत्व-ष्टुत्वविधि (८.४.३६-४०)
    त्रिपादी में पर होने से असिद्ध है।