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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 152 में से

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पृष्ठ 130

१२२ केनोपनिषद् [ खण्ड ४


पद-भाष्य

वत् आ३ इव । विद्युतस्तेजः | है 'प्रकाशित हुआ' तथा 'आ' का अर्थ
सकृद्विद्योतितवदित्येत्यभिप्रायः । | 'समान' है । अतः इसका अभिप्राय
इतिशब्द आदेशप्रतिनिर्देशार्थः- | यह हुआ कि 'जो बिजलीकी तेजके
इत्ययमादेश इति । इच्छब्दः | समान एक बार प्रकाशित हुआ ।'
समुच्चयार्थः । | 'इति' शब्द आदेशका सङ्केत
अयं चापरस्तस्यादेशः । | करनेके लिये है अर्थात् 'यह आदेश
कोऽसौ ? न्यमीमिषद् यथा चक्षुः | है' ऐसा बतलानेके लिये है, और
न्यमीमिषद् निमेषं कृतवत् । | 'इत्' शब्द समुच्चयार्थक है ।

| इसके सिवा एक दूसरा आदेश यह
| भी है । वह क्या है ? [ सुनो—]
| जिस प्रकार नेत्र निमेष करता है,
| उसी प्रकार उसने भी निमेष किया ।

वाक्य-भाष्य

घनान्धकारं विदार्य विद्युत्सर्वतः | अन्धकारको विदीर्ण करके सब ओर
प्रकाशत एवं तद्ब्रह्म देवानां पुरतः | प्रकाशित होती है उसी प्रकार वह ब्रह्म
सर्वतः प्रकाशवद्व्यक्तीभूतमतो | देवताओंके सामने सब ओर प्रकाशयुक्त
व्यद्युतद्वित्येत्युपास्यम् । यथा | होकर व्यक्त हुआ; इसलिये 'वह
सकृद्विद्युतमिति च वाजसनेयके । | बिजलीकी चमकके समान है'
यस्माच्चेन्द्रोपसर्पणकाले न्यमी- | इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है ।
मिषत् । यथा कश्चिच्चक्षुर्निमेषणं | जैसा कि वाजसनेयक श्रुतिमें भी
कृतवानिति । इतीदित्यनर्थकौ | 'यथा सकृद्विद्युतम्' ऐसा कहा है ।

निपातौ । निमिषितवदिव तिरो- | क्योंकि इन्द्रके समीप जानेके समय
भूतम् । इति एवमधिदैवतं देव- | ब्रह्म इसप्रकार संकुचित हो गया था,
ताया अधि यद्दर्शनमधिदैवतं | मानो किसीने नेत्र मूँद लिये हों; अतः
तत् ॥ ४ ॥ | वह नेत्र मूँदनेके समान तिरोहित
| हुआ । इस प्रकार यह अधिदैवत
| ब्रह्मदर्शन है। जो दर्शन देवतासम्बन्धी
| होता है वह अधिदैवत कहलाता है।
| 'इति' और 'इत्' इन दोनों निपातोंका
| यहाँ कुछ अर्थ नहीं है ॥ ४ ॥