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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

( ६६८ )

कवीरपंथी—

पांच जना नहि माने काहु । मूसे चोर घर बांधो साहु ॥ तलबदार
आये परचंड । परमोधी पर कीन्है डंड ॥ भाग चले पांचों परधान ।
ले मोदी गुजरे दीवान ॥ आगे अगम है विषम घाट । दुर्गदानी
जगाती रोके घाट ॥ दान देहु का पूछो मोहि । रीते जाव की
देऊँ तोहि ॥ सबे अनाथ मैं कहों काहि । को कोन बिगूचे इहाँ
आहि ॥ सब सुख चाहो धरो धीर । सुखसागर जब मिलो कवीर ॥

वसंत ४२—कोई सन्त विवेकी मनही जान । उरझ रहो सकलो
जहान ॥ मन पंछी उडि गयो अकाश । जल थल माँही सकल
बास ॥ मन उरझाय रहो है छाया । कोई न चीन्ह मन सबहीं
खाया ॥ मनहि पाप औ मनही पुत्र । मन सिरजा देखो तीन गुत्र ॥
मनहि धाम जो रचा बनाय । मन जन्मो नौ बार आय ॥ मनके
व्रत सुर सकल देव । मनहीकी सब करत सेव ॥ मनहि मध्य औ
आदि अन्त । मन सिरजो लीला अनंत ॥ ब्रह्म फूट मन भयो अंस ।
तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहैं कवीर जो मनही जान ।
सत्य शब्द गहि पद निरवान ॥

वसंत ४३—मोहि ऐसे बनिज सो नाही काज । घटत मूर दिन
बढ़त ब्याज ॥ नायक एक बनजारे पांच । बैल पचीसक संग
साथ ॥ नौ वहियाँ दस गोन लाद । कसन बहतर लागे तास ॥
पाप पुन दोय बनिज कीन्ह । कर्म पयादे संग लीन्ह ॥ तीन
जगातीसे मांडी रार । तासों नायक गयो है हार ॥ पूंजी खुटायल
बनिज टूट । चहुँ दिस टांडा गयो फूट ॥ कहैं कवीर ऐसो
बनिज बाद । परि है गौन को देई लाद ॥

वसंत ४४—सतगुरु खेले नित बसंत । मुक्त पदारथ मिले हो
कंत ॥ धरती रथ चढ़ देखो देस । घर घर देखो नृप नरेस ॥
जोजन चार पेंतुरे फेर । बांध मवासी घरमें घेर ॥ अघर निअच्छर

शब्दावली

(६६९)

गहो ढाल । भाग चले रन छोड़ काल॥ सूर सुध घट गहो कमान ।
चंद चिता गहि मारो वान॥ साथ संगत मिल करहु जोर । तब
गढ छोडे चतुर चोर ॥ ऐसी विध जो लडे सूर । तब काल
मवासी होय दूर॥ अधर निअच्छर गहो डोर । जो निज मानो
बचन मोर॥ धरती तुरे होय असवार । कहें कवीर भी उतरो पार॥

वसंत ४५-देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत
मूल ॥ प्रगट निरंजन घटही मान । ताहि छोड पूजत पषान ॥
जल पीवै पाषान धोय । आदि अंत पाखान होय॥ गगन सीस
पाताल पांय । सो कस ठाकुर संपुट समाय ॥ अलख निरंजन
आवे न जाय । सो कस दिये तुम्हारो खाय ॥ बार बार हम
कहा पुकार । शब्द न माने करत रार ॥ कहें कवीर नर कियो
ना खोज । भटक मुये जैसे बनके रोज ॥

वसंत ४६-नहिं नहिं रे संतो हरि तुम्हार । एक मूल बिना जेहो
जन्म हार ॥ हरि चंद समान कहु कौन दानि । पुत्र सहित जिन
बैचि रानि॥ करनी कीन्ही मनहि जानि । आप नीच घर भरचो
पानि॥ राजा बलि भल करनी कीन्ह । बावन रूप हरि छल जो
लीन्ह॥ ता कहंदीन्ह पताल बास । देखो देखो रे संतो हरि विश्वास॥
राय युधिष्ठिर भक्त जोर । ताहुके पांव नरकमें बोर॥ कहें कवीर
सुन हरिके दास । ऐसे मूरख चाहे बैकुण्ठ बास ॥

वसंत ४७-होत ब्याह सतगुरुके द्वार । जहां बरषत शब्द
अखंड धार॥ बाहर द्वादश खंभ गाड़ । प्रेम प्रीतको मंडप मांड॥
ज्ञान तत्त्व लेकर चढाव । श्वेत मुकुट माथे बंधाव॥ जगमग जोत
जहां अति अपार । सुघर पुढुप जहां अति सुवास॥ कहें कवीर
रहु सुमत धीर । ऐसे ब्याह रचे सतगुर कवीर ॥

(६७०)

कवीरपंथी—

वसंत ४८—जप जप रे जियरा सुकृत सोर । काहे न गहो निज
शब्द डोर ॥ जहां सुकृत तहां अग्र बास । रवि शशि धरनिन
बहे बतास ॥ गगन नगर जिन बरसे नीर । सुरत निरत ले रोपो
धीर ॥ षट् दर्शन मिल कथहीं बेद । सिध साधक सब अपने
भेद ॥ सुर नर मुनी कोइ गम्म न कीन्ह । औंट मुवे बिन जलके
मीन ॥ इकइस खण्ड पृथ्वीको भाव । गन गन्धर्व बीते याही ठांव ॥
कहैं कवीर रहु अति अधीन । सत शब्द गुरु कहि जो दीन्ह ॥

