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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(२९४)

कबीरपंथी—

शब्द तिनूकाका ।

जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥

एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥
सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु
हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार
बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥

शब्द कंठीका ।

पायो निजनाम गलेको हरवा ॥

सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार
कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर-
बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥
एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥

शब्द नामका ।

गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥

जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥
घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥
विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी
नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥

शब्द दीहल प्रारम्भः ।

आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं
तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार
न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे
नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन
मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश

शब्दावली

(२९५)

चौका महि, तामो लोन्हो चीन्ह ॥ कहें कवीर सुन आमिनी, रहो हमारी आस । जीवन पार उतारिहौं, होइ चूरामन दास ॥ १ ॥

दीहल कालज्ञान ।

पांच घरी वायें चले, सोई दहिने होय । दस स्वासा सुख-
मन चले, ताहि विचारो लोय ॥ आठ पहर जबही चले, पिंगला
माहीं स्वास । तीन बरस काया रहे, ता पीछे होय नास । आठ
दिना जबहीं चले, स्वासा रवि की ओर । दोय बरस काया रहे,
प्राण जाय तन छोर ॥ सोरह दिन जबहीं चले, भान दाहिने
होय । बरस दिना काया रहै, पीछे रहै न कोय ॥ बीस रैन औ
बीस दिन, चले दाहिनो स्वास । षष्ट मास काया रहै, ता पीछे
होय नास ॥ एक मास औ एक दिन, रविके पहरा होय । स्वास
सरोधा सत्य है, नर जीवे दिन दोय ॥ नहि चंदा नहि सूर है,
नहीं सुषुमना बास । सुख सेती स्वासा चले, पहरमें होय बिनास ॥
कहें कवीर विचारके, गहो शब्द टकसार । सत्य लोक हंसा चले,
आवा गमन निवार ॥ २ ॥ निज अनंद घर महलमें, करो सदा
सुखबास । सो वर चीन्हौं संतो, काटो जमके फांस ॥ निज
उत्तम घर आपनो, सो तुम चीन्हत नाहि । बिन चीन्है कहाँ
जैहो, यह बड़ अचरज आहि ॥ अबहुं कहो जो मानहु, उलखो
वचन हमार । दुबधा डुरमत छोड़के, चीन्हो वस्तु सम्हार ॥
पांचतत्व निज मूल है, करता इनहीं मांहि । नख सिख तन
निज ढारिया, सो कहुं अन्ते नाहि ॥ अनत होय तो को गढे,
यह तन सुंदर रूप । सकल साज एक बुंदमें, ऐसा ख्याल
अनूप ॥ अगिन पवन जल पृथवी, इनमें साहब जीव । पुहुप
मध्य ज्यों बास है, दूध मध्य ज्यों घीव ॥ घरमें जल जलमें
घर, बोलनहार संजोग । सांचे सांचे ढारिया सांचें सुख भोग ॥

(२९६)

कबीरपंथी—

तब जो हता सो अब है, फेर फार कछु नाहिं । बिन स्वरूपको साहब, सो कतहुं नहिं आहिं ॥ निगुण नाथ निरंजना, जिनके पिंड न प्रान । सो बर बरो सबन मिलि, कामिन रूप जहान ॥

गुरुमुख भई सगाई, सुमरन लागो नेह । तत्वको तेल चढ़ाय के, भूल गई गुन देह ॥ ज्ञानको मंडप छाइले, ध्यानको भराई ठाँव ।

बिन अक्षरको मंगल, बिन रसना गुण गाँव ॥ दूल्ह देव निरंजन, दृष्ट मुखसे चीन्ह । पृथी अकाशके बाहिरे, या विधि भाँवर दीन्ह ॥

भाँवर भई अनंद भये, अजहुं मिलना नाहिं । तन छूटे, गुरु दूटे तब वेगहि हैं बाँहिं ॥ ऐसी आशा अवधि बद, गये गुन राह बताय ।

नाम अधार सो रहगई, दुल्हिन अतिसुख पाय ॥ अवध पूजे जब आयके दुल्हिन, जोवैं बाट । तन छूटे वे ना मिले, कौन सहे अपघाट ॥

गोहरावे आवे नहीं, बिन देखेकी प्रीत । आप अपुन चीन्है बिना नहिं आवे, परतीत ॥ आशा भई निराशा, को आवे को जाय । भौजल नदिया भयावना, फिर फिर गोता खाय ॥

