लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १३७
'चक्रीँ:+त्रायस्व, चक्रीं:+त्रायस्व' यहां तकार = खर् परे है, अतः विसर्गों
को स् आदेश हो—'चक्रीँस्त्रायस्व, चक्रींस्त्रायस्व' ये दो प्रयोग सिद्ध हुए ।
अप्रशान् किम् ? प्रशान् तनोति । नश्छव्यप्रशान् (६५) सूत्र में 'प्रशान्' शब्द
को रुँ करने का निषेध इस लिये किया है कि 'प्रशान्+तनोति' यहां अम्परक (अकार-
परक) खय् (तकार) के परे होने पर भी पदान्त नकार को रुँ आदेश न हो ।
पदान्तस्येति किम् ? हन्ति । 'पदस्य' का अधिकार होने से 'हन्ति' आदि स्थानों
में अपदान्त नकार को अम्परक खय् परे होने पर भी (६५) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता ।
'छव् परे होने पर' इसलिये कहा है कि—'पुत्रान् पालयति, तान् कामयते'
इत्यादि में रुँत्व न हो जाये । छव् को अम्परक कहने से—'सन् त्सरुः' इत्यादि में रुँत्व
नहीं होता ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) नॄन् पे ।८।३।१०॥
'नॄन्' इत्यस्य रुँर्वा पे ॥
अर्थ:—पकार परे होने पर 'नॄन्' शब्द के नकार के स्थान पर विकल्प कर के
'रुँ' आदेश हो ।
व्याख्या—नॄन् ।६।१। ('नॄन्' यह नृशब्द के द्वितीया के बहुवचन का अनुकरण
है। इस के आगे षष्ठी-विभक्ति के एकवचन का लुक् हुआ है) । रुँः ।१।१। (मतुवसो
रुँ० सूत्र से) । पे ।७।१। [यहां पकारोत्तर अकार उच्चारण के लिये है अतः 'पुनाति'
आदि परे होने पर भी यह सूत्र प्रवृत्त हो जाता है] । उभयथा इत्यव्ययपदम् (उभय-
थर्क्षु सूत्र से) । अर्थ:—(पे) पकार परे होने पर (नॄन्) नॄन् शब्द के स्थान पर
(उभयथा) विकल्प कर के (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) परि-
भाषा द्वारा 'नॄन्' के अन्त्य अल् नकार को ही 'रुँ' आदेश होगा । उदाहरण यथा—
'नॄन्+पाहि' (हे राजन् ! त्वं नॄन्=नरान्, पाहि=पालय । लोगों को बचाओ।)
यहां पकार परे होने से 'नॄन्' के अन्त्य नकार को प्रकृतसूत्र से रुँ आदेश हो पूर्ववत्
अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'नॄँ:+पाहि, नॄं+पाहि'
ये दो रूप हुए । अब विसर्जनीयस्य सः (६६) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद
अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६८) कुप्वोः ≍क≍पौ च ।८।३।३७॥
कवर्गे पवर्गे च परे विसर्गस्य ≍क≍पौ स्तः । चाद् विसर्गः । नॄँ ≍
पाहि, नॄं: पाहि; नॄँ ≍पाहि, नॄं: पाहि; नॄन्पाहि ॥
अर्थ:—कवर्ग पवर्ग परे होने पर विसर्ग को क्रमशः जिह्वामूलीय तथा उप-
ध्मानीय आदेश होते हैं । सूत्र में चकार-ग्रहण से पक्ष में विसर्ग भी रहता है ।
व्याख्या—कुप्वोः ।७।२। विसर्जनीयस्य ।६।१। (विसर्जनीयस्य सः से)। ≍क-
≍पौ ।१।२। च इत्यव्ययपदम् । समासः—≍कश्च ≍पश्च = ≍क≍पौ, इतरेतर-
द्वन्द्वः । यहां ककार पकार ग्रहण इस लिये किया गया है कि जिह्वामूलीय और उप-