वसंत ४९—ब्रह्ममंड धाम रस एक जान । जामैं सप्त सिंधु औ
चार खान ॥ चर अचर जीव जुग बेद देव । सुर असुर नाग सब
करत सेव ॥ बाग वृच्छ सलिता अन्नप । फल फूल पात शोभा
सरूप ॥ बहे सूर सूरनर सकट साल । रवि चंद बंद है अमल
ताल ॥ रिध सिध सरबत्र ऐन । गुरु ज्ञान ध्यान धन मर्म चैन ॥
सरग नरक घर धरन धाम । पाप पुन नहीं चलन काम ॥ पांचों
गुरु मंत्री प्रवीन । भोग नार पचीस कीन ॥ इनके अनंद सुख भौ
सुभाय । पूर रहो मोहि प्रगट काय ॥ पांच तत्त्व गुन तीन साज ।
मन राजा जहां करत राज ॥ ब्रह्म अखंड है सबते न्यार । वेद पुरान
न पावे पार ॥ निहतत्त्व अच्छर शब्द सार । किंचक लखे सो उतरे
पार ॥ नहिं आवे नहिं धरत देह । कहैं कवीर वह है विदेह ॥

वसंत ५०—मोह मिरग मारो न जाय । यह तन बारीमें बसो
आय ॥ बारीमें उपजे मुक्त बेल । देखत चुन गये केल केल ॥
बचत नहीं फल फूल पात । सींचन हारो पटकै हात ॥ सुरत निरतके
साजो बान । ज्ञान ध्यान साजो कमान ॥ जो कोइ मारे ताक ताक ।
होत विदेह बिलाय जात ॥ सुर नर मुनि कोई सके न मार ।
गन गंधर्व सब रहे हार ॥ कहैं कवीर हम दीयो टार । सत्य
शब्दके रोपी बार ॥

शब्दावली

(६७१)

वसंत ५१—सबही मद माते कोइ न जाग । संगहिं चोर घर
सूसन लाग ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पढी पुरान ॥
तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते करि हमेव ॥ मुलना माते
पढी मुसाफ । काजी माते दे निसाफ ॥ संसारी माते माया घार ।
राजा माते कर हंकार ॥ माते सुखदेव ऊधो अकूर । हनुमत माते
ले लंगूर ॥ सिव माते हरि चरन सेव । कलि माते नामा जय देव ॥
सत सत कहै सुप्रित वेद । ऐसे रावन मारे घरके भेद ॥ चंचल
मनको अधम काम । कहैं कवीर भजो राम नाम ॥

वसंत ५२—जहाँ बारा मास बसंत होय । परमारथ बूझे बिरला
कोय ॥ बरषे अगिन अखंड धार । जहाँ विजुली चमके अति
अपार ॥ ससि भान बिना जहाँ प्रकास । हरियर भौवन अठारा
भास ॥ बिन पानी आद्र कहै लोय । पवन गये सब मिलन घोय ॥
बिन तरवर फूले अकाश । शिव बिरंचि तहाँ लेय बास ॥
सनकादिक भूले भँवर होय । लख चौरासी जिव गये बिगोय ॥
जो तोहि सतगुरु सत लखाव । कहीं न छूटे करनी भाव ॥ अमर
लोक फल देखो आय । कहैं कवीर जाने सो पाय ॥ १६ ॥

वसंत ५३—सतनाम तत्त्व तीन लोक सार । लवलीन भये सो
उतरे पार ॥ एक जोगी जुगवे जटाधार । एक अंग भभूत धारे
अपार ॥ एक मौनी सुखमौन लीन्ह । भ्रमत फिरे जुग जुगन छीन ॥
एक आराधे सकती सीव । एक पर दादे दे रटत जीव ॥ एक
कुलदेवीको जपत जाप । ऐसे त्रिभुवन पति भूले आप ॥ एक
अन्न छांडके पीवे दूध । हरि न मिले बिन हृदै सूध ॥ कहैं कवीर
चित चेतो अंध । नातो परिहो जमके फंद ॥

वसंत ५४—सतगुरु कँवल है सुख निधान । जहाँ मोरे लागा
अछै ध्यान ॥ सोहंग तार अखण्ड डोर । बानी मुक्तापरगट

(६७२)

कवीरपंथी—

सोर ॥ पानी पावै आद अनाद । ग्रह सिंगी सब गयो है बाद ॥
जलुवा मलुवा दुनियां चोर । ये सब परे हैं कालके डोर ॥ दावन
कुता दूत लबार । ध्यान छाडि बकते अपार ॥ अदल नाम
चूरा मन ध्यान । ध्यान छाप बिन इच्छान ॥ साहब कवीर कहें
बसंत । ध्यान छाप बिन खेह पडंत ॥

बसंत ५५—सत सुकृत खेले रितु बसंत । करो अनंद दुख मेटो
संत ॥ जीवन सांच भल तबहीं होय । गुरुगम भेद लख पावे कोय ॥
लख चौरासीको कटे फंद । अमर करो मन छाडो दंद ॥ सोई
सोहागिन पियहिं चीन्ह । द्विष्ट मांहि रहे अति अधीन ॥ दरशन
शोभा रहे समाय । नहिं बिछुरे लिये संग जाय ॥ परष जान जब
नाम लीन्ह । रतन पदारथ लेव भीन ॥ कहें कवीर यह खरच
थार । अजर अमर घर रहो निनार ॥

बसंत ५६—सतगुरु खेले ऋतु बसंत । परम पुरुष जहां साथ
संत ॥ तीन लोकते भिन्न साज । सुनिये अनहद बाजे बाज ॥
कोट सूर्य जहां उगे अपार । बिरला जन कोई पावे पार ॥ कोट
सरस्वति करहिं राग । कोट इंद्र सुन गावन लाग ॥ कोट कृष्ण
कर जोरे हाथ । कोट विष्णु जहां नावे माथ ॥ कोट ब्रह्मा जहां
पढे पुरान । कोट शंभु जहां धरे ध्यान ॥ अखंड जोत जहां बरे
अथाह । बिरला साधू पावे थाह ॥ नाना बिध जहां करहिं केल ।
ते वह लोके रहे मेल ॥ प्रथम बसंत एक राग कीन्ह । सतगुरु
शब्द उधार लीन्ह ॥ गन गंधर्व मुनि गने न जाय । तहां प्रभु
आप बिराजे आय ॥ कहें कवीर ऐसो मत हमार । पतित उधारन
नाम सार ॥