अगम अगाह अथाह है, थाह न पावे कोय ॥ सतगुरु थाह थहावे, जीवन मुक्ता होय ॥ जा कारण जग नाचिया, नाना भेष बनाय ॥

सो ना मिलौ ना मिलि हैं, नाहक गोता खाय ॥ बिन परचे जिन भूलियो, कहैं कबीर विचार । जिनको परचे अब भई, तिनके अटल दिदार ॥ ३ ॥

सुखसागर सुख विलसहू, छाँडो दुखकी आस अपने जिवन धन चीन्हहू, सब सुख तुम्हरे पास ॥

जुगल रूप जग भीतरे, कांता कामिनि नेह । अष्टधातको जुगल तन, एक प्रान दोय देह ॥ तन सूरत मन मूरत, साहब बोलन हार । नर नारी सुख बिलसो, करता सिरजन हार ॥

यह छबि आय सकल विधी, दुखका मूल बिसार । एक बुन्दते सिर-जिया, एकहि है करतार ॥ आपुहि तखत बनावै पानी पवन

शब्दावली

(२१७)

संयोग । अष्ट धातके महलमें क्रीडाकरे सुखभोग ॥ आपुहि राजा परजा, आपुहि रंक फकीर । आप सर्व गुन आगरे, आपुहि गुन गंभीर ॥ आपुहि जती सती है, आपुहि है दयापाल । आपुहि जोगी जंगम, आप कियो विस्तार ॥ आपुहि गावै बजावे, आपुहि तोरे ताल । आपुहि लखे अपन पौ, आप अपुनमें काल ॥ आपुहि करे करावै, लेय औरको नांव । आपुहि खलक ऊजरे, आप बसावे गांव । जुग असंखलो शंकर, धरे सुन्नमें ध्यान । उनहुँ न लखो अपुनपो, तू नर कयोँ वौरान ॥ ब्रह्मा विष्णु थकित भये, खोजत पार न पाय । औरन्हकी मति केतिक, नाहक गोता खाय ॥ शिव सनकादिक नारद, शारद शेष सुरेश । अस्तुति करत थकित भये, उनहुँ न कहा संदेश ॥ एके जपै निरंजन, निर्गुन और निरंकार । पाँच तत्वके बाहिरे, उनके भये अकार ॥ अलख अपार परम गुरु, अरु मूरत वे पिंड । औगह अगह अवीज है, जोत सरूप अखंड ॥ सुध बुध वा पहुँचे नहीं, महा कठिन ऊ पंथ । सुमिरन साखकी खबर नहीं, कथकथ मरे ग्रंथ ॥ हाथ माथ पग पिंड बिन, केतिक बडो वह कोड । किसबिध चेरी आगरी, किसबिध खसम निगोड ॥ कथकथ मुनिजन उडगये, जस भैवे अकाशे गिद्ध । चारा वाके भुई धरो, कहा उडे भये सिद्ध ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्ध, कोट अनंतन दास । उनहुँ न लखो अपुनपो, भरमत फिरत उदास ॥ कस्तूरी है कुंगरंग, चले पवनके बास । मृगमध्य नाभी बसे, मृग दूँडे वन घास । कहैं कवीर अब कहतहुँ, डार भर्मकी मोट, अपनो भलो जो चाहऊ, परखलेउ खर खोट ॥ ४ ॥ सुन्न सरोवर भीतरे, तीरथ एक अनुप । तेज पुंज जहां झलकई, प्रगटे जोत स्वरूप ॥ कदल कमलदल अंतरे, रजनी बासर नाहिं । अनहद घंटा बाजई, पाँच

(२९८)

