सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 699

शब्दावली

(६८५)

सठि हारेसौं । कालके करम जाल सब छुटैमिलि कवीर मत
वारे सो ॥

होरी २०—खेलत फाग वसंत रैन दिन सहज सून्यमें होरी
॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति त्रिकुटी महल रचोरी ॥
गुंजत भंवर कोकिला बोले सोहँ सोहँ सोरी ॥ बाजत ताल मृदंग
झाँझि अगम निगमकी झोरी ॥ मानों कोटि भान ससि उगे
जहां मनुवां विलगोरी ॥ सुरति सुहागिनि मन लिये मनुवां दिये
सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि ब्रह्मज्ञान झकझोरी ॥

होरी २१—हमारे को खेले ऐसी होरी, जामें आवागवन लागी
डोरी ॥ श्रवण न सुनो नैन नहीं देखो, पिया पिय लागी लौरी ।
पंथ निहारत जनम सिरानो, प्रगट मिले नहीं चोरी ॥ जा कारन
तुम गृह तज निकसे, लोक लाज कुल तोरी ॥ षट् दर्शन मिल
स्वांग बनाये, लोगन लाग ठगोरी ॥ अंग भभूत गरे भृगछाला,
कोइ लाये गुदर भर झोरी । चोवा चंदन अबीर अरगजा कपड़ा
दे रंग रोरी ॥ जगन्नाथ बड़ी रामेश्वर, देश देशान्तर दौरी । अरसट
तीरथ पृथी पैकरमा, पोहकर मैं लट बोरी ॥ वेद प्रमान भागवत
गीता, चारों बरन टटोरी । कहैं कवीर सतगुरुके दया विन,
भरम मिटे नहीं भौरी ॥

होरी २२—कैसी मजा कर डारी, ऐसे होरीके खिलारी ॥ भारी
भ्रमकी सारी फारी, मानकी बेसर तोरी । लोभ मोहके कंकन फोरी,
प्रेमके रंगमें बोरी ॥ ज्ञान गुलाल परो नैननमें, देखत नहीं जग
सोरी । त्रिगुन बंद अंगिया टूटे, शब्द कुमकुमा मोरी ॥ नित्या
नित्य देत है गारी, लाज सरम सब तारी । एकहि भाव बिलास
करत है, कौन पुरुष को नारी ॥ पूरन प्रेमहि भूल गयो है, ऐसी
न देख धमारी । साहेब कवीर परख रंगरंगिये, परखके कीन्हे न्यारी ॥