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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६८३)

होरी १४-प्रीतम आइया हो मेरे सतगुरु दीन दयाल ॥ टेक ॥
बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । परम सनेही नाम ॥ साधु संतसो
अति अभिलाषा सब विधि पूरन काम ॥ जैसे चातक स्वाति
बुन्दको । रटत है आठों जाम ॥ जाकी सुरति लगी सतगुरुसे ।
विसरी सुखके धाम ॥ आनंद मंगलचार परम सुख । अमर करत
है जीव ॥ सुमिरनदे सतलोक पठाये । ऐसे समरथ पीव ॥ चरन
कमल सतगुरुकी सेवा । मन चित्ते अजुराग ॥ कहै कबीर ऐसी
होरी खेले । जाके पूरन भाग ॥

होरी १५-ये होरी खेलूंगी मेरे साहेब आवेंगे आज ॥ हंस
उबारन जीव निसतारन अधम उधारन नाम ॥ टेक ॥ करनी
कलश से जोय सकल विधि । प्रीति पात्रदे डारि ॥ चरण प्रछालि
चरणाभूत लेऊँ । मनकी मनी उतारि ॥ तन मन धन सब अरपन
करिहुँ बहु विधि आरति साजि ॥ प्रेम मगन होय मंगल गाऊँ
विसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूरि उड़ाय शरीरते ज्ञान गुलाल
प्रकास ॥ पारस पान लेऊँ प्रीतमसों मेटि दूसरी आस ॥ दया
धरमकी केसरि घोरों भाव भक्ति पिचकार ॥ सत सुकृत दोउ
अबीर अरगजा देऊँ पिया पै डार ॥ साहेब कबीर मोहि मिले
सतगुरु फगुवा दीनों है नाम ॥ आवागमनकी मिटि कलपना
पाये सुखकी धाम ॥

होरी १६-होरी होरी रंग बोरी विरहा झकोरि मारी ॥ टेक ॥
चौवा चाल अरगजा रहनी करनी केसर घोरि ॥ प्रेम प्रीतिसों
भरि पिचकारी हूंम हूंम रंगी सारी हमारी ॥ बाजत ताल मृदंग
बिना कर बीना शब्द रसाली ॥ खेलत है कोइ सुघर खेलैया योग
जुगति लगि तारी हमारी ॥ इंगला पिंगला रास रच्यो है सुखमनि
बाट बुहारी ॥ सुरति निरति दोउ नाचन लागी बढयो रंग रति