कवीरपंथी-

सुत्रके माहिं ॥ कंचन कूट औटाइले, भिन कबहुँ नहिं होय ।
परमल बास पलासकी, काष्ठ कहे नहिं कोय ॥ काष्ठ माहिं पावक
बसे, ज्यों तिल मद्धे तेल । जुक्ति बिना नहिं नीकसे, ऐसा अद्धुत
खेल ॥ परम पुरुष संग दुलहिन, खेलै आतम सार । एक वरण
एक अंक है, एक रूप अनुहार ॥ साहब कवीरके दीहल, सुनियो
संत सुजान । समुझत सुख ऊपजे, नातो दुकख निदान ॥ ५ ॥
सुकृत फूल गुलाबके, सबघट रहो समाय । कहु कैसेके पाहये,
गुरु बिन लखो न जाय ॥ तीन त्रिकुटीके ऊपरे, फुलै सोहंगम
फूल । जहां न धर्मकी आसना बिन अझर निजमूल ॥ चार
जोजनके ऊपरे, पुरुष विदेही पूर । जगरमगर वह नग्र है, बाजत
अनहद तूर ॥ अपने ठीका हम खडे, सतगुरु दिया बताय ।
खिरकी खोल दिखाइया, राह गगनकी जाय ॥ कहैं कवीर धर्म-
दास सों, प्रगट दीहल बताय । सो हंसा भल पावई, नहिं आवे
नहिं जाय ॥ ६ ॥ अचरज देखो कामिनी, कहतेको पतियाय ।
अधर साहब हम देखिया, सतगुरु डंडिया फँदाय ॥ चंद सूर
जहँवां नहीं, जहां न धरनि अकास । तीन पुरुष मोरे प्रीतम,
केहि विधि करो निवास ॥ गुरु दर्शनके कारने, सरवस देउँ
लुटाय । एक पलकके बीछुरे, अब मोहिं कहु न सोहाय ॥ गुरु
दरसन हम पायल, छूटल कुल परिवार । अब जहँ पुर आपने,
परख परख टकसार ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों, हिरदे करो बिचार ।
अरस परस करो कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ७ ॥ दरिया पार
हिंडोरना, दीन्हो कंथ बताय । कोई एक नार सुलक्षनी, हरदम
झूलै जाय ॥ अरध उरध दोय खंभ हैं, सुखमन लागी डोर ।
जेठी सुतं सम्हारले, रचले गगन मन मोर ॥ द्वादश केर हिंडोरना,
झूलै पाँचों नार । मेघ घटा घन गरजई, पिय बिन जग अंधियार ॥

शब्दावली

(२९९)

अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय
नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर
मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥
कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें,
बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल
संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत
बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी,
आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर
जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार
बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन,
तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा
नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना
नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई,
सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय ।
सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं
थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम
अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय ।
हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन
जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो
सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना
जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी,
जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥
सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न
आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी
बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब

(३००)

कवीरपंथी-

कवीर कहि दीहल, सुनियो हो धर्मदास । निर्गुन केर सुलच्छनी,
निर्गुण कियो निवास ॥ १० ॥ आरती साजहु दुलहिन, आवहि
कंथ सबेर । निर्गुण मंगल गावहु, अब जिन लावहु बेर ॥ तन
रुइया कर बातियां, मन तिलको कर तेल । सुरत हाथ दियना
धरो, निरत चली कर केल ॥ अच्छे पलंग जहाँ पचरंग, सो रे
बिछावौ झार । सुषुमन सेज सँवारहु, सुकृत गढवा धार ॥ हँसिके
प्रीतम आइया, बिहँसि के लीन्हो पाय । सुख देखत सुख ऊपजे,
सुमिरत कर्म कटाय ॥ ईगला लिये कर झारी, पिंगला पंखा गाँस ।
सतगुरु शब्द सहायक, पहुँच पियाके पास ॥ हियरा गहभर
भेटिया, सुक पलोटे पांय । सुख देखत सुख ऊपजे, तनकी तपन
बुझाय ॥ कहैं कवीर धर्मदाससो, सुनियो संत सुजान । पिया
मिलो सुख बिलसो, जम जीतो मैदान ॥ ११ ॥ भौसागर मोर
नइहर, निर्गुण सासुर मोर । आवत बटिया भुलानी, काल करे
घन घोर ॥ आग लगे वह नइहर, धोख परे असगार । सास ननद
झगरा करे, नित उठ माँडे रार ॥ अनचिन्ह ससुरे के लोगवा,
नित उठ लावे दोस । पार परोसिन बैरिन, एक पियाके भरोस ॥
बालम मंदिर छवायेल, झलके अघर अकास । छिन छिन बदन
निहारत, देखत बहुत हुलास ॥ प्रेम सुरत गहु कामिनि, जामों
निर्गुन बास । परम अनंद सुफल भये, जम माने (जाके) त्रास ॥
बहुर न या जग आइहो, बहुर न धरिहो देह । साहब कवीर
कहि दीहल, निरख परख कर लेह ॥ १२ ॥

