कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 695, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६८१)
गोरी ॥ जहाँ चतुर सखी नित गावहिं । बाजत वूर देत तारी ॥
सुर नर मुनि सब करत कौतूहल । ग्यान गुलाल उडत भारी ॥
कोइ निरगुन कोई सरगुन राचे । आप आप विसरे सबही ॥
कहैं कवीर चेत नर प्रानी । शब्द सरूप मिलै अबहीं ॥
होरी ८—म्हारको खेले ऐसी होरी । जामें आवा गवनकी है
डोरी ॥ टेक ॥ श्रवन न सुनयो नैन नहीं देख्यो । पीया पीया
लागि रही लौरी ॥ पंथ निहारत जनम सिरानो । प्रगट मिल्यो
नहीं चोरी ॥ जा कारन गृह तजिकै निकसी । लोक लाज कुलकी
तोडी ॥ चोवा चंदन अगर कुमकुमा का पर डारों रंग रोरी ॥
येकन तो मृगछाला वोडी येकन गुदरी अरु झोरी ॥ येकन बहु
विधि स्वांग बनायी । लोगन लागी ठगोरी ॥ जगन्नाथ बढ़ी रामेश्वर ।
देश देशान्तर सब दौरी ॥ अरसठ तीरथ पृथ्वी प्रदक्षिना । पुहकर
हूमें लट बौरी ॥ वेद पुरान भागवत गीता । चारिउवरन दंडोरी ॥
कहैं कवीर सद्वरु दया बिन । भरम न मिटि है ये बौरी ॥
होरी ९—आवो पीया संग खेलो होरी । सुरति शब्द सो लो
जोरी ॥ टेक ॥ नाना रंग सबै बनि आवौ । ग्यान गुलाल भरे झोरी ॥
चित चरचा चंदन मन लावौ । केसरि भरि पिचकारी ॥ प्रेम प्रीति
प्रकास परम गुरु । सत सुकृत वर पायोरी ॥ तब मन थिर भयो
थिति पाई । आदि अंत दीप लायोरी ॥ तत पद सार संगति
सतगुरुकी । कहैं कवीर सम आयोरी ॥
होरी १०—आओ पीया संग खेलो होरी । सुमति सखी मुनि
मुनि दौरी ॥ टे० ॥ करम जंजीर काटि सतगुरु सब । जरा मरनको
गयो भौरी ॥ सत संतोष शील मति थिर होय । खेलो फाग
विचारोरी ॥ अग्र अमी अबीर ले आओ । काम क्रोध तजि दोउरी ॥
भाव भक्ति अरु सही सलामति । सो पद पायो नाम उधोरी ॥