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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६७४)

कबीररंथी--

बिन नैनन देखो अति निनार । संतो ऐसो मत हमार ॥ जोत
बरे बिन बाती तेल । काह कहों कछु अगम खेल ॥ सुन रामा-
नंद गुरु प्रसाद । निरंतर भावे सुख स्वाद ॥ आशा मेटके गहो
ओट । साहेब कबीर दिल नाही खोट ॥

वसंत ५९—ऐसो दुरलभ जात है सरीर । भजु अर्चित जेहलागो
तीर ॥ गये बेनु बलि गये कंस । दुरजोधनके बुझो बंस ॥ पिरथु
गये पृथवीके राव । त्रिविक्रम गये रहे न कांव ॥ छौ चकवे
मंडलीके झार । अजहूं हो नल देखु विचार ॥ हनुमत कस्यप
जनक बालि । ये सब छेकल जमके द्वारि ॥ गोपीचंद भल कीन्ह
जोग । रावन मारेउ करत भोग ॥ जात देख नर सबहि जान ।
कहैं कबीर भजु सतनाम ॥

वसंत ६०—को कौन बिगूचे स्वामी मोर । ऐसे गर्भ प्रहारी
नाम तीर ॥ हरिचंद समान नहि दानी आनि । पुत्र सहित जिन
बेचे रानि ॥ उन अपने मन लियो जान । अधम डोम घर भरो
पान ॥ बलि बेनु विधना अजे चंद । लंक दहन रावको अंत ॥
सहज भुजा बन रहे ताहि । गये कौरव दल दुंद माहि ॥ कौरव
पांडव करन द्रोन । सतुवा में के भये लोन ॥ जरासिंध ससि-
पाल मार । कंस नृपतिको दाप झार ॥ अबके दुबहिंयां करत
रार । केते नृपति गये हाथ झार ॥ कहैं कबीर भुमियां करोर ।
को को न गये कर मोर मोर ॥ हमरे कहलको ना पतियार ।
आप बूढ़े नर सलिल धार ॥ अंध कहे अंधा पतियाय । जस
बेस्वाके लगन धराय ॥ सातो कहिये ऐसे अबूझ । खसम ठाठ
दिग नाही सूझ ॥ आपन आपन चाहै मान । झूठा पूजहिं
सांच जान ॥ झूठा कबहुँ न करिहैं काज ही बरजों तू सुनु
निलाज ॥ छांडो पाखंड मानु बात । ना तो परिहो जमके