मिलरहु सखी री तू मिलरहु, अपने पिया सुख जान । नइहर
आपन कोई नहीं, जासों करो पहिचान ॥ मोरे जीवको भावतो,
छाय रह्यो वही देस । मैं विरहिन निशदिन फिरों, कर जोगिनको
भेस ॥ तात मात कोई संग नहीं, संग नहीं सग भाय । काम न

शब्दावली ।

(३०१)

काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी,
तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥
कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी
तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय ।
कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥

दीहल आगन तान ।

पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर
घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस-
कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥
गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न
आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र
गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥
स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे,
हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव ।
चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन
संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो
पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द
उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच
नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥
जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो
बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके
घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे
पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर,
उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार ।
जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया-
वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल

( ३०२ )

कवीरपंथी—

टकसार ॥ बिन हंस हंस न पहुंचई, बीचाहिं परे भुलाय । काल
कठिन भरमावई, कामिन परे उरझाय ॥ हंस हंस मिलि लेचले,
जहां पुरुष रहिवास । साहब कवीर कहि दीहल, निर्गुन अथर
निवास ॥ १५ ॥ सहतेजी चित् चेतहु, सुमिरो नाम अथार ।
हंसन पार उतारहु, परख २ टकसार ॥ भौसागर बड दारुन,
विषके लहर फिराय । बिन सतगुरु नहिं बांचिहो, सबै काल
धरखाय ॥ मोरहु नरियर मोरहु, आपन अंस विचार । काल
कठिन दुर्गदानिया, काह करे झखमार ॥ सहतेजी चित् चेतहु,
काल कठिन बल जोर । लगन साध परमोधहु, पला न पकडै
चोर ॥ निर्गुन नाम निअक्षर, सुमिरत कर्म कटाय । साहब
कवीर कहि दीहल, सहतेजी ससुझाय ॥ १६ ॥ चार कमल
चित् चेतहु, जहां जीवको बास । जुग जुग पान सुधारहु, मेटो
जमको त्रास ॥ कमल तत्त्वचित् चेतहु, जिव ना नसे तेह मांह ।
लगन सनेह बिचारहु, देउ हंसको बांह ॥ जाहि कमल बस
जीयरा, ताहि लगन देव पान । प्रीतम जैसुन जगपती, हंस होय
निरवान ॥ या बिधि भेद बिचारहु, निरखो तत्त्व निसान । तब
छुटिहै भौसागरा, जिव कहं पहुंचे यान ॥ कमल तत्त्व नहिं
दरसई, जिव धोखे पर जाय । परमोदिक भये दारुन, राखो
काल झुलाय ॥ राये बंकेज बिचारहु, जीवन करहु सुधार ।
साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १७ ॥ राज
बरन जुग बांधहु, भांवर सती सनेह । येही गमन करो दुलहिन,
बहुर धरो जिन देह ॥ चंपा पहूम चमेलिया, लाये करेउ बनाय ।
तिलक लिलार सम्हारहु, जमकी दासी छुड़ाय ॥ हंस हंस जुग
बांधहु, चौदह पवन लखाय । शब्द चित्त गहु दुलहिन, कोटिन
कर्म कटाय ॥ जाहि पवन पर शशि बसे, चित्त गहि रहे चकोर ।

शब्दावली

(३०३)