बसंत ५७—चल हंसा सुख सागर घाट । तेरी हंसनी बैठी चितवे
बाट ॥ सार शब्दमें जाय देख । अति सुंदर तहां अति विशेष ॥

शब्दावली

(६७३)

तहवां अमृत मोती होय । हंसा भोजन करे सोय ॥ अमृत नीर जो पिये अघाय । जन्म जन्मकी तिरषा जाय ॥ आवागमनसे होय निश्चित । शब्द मांहि खेले बसंत ॥ जहाँ अनहद बाजा अति सुहाय । सदा बसंत जहँ अच्छे छाय ॥ षोडश सूरजके प्रमान । हंस एक उजियार जान ॥ श्वेत दीप जगमग प्रकास । पुहुप बसंतकी महके बास ॥ स्वेत सिगासन छत्र स्वेत । स्वेत वृक्ष तर हंस स्वेत ॥ केहि बिध हंस वा घर जाय । सार शब्दमें जाय समाय ॥ शब्द चाल चले शब्द मांह । ले पहुँचे धर्मदास बांह ॥ शब्द बिना नहिं पावे वाट । शब्द चूक परे औघट वाट ॥ चूके शब्द जम पकर लेह । फिर नर हमको दोष देह ॥ अपनी चूक जो समुझे नाहिं । ते नर अंथ बिगोय जाहिं ॥ चेतहु तो नर खोज लेहु । ना तो फिर फिर धरहु देहु ॥ सत शब्दकी कर प्रतीत । भौजलते चलो निहचे जीत ॥ जो कोह चाल नर चूक जाय । पंच अमीमें ध्यान लगाय ॥ सांची सुरत जो संग लेय । सागरमो पहुँचाय देय ॥ ऐसी रहन जो हंस होय । सुखसागर देखै सोय ॥ अमृत भोजन करे अहार । काया धर मैं कहाँ बिचार ॥ देखे दीपन दीपन हंस । तब नरको सब जाय संस ॥ सागर सुंदर अति गंभीर । सतसुकृत सो निर्मल शरीर ॥ हंस हंस झरे पुहुप अनंत । कहँ कवीर तहाँ करो बसंत ॥

वसंत ५८-सुखसागर जियरा कर अस्नान । जहाँ सुर नर सुनि नहिं पावैं ध्यान । बिन जल जहँवा उठे हिलोर । बिन पर-बत जहाँ कुहके मोर ॥ बिन सिंगी जहाँ सुनिये नाद । सत संगत पावे बड़े भाग ॥ बिनकर बाजा सुनिये ताल । परम परवावज अति रसाल ॥ बिन वग नटुवा नाचे नाच । बूझो संतो शब्द साच ॥

कबीरपंथी शब्दावली २२

(६७४)

कबीररंथी--

बिन नैनन देखो अति निनार । संतो ऐसो मत हमार ॥ जोत
बरे बिन बाती तेल । काह कहों कछु अगम खेल ॥ सुन रामा-
नंद गुरु प्रसाद । निरंतर भावे सुख स्वाद ॥ आशा मेटके गहो
ओट । साहेब कबीर दिल नाही खोट ॥

वसंत ५९—ऐसो दुरलभ जात है सरीर । भजु अर्चित जेहलागो
तीर ॥ गये बेनु बलि गये कंस । दुरजोधनके बुझो बंस ॥ पिरथु
गये पृथवीके राव । त्रिविक्रम गये रहे न कांव ॥ छौ चकवे
मंडलीके झार । अजहूं हो नल देखु विचार ॥ हनुमत कस्यप
जनक बालि । ये सब छेकल जमके द्वारि ॥ गोपीचंद भल कीन्ह
जोग । रावन मारेउ करत भोग ॥ जात देख नर सबहि जान ।
कहैं कबीर भजु सतनाम ॥

वसंत ६०—को कौन बिगूचे स्वामी मोर । ऐसे गर्भ प्रहारी
नाम तीर ॥ हरिचंद समान नहि दानी आनि । पुत्र सहित जिन
बेचे रानि ॥ उन अपने मन लियो जान । अधम डोम घर भरो
पान ॥ बलि बेनु विधना अजे चंद । लंक दहन रावको अंत ॥
सहज भुजा बन रहे ताहि । गये कौरव दल दुंद माहि ॥ कौरव
पांडव करन द्रोन । सतुवा में के भये लोन ॥ जरासिंध ससि-
पाल मार । कंस नृपतिको दाप झार ॥ अबके दुबहिंयां करत
रार । केते नृपति गये हाथ झार ॥ कहैं कबीर भुमियां करोर ।
को को न गये कर मोर मोर ॥ हमरे कहलको ना पतियार ।
आप बूढ़े नर सलिल धार ॥ अंध कहे अंधा पतियाय । जस
बेस्वाके लगन धराय ॥ सातो कहिये ऐसे अबूझ । खसम ठाठ
दिग नाही सूझ ॥ आपन आपन चाहै मान । झूठा पूजहिं
सांच जान ॥ झूठा कबहुँ न करिहैं काज ही बरजों तू सुनु
निलाज ॥ छांडो पाखंड मानु बात । ना तो परिहो जमके

शब्दावली

(६७५)

घात ॥ कहें कवीर नल कियो न खोज । भटक मुवै जस बनके रोज ।

बसंत ६१-खेलत बसंत मानो विरह संग । भौसागर वह नाना-तरंग ॥ कोइ जोग कर कोइ जह्व दान । कोइ नेम धरम पूजा पखान ॥ कोइ दंड कमंडल धुअपान । कोई उर्थ तपस्या गोड़-तान ॥ कोइ दानी होय फिरे उदास । कोइ अगिन जरावे चहुँ-पास ॥ कोई उर्थ कपाली कर आराध । कोइ निसबासर रहे निद्रासाध ॥ कोइ रिद्धि सिद्धिके मंतर जान । कोइ जोगी सुद्रा पहिर कान ॥ कोइ भेष धरी धर करहि स्वांग । कोइ सोधे धतुरा पोस्त भांग ॥ कोइ पीर औलिया करे निमाज । कोइ षटदर्शन में करत बाद ॥ कोइ छत्रधरी धर धजा निसान । कोई सनमुख सूरा खेतजान ॥ कोई उदे अस्त लो दहिन देत । कोई चार मास जल सेन लेत ॥ कोई अलह कहे कोइ कहत राम । हिंदू तुरक मिल धरहीं नाम ॥ कोई कहे ब्रह्म समाना एक । कहें कवीर लीला अनेक ॥

