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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६८४)

कवीरपंथी-

अपारी ॥ मैं वारी ॥ या विधि होरी खेली संतो या होरी दिन
थोरी ॥ गुरु कवीर आतम परमातम खेलेत बहियाँ जोरी ॥ मैं
वारी ॥

होरी १७-होरी खेलेन न जाने यह मन निपट अनाडी ॥टेक॥
काम क्रोध मद लोभ मोहकी सिर घरि गागर भारी ॥ उठी पैठ
सौदागर आयो का करै बनज व्यापारी ॥ येक भरे येक भरि
भरि लै आवैं दूजे भरनकी वारी ॥ पियाकी सुहागिनी पिया संग
खेलै। और सब भई न्यारी ॥ या घट भीतर पांच मवासी और
पचीसों नारी ॥ इन्हें मारि होरी खेलैं पियारे काज सुधर जाय
सारी ॥ छमा दयाको अबीर बनायो सुमतिकी भरि लई झोरी ॥
कहैं कवीर सुनो भाई साधो या विधि खेलो होरी ॥

होरी १८-का संग होरी खेलिये हो वालम परदेसुवा ॥टे०॥आई
ऋतु वसंतकी हो फूलन लागे केसुवा ॥ वसन गीले पहरन लागे
विरहिन डारत आंसुवा ॥ भरि गये ताल तलैया सागर बोलन
लागे देसुवा ॥ उमंगी नदी नाव कहाँ पै कौनी विधि लिखौ सँदेसुवा ॥
वहाँके गये बहुरे नहि हो कैसो है वा देसुवा ॥ आवत जात लखै
नहि कोई या जिय बड़ अन्देसुवा ॥ बालापनकी अबलौं निवाही
अब तो निवहै कैसुवा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो मिलि
सतगुरु उपदेसुवा ॥

होरी १९-मन लागि रह्यो होरी सत्सुकृत नाम दुलारेसो ॥टेक॥
आवागवन मिटै जब प्रानी जब छुटै यम द्वारे सो ॥ एक नाम विनु
पार न पैहो हिन्दू तुरुक नर नारी सों। स्वासा सार तार निस्सि-
वासर उठत घोर झनकारे सो ॥ सतगुरु पद प्रतीत भई है अगर
मुहंगम मारे सो ॥ सतगुरु दरश परस पद पड़है मिलि सुकृत