और दिसा चितवे नहीं, ऐसा सुरत वहि ओर ॥ शिव शक्ती जल अर्पई, गुरुके बचन प्रमान । जन्म सो अम्बर दुलहिन, जम जीतो मैदान ॥ सीस मटुकिया गहिलहु, सुक्ती देहि सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १८ ॥ गुंज-वरन जुग बांधहु, लगनहिं लगन विचार । निरखके पान सुधारहु, कबहुं न होवे द्वार ॥ दीप दीप जम बैठल, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ जम पाटन जे जीतले, तिनपर माँगे लेख । गुरुजी लगन सुधारहु, दिखलो जमहिं बिसेख ॥ अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर । सुर नर मुनि सब खायल, काल कठित बल जोर ॥ शेष सहस मुख विनवई, ब्रह्मा जमकी ओर । साहब कवीर कहि दीहल, लेख देखहु सोर ॥ १९ ॥ मनहिं आनंद दुलहिन, बिहँसत बोली बात । भौसागर बड संकट, चौदह लगी जगात ॥ प्रभुजी लगन विचारले, देखले जमहिं बिसेख । जिन जम पाटन परसिले, तिनपर माँगे लेख ॥ दीपन दीप जगातियां, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ सुर नर मुनि सब अटके, काल कठिन बलजोर । शेष सहस मुख विनवही, ब्रह्मा जाके चोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, लेखा देव चुकाय । जमको मस्तक तोरके, अमे निसान बजाय ॥ २० ॥ बासर लगन विचारहु । कटे कर्मकी डोर । सुखसागर पहुंचावहु, जमसों तितुका टोर ॥ राज बरन होती कामनी, तासम होते कान्ह । कर्म काट दे भाँवर, जमकर मरदोमान ॥ चंद लगन चित चेतहु, उतरो भौजल पार । निरख परख गुरु परसिहौ, परख परख टकसार ॥ धरती रथ चढो कामनी, कटे कर्मके फंद । हंस हंस जुग बांधहु, अब जिव करहु अनंद ॥ सहतेजी शरनागती,

(३०४)

कवीरपंथी-

कोटन कर्मकटाय । साहब कवीर कहि दीहल, अभै निसान बजाय ॥ २१ ॥ पान छत्रपत कर धरो, अनभो संधि विचार । विषम त्रिश् जमकी दसी, रेख गुंज निरवार ॥ जुगकी रेख सम्हारहु, पान अखंडित सार । जाते हंस न बीगरे, चंद लगन बिस्तार ॥ चार तत्व घटमें धरो, पाँचि लेहु समोय । जेहि अक्षरते जिव भयो, ताते हंसा होय ॥ वहि अक्षरते सब भयो, लोक दीप अस्थूल । ताको चीन्हो संतो, वहि अक्षर निजमूल ॥ चार कमल घट भीतरे, परखो संत सुजान । जामें बासा जीवको, तहां सुधारो पान ॥ आन कमलमें जिव बसे, अंते पान प्रकास । अघर पान जम लेत है, जीव परे जम फाँस ॥ चारों मोहर सुधरहु, अंक छत्रकी छाँह । लक्षण लगन बिचारिके, देहु हंसको बांह ॥ सतगुरु संधि सम्हारहु, सब बिधि पूरन होय । सुरत निरत गहि धर्मनी, देखो शब्द विलोय ॥ पान छत्रपति साजहु, जुगकी रेख सुधार । कहैं कवीर धर्मदाससो, हंस उतारो पार ॥ २२ ॥ सुमिरहु कामिन सुमिरहु सुमिरहु आपन नाह । अघर साहब हम देखिया, जहवाँ धूप न छाँह ॥ बिनही घटा घन गरजई, बिन जल तिरथ नहाय । देखतही सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ बिन पानीको जीवन, बिन दीपक उजियार । ऐसो निर्गुण देखले, परख शब्द टकसार ॥ साहब कवीर कहि दीहल, अग्र सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म सुफल भये, पाये मुक्तिको मूल ॥ २३ ॥ कौन हंसको खेल है, कौन मुक्तिको दाव ? । कौन अमृतको कूप है, कौन व्रजको घाव ? ॥ सुरत हंसको खेल है, भक्ति मुक्तिको दाव । छिमा अमृतको कूप है, शब्द वज्रको घाव ॥ बन बन टूटत का फिरे, अंदर फूली बेल । तोहीमें तेरो धनी, ज्यों तिल मद्धे तेल ॥ जब चाहे तब देखिले,

शब्दावली

(३०५)