बसंत ६२-मन माया खेलत बसंत । सुर नर मुनि जाको लहे न अंत ॥ काम क्रोध मन मिलहि अंग । लोभ मोह साजेसुगंध ॥ पिचकारी तृष्णा तरंग ॥ मनसा सीचे सकल रंग ॥ जोगी भीजे जोगध्यान । पंडित भीजे पढ पुरान ॥ सुरआदिक भीजे असुर झार । ब्रह्मादिक भीजे मनहिं हार ॥ मगन माया कोई बरे भाग । निस बासर गुरु सरन लाग ॥ अब नाही भाजनके छोर । कहें कवीर भीजे सोर बोर ॥

बसंत ६३-रसना पढि लेहु श्री बसन्त । पुनि जाइ परिहौ जमके अंत ॥ जो मेरु दंडपर डंक दीन्ह । सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह ॥ तहं ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास । जहं अरध

( ६७६ )

कवीरपंथी—

उरध बहे बतास ॥ तहं नौ नारी परिमल गांव । मिलि सखि पांच तहं देखन धाव ॥ जहं अनहद बाजा रहल पूर । तहं पुरुष बहतार खेलै धूर ॥ ते माया देखि रहलि भूलि । जस वनरूपति बन रहल फूल ॥ कह कवीर यह हरिके दास । फगुआ मांगै बैकुंठ बास ॥

वसंत ६४—आयउ मेहतर मिलन तोहि । रिनु वसंत पहिरा-वहु मोहि । लम्बी पुरिया पाई झीन । सूत पुराना खूंदी तोनि ॥ सर लागे तीन सौ साठ । कसनी बहतार लागे गांठ ॥ खुर खुर खुर चालै नारि । बैठी जोलाहा पलथी मारि ॥ ऊपर नचनी नचि करै कोड़ । करिगह मां दुइ चलही गोड़ ॥ पांच पचीसौ दशौ द्वार । सखी पांच तहं रची धमार ॥ रंग बिरंगी पहिरै चीर । हरिके चरन धरि गाव कवीर ॥

वसंत ६५—बुठिया हँसि कह मैं नितहीं बारि । मोहि अस तरूनी कहु कौन नारि ॥ दांत गयल मोर पान खात । केस गयल मोर गँग नहात ॥ नयन गेल मोर काजल देत । बैस गेल पर पुरुष लेत ॥ जान पुरुषवा मोर अहार । अनजाने का कहं सिंगार ॥ कह कवीर बुठिया आनन्द गाय । पूत भरतारहि बैठि खाय ॥ ६५ ॥

वसंत ६६—बूझहु पण्डित कौनि नारि । कोहु न ब्याहल रहलि कुमारि ॥ सब देवन मिलि हरिहीं दीन । तेहि चारियु जुग हरि संग लीन ॥ प्रथमहिं पञ्चिनि रूप आय । है सांपिन जग खेद खाय ॥ ईश्वर युवति वै बार नाह । अति तेज तिया है रेंनि ताह ॥ कह कवीर सब जग पियारि । अपने बल कबै रहलि मारि ॥

वसंत ६७—माइ मोर मनसा अति सुजान । धन्धा कुटि कुटि करत विहान ॥ बडे भोर उठि आंगन बाहु । बडी खांच लै गोबर काहु ॥ बासी भात मनुष लै खाय । बड़ चैला लै पानी जाय ॥

सम्वादवली

(६७७)

अपने सैयां बांधी पाट । लै रे बेचौं ह्राटे हाट ॥ कह कवीर ये हरिके काज । जोइयाके दिगरे कौन है लाज ॥

वसंत ६८-घरहौमें बागुल बाठी रागि । अंग उठि उठि लागे चपल नारि ॥ वह बडी जाके पांच हाथ । तेहि पहुँचनके पञ्चीस साथ ॥ पञ्चीस बतावैं और और । वे और बतावे कई ठौर ॥ सो अन्तर मध्ये अन्त लेह । झूक झोरी झेला जिव देह ॥ सब आपन आपन चाहें भोग । कहु कैसे पारि है कुशल जोग ॥ विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमासा देखै सोइ ॥ मुख फारि हसैं सब राव रंक । तेहि धरन न पावै एक अंक ॥ नियरै बतावे खोजै दूरि । चहुँदिसि बागुलि रहल पूरि ॥ है लच्छ अहेरी एक जीव । ताते पुकारै पीव पीव ॥ अबकी बारि जो होइ चुकाव । कह कवीर ताकी पूरी दाव ॥

वसंत ६९-कर पल्लवके बल खेले नारि । पंडित होय सो लेह विचारि ॥ कपडा न पहिरे रहै उधारि । निरजीव सो धन अति पियारि ॥ उलटी पलटी बाजे तार । काहुहि मारै काहु उबार ॥ कह कवीर दासनके दास । काहुहि मुख दे काहु निरास ॥

वसंत ७०-सिव काशी कैसी भई तुम्हार । अजहुँ हा सिव देखु विचार ॥ चोवा चन्दन अगर पान । घर घर स्मृति होय पुरान ॥ बहु विधि भवनन लागैं भोग । अस नगर कोलाहल करते लोग ॥ बहु विधि परजा निरभय तोर । तेहि कारन चित्त है ठीठ मोर ॥ हमरे बालकको यहै ज्ञान । तोहरा को समुझावे आन ॥ जग जो जेहि सों मन रहल लाय । सो जिवके मरे कहु कहाँ समाय ॥ तहं जो कछु जाकर होइ अकाज । है ताहि दोष नहिं साहेब लाज ॥ हर हौषैत हो तब कहल भेव । जहं हमही हैं तहं दूसर केव ॥ दिना चार मन धरहू धीर । जस देखो तस कहहु कवीर ॥

