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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 633 में से

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पृष्ठ 146

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३१
इस नान्त पद को तुँक् का आगम हो कर उँक् की इत्सञ्ज्ञा लोप करने पर—सन्त्
शम्भुः। स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से त् को च् और न् को ञ् हो कर—सञ्त् शम्भुः।
अब शश्छोऽटि (७६) से विकल्प कर के शकार को छकार हो—सञ्त् छम्भुः। पुनः
झरो झरि सवर्णे(७३)से चकार का विकल्प करके लोप किया तो—(१) सञ्छम्भुः।
जहां चकार का लोप न हुआ वहां (२) सञ्च्छम्भुः। जहां छत्व न हुआ वहां (३)
सञ्श्चाम्भुः। जहां तुँक् ही न हुआ वहां श्चुत्व हो (४) सञ्शम्भुः। इस प्रकार चार
रूप सिद्ध हुए। रूपों के विषय में निम्नलिखित एक श्लोक प्रसिद्ध है—
ञ्छौ ञ्च्छा ञ्चशा ञशाविति चतुष्टयम्।
रूपाणामिह तुँक्-छत्व-चलोपानां विकल्पनात्॥
नोट—विद्यार्थी प्रायः इस रूप की सिद्धि में भूल कर जाया करते हैं। भूल से
बचने के लिये सब से प्रथम एक ही रूप को पकड़ें; जितने विकल्प हों उन सब को
छोड़ दें। अर्थात् प्रथम एक ही रूप में तुँक्, छत्व तथा चकारलोप कर के उसे सम्पूर्ण
सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके बाद अन्तिम विकल्प से वैकल्पिक रूपों को पकड़ना
आरम्भ करना चाहिये। अन्तिम विकल्प चकारलोप है जहां चकारलोप नहीं हुआ उस
रूप को सिद्ध करना चाहिये। इसके बाद छत्व के विकल्प को पकड़ उसे सिद्ध करना
चाहिये। तदनन्तर तुँक् का विकल्प सिद्ध करना चाहिये। इस प्रकार करने से रूपों में
कोई अशुद्धि नहीं आयेगी। याद रखें कि शुद्ध-सिद्धि के रूपों का वही क्रम होता है जो
ऊपर श्लोक में दिया गया है।
इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. बालाञ्छास्ति। २. विद्वाञ्छोभते।
३. पुत्राञ्श्यायति। ४. नमञ् शाखी। ५. श्वसञ्छेते। ६. भजञ्छि्वम्। ७. बुद्धि-
माञ्छृणोति। ८. धनवाञ् शूद्रः। ६. पठञ्शोचति। १०. आगच्छञ्छीनकादयः।
११. पुमाञ्श्रूयते। १२. मतिमाञ् श्लाघते। इत्यादि। प्रत्येक के चार चार रूप
जानने चाहियें।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(८६) ङमो ह्रस्वादचि ङमुँणित्यम्।८।३।३२॥
ह्रस्वात् परो यो ङम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्याचो नित्यं ङमुँट्।
प्रत्यङ्ङात्मा। सुगण्णीशः। सन्नच्युतः॥
अर्थः—ह्रस्व से परे जो ङम्, वह है अन्त में जिस के ऐसा जो पद उस से परे
अच् को नित्य ङमुँट् का आगम होता है।
व्याख्या—ङमः ।५।१। ह्रस्वात् ।५।१। अचि ।७।१। ङमुँट् ।१।१। नित्यम्
इति क्रियाविशेषणं द्वितीयाैकवचनान्तम्। यहां पीछे से अधिकृत 'पदात्' पद आ रहा
है। 'ङमः' यह 'पदात्' का विशेषण है, अतः 'ङमः' से तदन्त-विधि होगी। उभयनिर्देशे
पञ्चमी-निर्देशो बलीयान् इस परिभाषा के द्वारा ङमुँट् 'अचि' का ही अवयव समझा
जायेगा। अर्थः—(ह्रस्वात्) ह्रस्व से परे (ङमः) जो ङम् तदन्त (पदात्) पद से
परे (अचि=अचः) अच् का अवयव (नित्यम्) नित्य (ङमुँट्) ङमुँट् हो जाता है।
'ङमुँट्' में ङम् प्रत्याहार है उँकार उच्चारणार्थ तथा ट् हलन्त्यम् (१) से
इत्सञ्ज्ञक है। ङम् प्रत्याहार को टित् करने का कोई प्रयोजन नहीं अतः सञ्ज्ञियों