अष्ट कमल के कोट । सतगुरु मिले तो पाइये, साहब तृणके ओट ॥ कहें कवीर यह तत्त्व है, सब तत्त्वनको सार । जुगन जुगन चल आयेऊं, बोलनहार अपार ॥ २४ ॥ सतगुरु कहे चेतावनी, कौन अमीको अंक ? । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ? ॥ कौन शब्दकी लेखनी, कौन वरनको पान ? । कौन नाम अगुवा भये, कौन वचन परवान ? ॥ कौन नामको बीज है, कौन नाम की डोर ? । कौन शब्दकी बैठक, निरखो वस्तु अंजोर ॥ धर्मदासकी बीनती, सतगुरु देव लखाय । कौन दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २५ ॥ सुनियो सुतं चेतावनी, अन्न अमीको अंक । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ॥ अमी शब्दकी लेखनी, सत् वरनको पान । निहअक्षर निज बीज है, पुरुष वचन परमान ॥ सुकृत नाम अगुवा भये, सतनामकी डोर । मूल शब्द पर बैठके, निरखो वस्तु अंजोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, सुन सुकृत चितलाय । पुहुम दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २६ ॥ अगम चरित चेतावनी, अधर अन्नपम धाम । अजर अमर है सोई, सो वह निर्गुन नाम ॥ कौने घर होय सुमिरन, कौने घर होय ध्यान ? । कौने घर होय देखहु, कौने घर अस्थान ? ॥ सहज सुरत घर सुमिरण, त्रिकुटी संगम ध्यान । अजपा घर होय देखहु, हिरदै कमल अस्थान ॥ कौन जुगत गढ साजहु, कौन जुगत गढ लेहु ? । कौन जुगत गढ तोरहु, कौन शब्द मन देहु ? ॥ मूल बांध गढ साजहु, आपा मेट गढ लेहु । गुरुके शब्द गढ तोरहु, सत् शब्द मन देहु ॥ सहजे

(३०६)

कवीरपंथी—

सहजे देखिये, सहजे सुरत समाय । कहवे की कछु ना रही, देखे
मन पतियाय ॥ साहब कवीर कहि दीहल, रहन गहन समुझाय ।
बूझे संत विचारिके, गुरुमुख मंगल गाय ॥ २७ ॥ पांच तत्वके
भीतरे, गुप्त वस्तु अस्थान । बिरले मरम कोइ पावई, सतगुरु
वचन प्रमान ॥ दिल अंदर दीदार है, बाद भ्रमें संसार । सतगुरु
शब्द के मसकला, मांज दिखावन हार ॥ महल लेत कोई सूरमा,
बाजे अनहद तूर । बिना पिंडका पुरुष है, झिलमिल दरसे नूर ॥
सहज समाधी लगिरही, मनका छूटा मैल । अनहद बाजा बाजते,
सहजे पहुँचा गैल ॥ बिना पांव को पंथ है, बिन बस्ती को देश ।
बिना पिंडको पुरुष है, कहै कवीर संदेश ॥ २८ ॥ पारब्रह्म जासों
कहो, ताहि निरंजन नाम । तहवांसे मन ऊपजो, तीन लोक लिये
ग्राम ॥ पारब्रह्म के अगुवा, मन राजा सरदार । जो चाहे सोई करो,
कोइ न पावे पार ॥ चौरासी उपजावई, आशा बीज जमाय ।
दशो जन्म राजा भये, ममता अमल चलाय ॥ तीन लोकके
भीतरे, सब जिव भये किसान । चौदह काल जगातिया, मारग
रोक समान ॥ तीन लोक के बाहिरें जहैं, सन्नथ को देश । चेतो
हंसा चित धरो, छाड़ सकल भर्म भेश ॥ पारब्रह्म की महिमा,
सुनो संत चितलाय । साहब कवीर के दीहल, परख परख टकसार ॥ २९ ॥

सत्यनाम ।

अथ आरतिदर्शन प्रारम्भः ।

ज्ञान आरती अमृत वानी । पूरन ब्रह्म लेहु पहिचानी ।
त्रिदेवा मिलि ज्योति बखानी । निरंकारकी अकथ कहानी ॥
यहि आशा सबही मिलि ठानी । भरमि भरमि सुये नर प्रानी ॥
दृष्टि विना दुनिया बौरानी । साहेब छाडि यम हाथ विकानी ॥
कहहि कवीर कोइ संत सुजाना । जिन जिन शब्द हमारा माना ॥ १ ॥

कैसे मैं आरति करों तुम्हारी । महामलिन साहेब देह हमारी ॥
मैलेसे उपज्यो संसारा । हौं छुतिया गुन गाउँ तुम्हारा ॥ झरना
झरे दशो दिशि द्वारे । कैसे मैं आवों निकट तुम्हारे ॥ जब तुम
देहु अग्रकी देही । तब हम होइब नाम सनेही ॥ मलयगिरिमें
बसे भुजंगा । विष अमृत गो एके संग ॥ तितुका तोरि देहु प्रवाना ।
तब हम पाएब पद निरवाना ॥ धनी धर्मदास कविर बल गाजे ॥
गुरु प्रताप आरती साजे ॥ २ ॥