(६७८)

कबीरपंथी—

होरी प्रारम्भ ।

होरी १—जिनको सत्संगति प्यारी । अहो खेलेत वसंत सुख-कारी ॥ टेक ॥ कथा अतर सरधा कस्तूरी, जतसत केशरलीनी ॥ भाव भक्तिकी गुलाल बनायी, भरि भरि सतगुरु दीनी ॥ ज्ञान भक्ति वैराग दयानिधि, मेलि अरगजा कीनो ॥ सील स्वातिको बन्यो कुमकुमा, ख्याल बन्यो रंग भीनो ॥ अनभय अचल भयो अभि अंतर, थकत भयो सब गाता ॥ भयो ज्ञान देह सुधि विसरी, सुनी खेलकी बाता ॥ ऐसो सतगुरु ज्ञान बतावे, जो कोइ शरनै आवे ॥ कहै कबीर ऐसो संत विवेकी, क्यों न परम पद पावे ॥

होरी २—काया नगर मंझार, संत खेले होरी । गावत राग सरस सुर सोहे, अति आनन्द भयोरी ॥ टेक ॥ चंदन सील सुगन्ध-अरगजा केसरि करनी गहरी ॥ अगर अगम सुगम करि लिन्हों, अभि डर अंतर धारी ॥ प्रीति फुलेल गुलाल ज्ञान करि, लेऊ जुगति भरि भोरी ॥ चोवा चित चेतन प्रकासा, आवत वास घनेरी ॥ त्रिकुटि महलमें बाजा बाजे, जग मग जोति उजैरी ॥ सहज रंग रंछि रह्यो सकल तन, छूटत नाहिं करोरी ॥ अनहद बाजा बजे मधुर धुनि, विन करताल तंबूरी ॥ बिन रसना जहाँ राग छतीसों, होत महों निधि पूरी ॥ सुन्न महल यक रंग मजलिस, कबहुँ टरत न टारी ॥ कहै कबीर समझि लेहो संतो, निरगुन कह्यो सदारी ॥

होरी ३—तुम होय निःशंक खेलो सम्हारी । मोह महा बल फंद रचो है, पकडत माया रसरी डारि ॥ टेक ॥ पाप पुन्य दोऊ मिलि खेलैं, कुबुद्धि सखा सब लिये लारि ॥ विसरावत सबहीनकी सुधि बुद्धि, काम क्रोधको गुलाल डारि ॥ डिम्भ कपट मुदंग

शब्दावली

(६७९)

डफ वीना, करम भरम बाजे करतार । अधर्म धर्म गावे राग
रागिनी, मोह लियो सगरो संसार ॥ आसा मनसा संग सहेली,
बडी अपरबल तीनऊँ नारी । वास लिये धावत जित तित ते,
सुर नर मुनि डारे पछारि ॥ त्रिविधि तापकी कठिन ठगौरी,
अपनी अपनी करत रारि । नाचत मन संग लिये इंद्रीयन, उपजावत
अति विषय विकार ॥ आये विवेक ज्ञान संग लिये, सत शब्द
गावे धमारि । शील संतोष भरि प्रेम पिचकारी, मदन मस्त को
दियो बिगारि ॥ पांच पचीस खेले निरभय होय, हिल मिलिकै
ये नौ सारी । रटना लगि सबै ये गावे, प्रेम आनंद होय मंगल
चारी ॥ मिलि सतगुरु जहां होरी खेलेँ, आवागवन को दुख निवारि ।
कहैं कवीर छोड़ि भवसागर, बहुरि न आवे या संसार ॥

होरी ४—मन राजा खेलन चले रंग होरी हो । काया नगर मंझार
राम रंग होरी हो ॥ टेक ॥ पांच पचीस मिलि खेलहि रंग होरी
हो ॥ मन राजा सरदार राम रंग होरी हो ॥ इंगला पिंगला
सुषुमना रंग होरी हो ॥ तिरवेनीके घाट राम रंग होरी हो ॥ ग्यान
गली ठाढे भये रंग होरी हो ॥ सुरति निरति दोउ लार राम रंग
होरी हो ॥ सील छमा छिडकत फिरे रंग होरी हो ॥ बाढचो रंग
अपार राम रंग होरी हो ॥ मेर डंड छाजे चढों रंग होरी हो ॥
डडता प्रेम गुलाल राम रंग होरी हो ॥ अनहद बाजा बाजई
बाजहि रंग होरी हो ॥ निरति करें सब नारि राम रंग होरी हो ॥
दास कवीर जहां खेलहि रंग होरी हो ॥ अविनासीके संग राम
रंग होरी हो ॥

होरी ५—ऐसे खेलत फाग सबे नारी । जाके हाथ लकुटिया
मुख गारी ॥ टेक ॥ यह यहते निकसी वन सुन्दर । भांति भांति
पहरे सारी ॥ अबीर गुलाल लिये भरि झोरी । मिलन चली

(६८०)

कवीरपंथी-

पियाकी प्यारी ॥ अपने अपने झुंडन मिलिकै । गावत ब्रिघ
तरुन बारी ॥ पहुँची जाय जहां हरि मन्दिर । बर बैठे मूरति धारी ॥
एकनि चंदन केसरि छिडकै । एकनि मुट्टी भरि भरि डारी ॥ एक
सन्मुख ठाढी कर जोडै । एकनि हाथ चँवर ढारी ॥ को चितवै
को बोलै कासों । निजीव रूप कहुँ कारी ॥ निहुरि निहुरि सब
पांव पडत हैं । यह देखो अचरज भारी ॥ सब सहेली बहुरि चली
घर । कोई न संग रही प्यारी ॥ आपु नहीं भुले नर नारी । प्रान
पियाकी गति न्यारी ॥ यह सब भरम छाडिदे वारी । अब जिन
जन्म जुवा हारी ॥ कहैं कवीर अपनपौ चीन्हो । सुखसागरमें
सुखकारी ॥

