लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 633 में से
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१३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थात् ङ ण्, न के साथ टित्व का सम्बन्ध हो कर—'ङुट्, णुट्, नुट्' ये तीन आगम
प्राप्त होगे । यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार ङकारान्त पद से परे
अच् को ङुट् णकारान्त पद से परे अच् को णुट् तथा नकारान्त पद से परे अच् को
नुट् का आगम होगा । उदाहरण यथा—
(१) 'प्रत्यङ्+आत्मा' (जीवात्मा) यहां यकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे
ङ् = ङम् है, अत 'प्रत्यङ्' ङकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् आकार को ङुट् का
आगम हो, उँट् के चले जाने पर 'प्रत्यङ्ङात्मा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
(२) 'सुगण्+ईश' (सुगणाम् = सुयोग्य-गणितज्ञानाम् ईश = स्वामी, षष्ठी-
तत्पुरुष-समास ) यहा गकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे ण्=ङम् है, अत 'सुगण्'
णकारान्त पद हुआ । इस से परे अच = ईकार को णुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने
पर विभक्ति लाने मे 'सुगण्णीश' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
(३) 'सन्+अच्युत' (अच्युत भगवान् सत्स्वरूप है) यहा सकारोत्तर ह्रस्व
अवर्ण से परे न् - ङम् है, अत 'सन्' यह नकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् =
अकार को नुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने से 'सन्नच्युत' प्रयोग सिद्ध हो जाता है ।
नोट—इस सूत्र मे स्थित 'नित्यम्' पद का अर्थ 'प्राय' है, अर्थात् यथा देव-
दत्त नित्य हसता ही रहता है, विष्णुमित्र नित्य खाता ही रहता है इत्यादि वाक्यो मे
'नित्य' शब्द का 'प्राय' (बहुधा) अर्थ है इसी प्रकार यहा भी समझना चाहिये ।
अत इको यण अचि, सुप्तिङ्-अन्त पदम्, सन्-आद्यन्ता धातव. इत्यादि सूत्रो मे ङमुट्
न होने पर भी कोई दोष नही आता । सन्नन्तान्न सन्निष्यते—यहा पर दोनो प्रकार के
उदाहरण हैं। [केचित्तु अनुबन्धो यो ङम् तदन्तात् पदादचो ङमुँडागमे कामचारिता,
अन्यत्र तु नियतेत्याहु ।]
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ कुर्वन्नास्ते । २ तिष्ठन्निट । ३ तस्मिन्निति । ४ एतस्मिन्नहनि ।
५ गच्छन्नवोचत् । ६ जानन्नपि । ७ भगवन्नत्र । ८ तस्मिन्नणि । ६ हसन्ता-
गच्छति । १० पठन्नपठत् । ११ अस्मिन्नुद्याने । १२ सुगण्णालय ।
'ह्रस्वात्' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—भगवान्+अत्र='भगवानत्र' इत्यादि
प्रयोगो मे दीर्घ से परे ङम होने से अच् को ङमुँट् न हो। 'अचि' कहने से—'गच्छन्+
मुञ्चने' आदि मे नकार को ङमुँट् का आगम नही होता ।
अभ्यास (२१)
(१) जहा सप्तमी और पञ्चमी दोनो विभक्तियो द्वारा निर्देश हो वहां तस्मि-
न्निति० तथा तस्मादित्युत्तरस्य इन मे किस परिभाषा की प्रवृत्ति होती है ?
(२) आद्यन्तौ टकितौ सूत्र की आवश्यकता पर सोदाहरण प्रकाश डालें ।
(३) पटत्सन्न् , पट्मन्त — आदि प्रयोगो में चयो द्वितीया शरि० वात्तिक
द्वारा वर्गद्वितीय आदेश क्यों नहीं होता ?
(४) 'प्राङ्घषष्ठ' आदि प्रयोगो में खरि च द्वारा चर्त्व क्यो नहीं होता ?
(५) ङ सि धुट् सूत्र को स्पष्टता के लिये ङः सः धुट् ही क्यो नही कहा ?