अखण्ड आरती खण्ड न होई । कालहिं मारी रसातल खोई ॥
खण्डित पिंड इकइस ब्रह्मण्डा । खंडित नदी अठारह गण्डा ॥
खंडित रघुपति खंडित रावन । खंडित कृष्ण वीर बलि बावन ॥
खंडित धरती पवन अकासा । खंडित चाँद सूरज कैलासा ॥ खंडित
जहँ लगि सकल पसारा । खण्ड अखण्ड कवीर पुकारा ॥ ३ ॥

मंगल रूप आरती साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥
निसि बासर जहँ सूरज न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करे अनन्दा ॥
अच्छे वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रकास अमृत फल पाया ॥
जरा मरनकी संशय मेटो । सुरति संतापन सतगुरु भेटो ॥ तन मन

(३०८)

कवीरपंथी-

धन जिन्ह अरपन कीन्हा । परम पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ कहै
कवीर हिरम्बर होय । निरख नाम निज चीन्हे सोय ॥ ४ ॥

आरती सत कवीर तुम्हारी । दया करो जाऊँ बलिहारी ॥
पहली आरति पुहुमी आये । काशी प्रगटे दास कहाये ॥ दूसर
आरति देवल थपायो । आसा रोपि समुद्र हटायो ॥ तीसर आरति
चरण जल दारे । हरिके पंडा जरते उबारे ॥ चौथी आरति तुरतहि
घाये । तोर जंजीर तीर ले आये ॥ पांचे आरति बलख सिधाये ।
चौरासी सिधके बन्ध छुडाये ॥ छठई आरति अविगती धारे ।
मुखदासो जिन्दा कर दारे ॥ सतयें आरति पीर कहाये । मगहर
आमी नदी बहाये ॥ आठे आरति मंडल सिधाये । जन ज्ञानीको
संशय मिटाये ॥ कहैं लगि कहौं वरनि नहिं जाय । धर्मदास
आरती सच पाय ॥ ५ ॥

आरती कीजे बन्दीछोर समरत्यकी । चरन शरन सतनाम
पुरुषकी ॥ आरती कर पुहमी पग धारे । सतयुगमें सतनाम पुकारे ॥
आरति कर मुख मंगल गाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥ कर
आरति जग पंथ चलाये । द्वापरमें करुनामय कहलाये ॥ आरति
युग २ बांधे आशा । कल्युग केवल नाम प्रकाशा ॥ चारों
युग धरे प्रगट शरीरा । आरति गावें बन्दीछोर कवीरा ॥ ६ ॥

आरती करहिं धनि धर्मदासा । पांच तत्त्व मुख भेद प्रकाशा ॥
प्रथमहिं वायु तेज है पानी । रहत अकास निरंतर जानी ॥ गगन
वायु गरजे असमाना । निज घर नित्य ध्वजा फहराना ॥ कोट
ब्रह्मा जहाँ कथे पुराना । कोट रुद्र जहाँ धरहीं ध्याना ॥ कोट विष्णु
बिन्वे कर जोरी । औरहु देव तेतीस करोरी ॥ शेष सहसमुख
निशि दिन गावे । स्तुति करे पार नहिं पावे ॥ जो गुरु मिले तो

शब्दावली

(३०९)

भेद बतावे । पांच तत्त्व सुख भेद लखावे ॥ कहै कवीर हंसा पतियाय । धर्मदास आरती सखुपाय ॥ ७ ॥

ऐसी आरती देउँ लखाई । निरखत अघर ज्योति फैलाई ॥ गहु निरच्छर गहु निज डोरी । धरमरायसो तितुका तोरी ॥ जुग बाँधो निरखो टकसारा । जासै उत्तरो भवजल पारा ॥ कोट जनमको कर्म कटाये । चौदह काल जीत घर आये ॥ हीरा कोटि होय परकाशा । विना सुगंध पुहुपकी बासा ॥ चन्द्र लगन गहि करो प्रकाशा । चौदह यम तब माने त्रासा ॥ धरती धर्मनि उदित अकाशा । जापर सूरज करे प्रकाशा ॥ कहै कवीर सुनो धर्मदासा । जम जालिम माने त्रासा ॥ ८ ॥