होरी ६-जग होरी मच रही है भारी । तुम संतो खेलौ संसारी
॥ टेक ॥ जड़ चैतन दोऊ रूप बनाये एक कनक दूजी नारी ॥
पांच पचीस संग लियै अबला हँसि हँसि मिलि गावै गारी ॥
डिम्भ कपट लिये करमें डफ हूँबड हूँबडकी तारी ॥ त्रिगुन ताल
तबला बाजे आसा तूछना गति न्यारी ॥ पाप पुन्य दोऊ भरि
पिचकारी छूटत है बारंबारी ॥ सन्मुख होय करि जो वह खेले,
ताके छीट लगी कारी । चोवा चंदन अबीर अरगजा माथकी
गार भरी ॥ षट दर्शन पाखण्ड छीयानवे पकडि किये सब वेगारी ॥
कुमति गुलाल डारि मुख मीडै काम कला पुटरी मारी ॥ सुर
नर मुनिजन पीर औलिया भजि रही सब संसारी ॥ चतुरा फगुवा
देदे छुटे मूरखको लागे प्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू
निर्गुन ग्यान गली न्यारी ॥

होरी ७-ऐसे खेले संत सदा होरी । जहां दुंद उपाधि नहीं
कोरी ॥ टेक ॥ ताल मूल सुर साधि बाट घर । पश्चिम दिशा
चढ़ि गहि डोरी ॥ खुले कपाट सहज घर पावों । सुंदर रूप सुरति

शब्दावली

(६८१)

गोरी ॥ जहाँ चतुर सखी नित गावहिं । बाजत वूर देत तारी ॥
सुर नर मुनि सब करत कौतूहल । ग्यान गुलाल उडत भारी ॥
कोइ निरगुन कोई सरगुन राचे । आप आप विसरे सबही ॥
कहैं कवीर चेत नर प्रानी । शब्द सरूप मिलै अबहीं ॥

होरी ८—म्हारको खेले ऐसी होरी । जामें आवा गवनकी है
डोरी ॥ टेक ॥ श्रवन न सुनयो नैन नहीं देख्यो । पीया पीया
लागि रही लौरी ॥ पंथ निहारत जनम सिरानो । प्रगट मिल्यो
नहीं चोरी ॥ जा कारन गृह तजिकै निकसी । लोक लाज कुलकी
तोडी ॥ चोवा चंदन अगर कुमकुमा का पर डारों रंग रोरी ॥
येकन तो मृगछाला वोडी येकन गुदरी अरु झोरी ॥ येकन बहु
विधि स्वांग बनायी । लोगन लागी ठगोरी ॥ जगन्नाथ बढ़ी रामेश्वर ।
देश देशान्तर सब दौरी ॥ अरसठ तीरथ पृथ्वी प्रदक्षिना । पुहकर
हूमें लट बौरी ॥ वेद पुरान भागवत गीता । चारिउवरन दंडोरी ॥
कहैं कवीर सद्वरु दया बिन । भरम न मिटि है ये बौरी ॥

होरी ९—आवो पीया संग खेलो होरी । सुरति शब्द सो लो
जोरी ॥ टेक ॥ नाना रंग सबै बनि आवौ । ग्यान गुलाल भरे झोरी ॥
चित चरचा चंदन मन लावौ । केसरि भरि पिचकारी ॥ प्रेम प्रीति
प्रकास परम गुरु । सत सुकृत वर पायोरी ॥ तब मन थिर भयो
थिति पाई । आदि अंत दीप लायोरी ॥ तत पद सार संगति
सतगुरुकी । कहैं कवीर सम आयोरी ॥

होरी १०—आओ पीया संग खेलो होरी । सुमति सखी मुनि
मुनि दौरी ॥ टे० ॥ करम जंजीर काटि सतगुरु सब । जरा मरनको
गयो भौरी ॥ सत संतोष शील मति थिर होय । खेलो फाग
विचारोरी ॥ अग्र अमी अबीर ले आओ । काम क्रोध तजि दोउरी ॥
भाव भक्ति अरु सही सलामति । सो पद पायो नाम उधोरी ॥

(६८२)

कवीरपंथी—

सुख आनंद सब होरी खेलो । काल कठन भरम भयो हरी ॥
कुलकौ त्याग मान सब तोरी । कहैं कवीर पिया संग होरी ॥

होरी ११—हरि होरि हो हरि होरी । हरि होरि मैं हरि होरी ॥
कोई साधु संत खेलैं होरी । सतनामको डांडो रोप्यौ धरम धजा
गहि जोरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मुदंग झांझ डफ । नाचत है
तन मन तोरी ॥ वंसी बीन अनहद धुनि बाजे । जसि मति सुमति
नाचे गोरी ॥ चोवा चंदन और कुमकुमा । अबीर लिये भरि भरि
झोरी ॥ उडत गुलाल विसाल लाल रंग । रंग रही गगन गरक
गोरी ॥ जब अंतर पट गांठि दइही । अब पायो है पट जोरी ॥
कहैं कवीर अखंडित फगुवा । जुग जुग पावो मति मोरी ॥

होरी १२—सतगुरु संग रचि है धमारि होरी मैं खेलूंगी ॥ टेक ॥
साधु संत मिलि मंगल गावें । लगी शब्दकी मार ॥ उडत गुलाल
अरुन भयो अंबर । प्रेमकी परत फुहार ॥ चोवा चंदन और
अरगजा । पिचकारिनकी मार ॥ दास कवीर स्वामी निरगुन
गावे । संतो लेहु विचार ॥

होरी १३—मेरे सतगुरु दियो बताय मारग नामका ॥ नाम
नाम करि जाये पहुँच । पाय अभय पद धामका ॥ टेक ॥ वा
मारग मोहि ले चलि सजनी । जहां पियाको देस ॥ परसों चरन
कमल नागरके । मेरो रहै सुहाग हमेश ॥ आयो फाग वसंत
सखीरी । फूले आंब पलास ॥ कली कली कलियाँ खुली । सब
संतन भयो विलास पांच पटे लनि खेलन निकसीं । सखी पचीसों
साथ ॥ खेलै फाग वसंत पांच मिलि । अपने अपने हाथ ॥
ज्ञान गुलाल करनी करो । अन भौ करो अबीर ॥ अमृत पिचकारी
भरो प्रेमसे । छिड़को सकल शरीर ॥ मैं हारी पीया मारग पायो ।
ले सतगुरुकी रीति ॥ कहैं कवीर सतलोक पहुँचे । साहेबकी प्रतीति ॥

