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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 633 में से

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पृष्ठ 141

१२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

व्याख्या—यवलपरे ।७।२। हे ।७।२। (हे म्परे वा से)। म ।६।३। (मोऽनु-
स्वारः मे)। यवला ।१।३। वा इत्यव्ययपदम्। समास —यश्च वश्च लश्च = य-व-ला,
इतरेतरद्वन्द्व । एष्वकार उच्चारणार्थ । यवला परा यस्मादसौ यवलपरस्तस्मिन् =
यवलपरे। बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(यवलपरे) य्, व्, ल्, परे वाले (हे) हकार के
परे होने पर (म ) म् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (यवला ) यकार, वकार,
लकार हो जाते। यह वार्त्तिक मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। जिस
पक्ष मे 'य्, व्, ल्' नही होगे उस पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो जायेगा।
यहा यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) से आदेश और निमित्तो को क्रमश समझ लेना
चाहिये। अर्थात् यकार परे वाला हकार परे होगा तो मकार को यकार, वकार परे
वाला हकार परे होगा तो मकार को वकार तथा लकार परे वाला हकार परे होगा
तो मकार को लकार आदेश होगा। उदाहरण यथा—
'किम् + ह्य' (कल क्या था ?) यहा यकार परे वाला हकार परे है अत.
मकार को विकल्प कर के यकार होगा। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से यकार
दो प्रकार का होता है। यहा स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक मकार को वैसा
ही अनुनासिक यकार हो कर—किंयँ ह्य । पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार
हो कर 'किं ह्य' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए।
'किम् + ह्वलयति' [क्या हिलाता है ? ह्वल चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ
मित्त्वाद् ह्रस्व] यहा वकार परे वाला हकार परे है अत मकार को विकल्प कर के
अनुनासिक वकार होकर—किंवँ ह्वलयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार
हो कर—'किं ह्वलयति' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए।
'किम् + ह्लादयति' (कौन वस्तु प्रसन्न करती है?) यहा लकार परे वाला
हकार परे है। अत मकार को विकल्प कर के अनुनासिक लकार हो कर—किंलँ
ह्लादयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर—'किं ह्लादयति' ये दो
रूप सिद्ध होते हैं।
इसी प्रकार १ मित्रंलँ ह्लादते, मित्रं ह्लादते। २ इदंयँ ह्यस्तनम्, इदं
ह्यस्तनम्। ३. किंवँ ह्वयतु, किं ह्वयतु। इत्यादि।
नोट—सर्वत्र कौमुदीग्रन्थो मे यहा मकार के स्थान पर अनुनासिक 'यँ, वँ,
लँ' ही मुद्रित प्राप्त होते हैं। टीकाकारो का कथन है कि 'य्, व्, ल्' अनुनासिक
और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते है। यहा अनुनासिक मकार के स्थान
पर दोनो के प्राप्त होने पर स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक यकार वकार लकार
ही होते हैं। परन्तु शेखरकार नागेशभट्ट ने इस मत का खण्डन किया है। उन का
कथन है कि 'य्, व्, ल्' यहा विधान किये गये हैं। विधीयमान अण् अपने सवर्णियो
के ग्राहक नहीं होते [देखो—अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११)]। अत यहा अनु-
नासिक 'य्, व्, ल्' नही हो सकेंगे किन्तु जैसे विधान किये गये हैं वैसे निरनुनासिक