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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(६७२)

कवीरपंथी—

सोर ॥ पानी पावै आद अनाद । ग्रह सिंगी सब गयो है बाद ॥
जलुवा मलुवा दुनियां चोर । ये सब परे हैं कालके डोर ॥ दावन
कुता दूत लबार । ध्यान छाडि बकते अपार ॥ अदल नाम
चूरा मन ध्यान । ध्यान छाप बिन इच्छान ॥ साहब कवीर कहें
बसंत । ध्यान छाप बिन खेह पडंत ॥

बसंत ५५—सत सुकृत खेले रितु बसंत । करो अनंद दुख मेटो
संत ॥ जीवन सांच भल तबहीं होय । गुरुगम भेद लख पावे कोय ॥
लख चौरासीको कटे फंद । अमर करो मन छाडो दंद ॥ सोई
सोहागिन पियहिं चीन्ह । द्विष्ट मांहि रहे अति अधीन ॥ दरशन
शोभा रहे समाय । नहिं बिछुरे लिये संग जाय ॥ परष जान जब
नाम लीन्ह । रतन पदारथ लेव भीन ॥ कहें कवीर यह खरच
थार । अजर अमर घर रहो निनार ॥

बसंत ५६—सतगुरु खेले ऋतु बसंत । परम पुरुष जहां साथ
संत ॥ तीन लोकते भिन्न साज । सुनिये अनहद बाजे बाज ॥
कोट सूर्य जहां उगे अपार । बिरला जन कोई पावे पार ॥ कोट
सरस्वति करहिं राग । कोट इंद्र सुन गावन लाग ॥ कोट कृष्ण
कर जोरे हाथ । कोट विष्णु जहां नावे माथ ॥ कोट ब्रह्मा जहां
पढे पुरान । कोट शंभु जहां धरे ध्यान ॥ अखंड जोत जहां बरे
अथाह । बिरला साधू पावे थाह ॥ नाना बिध जहां करहिं केल ।
ते वह लोके रहे मेल ॥ प्रथम बसंत एक राग कीन्ह । सतगुरु
शब्द उधार लीन्ह ॥ गन गंधर्व मुनि गने न जाय । तहां प्रभु
आप बिराजे आय ॥ कहें कवीर ऐसो मत हमार । पतित उधारन
नाम सार ॥

बसंत ५७—चल हंसा सुख सागर घाट । तेरी हंसनी बैठी चितवे
बाट ॥ सार शब्दमें जाय देख । अति सुंदर तहां अति विशेष ॥