शब्दावली

(६८३)

होरी १४-प्रीतम आइया हो मेरे सतगुरु दीन दयाल ॥ टेक ॥
बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । परम सनेही नाम ॥ साधु संतसो
अति अभिलाषा सब विधि पूरन काम ॥ जैसे चातक स्वाति
बुन्दको । रटत है आठों जाम ॥ जाकी सुरति लगी सतगुरुसे ।
विसरी सुखके धाम ॥ आनंद मंगलचार परम सुख । अमर करत
है जीव ॥ सुमिरनदे सतलोक पठाये । ऐसे समरथ पीव ॥ चरन
कमल सतगुरुकी सेवा । मन चित्ते अजुराग ॥ कहै कबीर ऐसी
होरी खेले । जाके पूरन भाग ॥

होरी १५-ये होरी खेलूंगी मेरे साहेब आवेंगे आज ॥ हंस
उबारन जीव निसतारन अधम उधारन नाम ॥ टेक ॥ करनी
कलश से जोय सकल विधि । प्रीति पात्रदे डारि ॥ चरण प्रछालि
चरणाभूत लेऊँ । मनकी मनी उतारि ॥ तन मन धन सब अरपन
करिहुँ बहु विधि आरति साजि ॥ प्रेम मगन होय मंगल गाऊँ
विसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूरि उड़ाय शरीरते ज्ञान गुलाल
प्रकास ॥ पारस पान लेऊँ प्रीतमसों मेटि दूसरी आस ॥ दया
धरमकी केसरि घोरों भाव भक्ति पिचकार ॥ सत सुकृत दोउ
अबीर अरगजा देऊँ पिया पै डार ॥ साहेब कबीर मोहि मिले
सतगुरु फगुवा दीनों है नाम ॥ आवागमनकी मिटि कलपना
पाये सुखकी धाम ॥

होरी १६-होरी होरी रंग बोरी विरहा झकोरि मारी ॥ टेक ॥
चौवा चाल अरगजा रहनी करनी केसर घोरि ॥ प्रेम प्रीतिसों
भरि पिचकारी हूंम हूंम रंगी सारी हमारी ॥ बाजत ताल मृदंग
बिना कर बीना शब्द रसाली ॥ खेलत है कोइ सुघर खेलैया योग
जुगति लगि तारी हमारी ॥ इंगला पिंगला रास रच्यो है सुखमनि
बाट बुहारी ॥ सुरति निरति दोउ नाचन लागी बढयो रंग रति

(६८४)

कवीरपंथी-

अपारी ॥ मैं वारी ॥ या विधि होरी खेली संतो या होरी दिन
थोरी ॥ गुरु कवीर आतम परमातम खेलेत बहियाँ जोरी ॥ मैं
वारी ॥

होरी १७-होरी खेलेन न जाने यह मन निपट अनाडी ॥टेक॥
काम क्रोध मद लोभ मोहकी सिर घरि गागर भारी ॥ उठी पैठ
सौदागर आयो का करै बनज व्यापारी ॥ येक भरे येक भरि
भरि लै आवैं दूजे भरनकी वारी ॥ पियाकी सुहागिनी पिया संग
खेलै। और सब भई न्यारी ॥ या घट भीतर पांच मवासी और
पचीसों नारी ॥ इन्हें मारि होरी खेलैं पियारे काज सुधर जाय
सारी ॥ छमा दयाको अबीर बनायो सुमतिकी भरि लई झोरी ॥
कहैं कवीर सुनो भाई साधो या विधि खेलो होरी ॥

होरी १८-का संग होरी खेलिये हो वालम परदेसुवा ॥टे०॥आई
ऋतु वसंतकी हो फूलन लागे केसुवा ॥ वसन गीले पहरन लागे
विरहिन डारत आंसुवा ॥ भरि गये ताल तलैया सागर बोलन
लागे देसुवा ॥ उमंगी नदी नाव कहाँ पै कौनी विधि लिखौ सँदेसुवा ॥
वहाँके गये बहुरे नहि हो कैसो है वा देसुवा ॥ आवत जात लखै
नहि कोई या जिय बड़ अन्देसुवा ॥ बालापनकी अबलौं निवाही
अब तो निवहै कैसुवा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो मिलि
सतगुरु उपदेसुवा ॥

होरी १९-मन लागि रह्यो होरी सत्सुकृत नाम दुलारेसो ॥टेक॥
आवागवन मिटै जब प्रानी जब छुटै यम द्वारे सो ॥ एक नाम विनु
पार न पैहो हिन्दू तुरुक नर नारी सों। स्वासा सार तार निस्सि-
वासर उठत घोर झनकारे सो ॥ सतगुरु पद प्रतीत भई है अगर
मुहंगम मारे सो ॥ सतगुरु दरश परस पद पड़है मिलि सुकृत

शब्दावली

(६८५)

सठि हारेसौं । कालके करम जाल सब छुटैमिलि कवीर मत
वारे सो ॥

होरी २०—खेलत फाग वसंत रैन दिन सहज सून्यमें होरी
॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति त्रिकुटी महल रचोरी ॥
गुंजत भंवर कोकिला बोले सोहँ सोहँ सोरी ॥ बाजत ताल मृदंग
झाँझि अगम निगमकी झोरी ॥ मानों कोटि भान ससि उगे
जहां मनुवां विलगोरी ॥ सुरति सुहागिनि मन लिये मनुवां दिये
सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि ब्रह्मज्ञान झकझोरी ॥

