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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६७१)

वसंत ५१—सबही मद माते कोइ न जाग । संगहिं चोर घर
सूसन लाग ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पढी पुरान ॥
तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते करि हमेव ॥ मुलना माते
पढी मुसाफ । काजी माते दे निसाफ ॥ संसारी माते माया घार ।
राजा माते कर हंकार ॥ माते सुखदेव ऊधो अकूर । हनुमत माते
ले लंगूर ॥ सिव माते हरि चरन सेव । कलि माते नामा जय देव ॥
सत सत कहै सुप्रित वेद । ऐसे रावन मारे घरके भेद ॥ चंचल
मनको अधम काम । कहैं कवीर भजो राम नाम ॥

वसंत ५२—जहाँ बारा मास बसंत होय । परमारथ बूझे बिरला
कोय ॥ बरषे अगिन अखंड धार । जहाँ विजुली चमके अति
अपार ॥ ससि भान बिना जहाँ प्रकास । हरियर भौवन अठारा
भास ॥ बिन पानी आद्र कहै लोय । पवन गये सब मिलन घोय ॥
बिन तरवर फूले अकाश । शिव बिरंचि तहाँ लेय बास ॥
सनकादिक भूले भँवर होय । लख चौरासी जिव गये बिगोय ॥
जो तोहि सतगुरु सत लखाव । कहीं न छूटे करनी भाव ॥ अमर
लोक फल देखो आय । कहैं कवीर जाने सो पाय ॥ १६ ॥

वसंत ५३—सतनाम तत्त्व तीन लोक सार । लवलीन भये सो
उतरे पार ॥ एक जोगी जुगवे जटाधार । एक अंग भभूत धारे
अपार ॥ एक मौनी सुखमौन लीन्ह । भ्रमत फिरे जुग जुगन छीन ॥
एक आराधे सकती सीव । एक पर दादे दे रटत जीव ॥ एक
कुलदेवीको जपत जाप । ऐसे त्रिभुवन पति भूले आप ॥ एक
अन्न छांडके पीवे दूध । हरि न मिले बिन हृदै सूध ॥ कहैं कवीर
चित चेतो अंध । नातो परिहो जमके फंद ॥

वसंत ५४—सतगुरु कँवल है सुख निधान । जहाँ मोरे लागा
अछै ध्यान ॥ सोहंग तार अखण्ड डोर । बानी मुक्तापरगट