होरी २१—हमारे को खेले ऐसी होरी, जामें आवागवन लागी
डोरी ॥ श्रवण न सुनो नैन नहीं देखो, पिया पिय लागी लौरी ।
पंथ निहारत जनम सिरानो, प्रगट मिले नहीं चोरी ॥ जा कारन
तुम गृह तज निकसे, लोक लाज कुल तोरी ॥ षट् दर्शन मिल
स्वांग बनाये, लोगन लाग ठगोरी ॥ अंग भभूत गरे भृगछाला,
कोइ लाये गुदर भर झोरी । चोवा चंदन अबीर अरगजा कपड़ा
दे रंग रोरी ॥ जगन्नाथ बड़ी रामेश्वर, देश देशान्तर दौरी । अरसट
तीरथ पृथी पैकरमा, पोहकर मैं लट बोरी ॥ वेद प्रमान भागवत
गीता, चारों बरन टटोरी । कहैं कवीर सतगुरुके दया विन,
भरम मिटे नहीं भौरी ॥

होरी २२—कैसी मजा कर डारी, ऐसे होरीके खिलारी ॥ भारी
भ्रमकी सारी फारी, मानकी बेसर तोरी । लोभ मोहके कंकन फोरी,
प्रेमके रंगमें बोरी ॥ ज्ञान गुलाल परो नैननमें, देखत नहीं जग
सोरी । त्रिगुन बंद अंगिया टूटे, शब्द कुमकुमा मोरी ॥ नित्या
नित्य देत है गारी, लाज सरम सब तारी । एकहि भाव बिलास
करत है, कौन पुरुष को नारी ॥ पूरन प्रेमहि भूल गयो है, ऐसी
न देख धमारी । साहेब कवीर परख रंगरंगिये, परखके कीन्हे न्यारी ॥

(६८६)

कवीरपंथी—

होरी २३—ऐसी होरी खेलो, जामें डुरमत लाज रहोरी ॥ शील सिंगार करो मेरी सजनी, धीरज मांग भरोरी ॥ ज्ञान गुलाल उड़ाव सखीरी, सुमता फेंट गहोरी ॥ होत धमार नगर तेरेमें, अनहद बेन बजोरी । गुरुसे फगुवा मांग सखीरी, हृदया सत् करोरी ॥ संस्कृत भाषा पठ पठ आये, ज्ञानी लोग कहोरी । मोह मायामें बहि गये सजनी, जमके फंद परोरी ॥ खेती बनिज गऊ औ बाछा, चेला शिष्य करोरी । नाव लगी है पार लगनको, कालीदहमें परोरी ॥ मान मनीकी मटकी सिरपर, नाहक बोझ मरोरी । मटकी पटक मिलो सतगुरु सो, साहब कवीर कहोरी ॥

होरी २४—दिग अंजन नैन सँवार, काहूको मारोंगी ॥ टेक ॥ भौंह बनी बरछीकी नोके, नैन बने खरसान विरहके बान नैनसे छूटे, गोसा चढी कमान ॥ चंद्रबदन भृगलोचनी माया, कर सोरा सिंगार । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, इनको कीन्ही यार ॥ नरसे नार कियो नारको पुत्रसे साठ पदार । भुंगीरिषि पारासर देवा, इनको कीन्हा ख्वार ॥ जीव उबारन सतगुरु आये, तेरो लगे नहि लार । कहें कवीर सुनो भाई साधू, इनसे रहोहुशियार ॥

होरी २५—ऐसा रंग बनाया, मेरे नैनोमें समाया ॥ टेक ॥ पहिला रंग नबीजीका आया, जिन उमंद बगसाया । अलीजीके नाम रौशन दुनियामें, जीव जीव कलमा पढ़ाया ॥ दीन उन्हीने बनाया ॥ दुसरा रंग सोहै हम नैनको, जिनोंने सहादत पाया ॥ वे रनसूर लडे रन भीतर, सन्मुख सौस कटाया ॥ शहर कर्वलेका बसाया । तीसरा रंग सोहै पंजतनका, हूरे मंगल गाया । सिर सेहरा मुख मकना बिराजे, नूरके छत्र फिराया ॥ हाथ कंगन बंधवाया ॥ चौथा रंग रंगीले साहबके, रंग सबके

शब्दावली

(६८७)

मन भाया । औलिया अंविया गौस कुतब, या सब मिल रंग बनाया ॥ ध्यान मौलासे लगाया ॥

होरी २६-मेरे साहब आवन हार, होरी खेलोंगी ॥ करनीके कलस संजोय सकल विध प्रीत पांवडे डार । चरन पस्वार चरनामृत लेहौं, मनकी मनी उतार ॥ तन मन धन सब अरपन करिहौं, बहु विधि आरती साज । प्रेम मगन होय मंगल गावों, बिसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूर उडाव शरीरसो, ज्ञान गुलाल प्रकास । पारस पान लेवे सतगुरु सो, मेट दूसरी आस ॥ दया धर्म तन केशर घोरों, भाव भगति पिचकार । सत सुकृत अवीर अरगजा, देउंगी पिया पर डार ॥ साहब कवीर मिले मोहि सतगुरु, फगुवा दीन्हो नाम । आवागमनकी मेट कल्पना, पायो आनन्द धाम ॥

होरी ८-मेरे सतगुरु दीन दयाल, प्रीतम आयो हो ॥ टेका ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, अधम उधारन नाम । बंदीछोर मुक्तिके दाता, परम सनेही नाम ॥ साधु सन्त औ अति अभिलाषा, सब विधि पूरण काम ॥ जैसे चात्रिक स्वातिबूंको रटत है आठों जाम ॥ जिनकी सुरत लगी सतगुरु सों, बिसरे सुख ग्रह धाम । सतगुरु दया करत जीवन पर, देकर अविचल विश्राम ॥ आनंद मंगल उचार परम सुख, अमर कहत है जीव । सुमिरन दे सतलोक पठाये, ऐसे समरथ पीव । चरन कमल सतगुरुके सेऊं, मन चित दे अनुराग । कहैं कवीर ऐसी होरी खेले, जाके पूरन भाग ॥

होरी ९-होरी खेलत लालनके संग प्यारी, हम देखी सुसक्यान ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकार । क्षमा केशर ले छिरकन आई, सुरति-सोहागिन अविगतनार ॥