आरति नाम निरन्तर भावे । तेतीसो मिलि मंगल गावे ॥ चितकर थार ज्योति जिव गाजे । शब्द अनाहद झालर बाजे ॥ घटहीमें यंत्र बजावइ बाजा । सतगुरु मिले भय सब भाजा ॥ बिन करताल पखावज बाजे । श्वेत सिंघासन छत्र विराजे ॥ कर सनमान जीव भये आगे । (साहेब) कवीर गुरुके चरनन लागे ॥ ९ ॥

आरति सतनामकी कीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ अग्रकी थाल अन्नपम बाती । ज्योति प्रकाश बरे दिन राती ॥ सुरली ध्वनि अन्नपम बाजे । शब्द अनाहद धुन तहाँ गाजे ॥ त्रिकुटी संगम झलके हीरा । चरन कमल चित राखु शरीरा ॥ सतसुकृत आरति चित दीजै । तन मन धनहि निछावर कीजै ॥ १० ॥

जाघर आरति दास करत हैं । जनम जनमको पाप हरत हैं ॥ कदलीदल पुहुपके द्वारा । सतसुकृत जाघर पग धारा ॥ परिमल अग्र गुलाल सुवासा । जा घर हंस करे सुखवासा ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । सप्त सिंघासन छत्र विराजे ॥ नाम एकोतर सुमिरे जबहीं । सतगुरु बैठ सिंहासन तबहीं । तत्वमता नरियर प्रवाना ।

(३१०)

कबीरपंथी—

सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर मोरत बास उड़ाई ॥ पल
एक साहेब विलमैं आई ॥ सतगुरु दया प्रगट जब होई । पाय
प्रसाद महाफल सोई ॥ महा प्रसाद तत्त्व विधि पावे । कहैं
कवीर सतलोक सिधावे ॥ ११ ॥

मंगलरूप आरति होई । शब्द सुरति चित राखु समोई ॥
दीप अमोल अगम उजियारा । सन्त पुरुष कीन्हो विस्तारा ॥
हंस हिरम्बर शब्द समाई । वृक्ष गुरुम्बर बैठक पाई ॥ शीतल
नीर सुरति भर लावे । हंस सोहंगम चौर डुरावे ॥ मणि माणिक
हंसनकी पांती । शब्द स्वरूप सुरतिकी कांती ॥ हंस मुजन जन
आज्ञाकारी । हंसन काज देह निज धारी ॥ मन बच कर्म जो
आरति साजे । कहै कवीर सतलोक विराजे ॥ १२ ॥

आरति सतगुरु साहेब कवीर बंदी छोरकी । करत किलोल
हंस पति आगर आनंद विमल विनोदकी ॥ त्रिगुन तेल पंच मुख
बाती मानिक ज्योति अपार । हीरन धार संजोय सकल विधि
पूरन नाम अधार ॥ संगति सकल सुकृत भये ठाढे कहत संदेश
अपार । जाकी सुरति भई तन व्याकुल अति आतुर दीदार ॥
बाजत ताल मृदंग झालरी वीना शब्द रसाल । धुधुक धुधुक जहाँ
तुरही बाजे गरजत शब्द विशाल ॥ पूरण पुरुष सिघासन राजे
बहु शोभा इस्थीर । धर्मदास आरति कर जारे गावहिँ साहब
कवीर । ॥ १३ ॥

आरति निज नाम तुम्हारी । अविगति अगम अलेख मुरारी ॥
पहली आरति पियाजीको पाये । रोम रोममें अलख लखाये ॥२॥
दुसरी आरति दुतिया नहीं कोई । जहाँ देखो तहाँ हरिहरि होई
॥३॥ तिसरी आरती त्रिगुण नाई । चौथे पदमें रहे समाई ॥४॥
चौथी आरति चहुँ दिशि भरपूर । गगन मंडल बाजे अनहद तूर

शब्दावली

(३१२)

॥६॥ पंचयै आरति पूरन प्यार । कहहिँ कवीर सो सबसे न्यार ॥ १४॥

संज्ञा आरति सुमिरण सोई । सुमिरण करत महाफल होई ॥ १॥

पहिली आरती प्रेम प्रकाशा । कर्म भर्म सब कीन्ह विनाशा ॥ २॥

दूसरी आरति दिलहीमें देवा । योग मुक्तिसे करले सेवा ॥ ३ ॥

तीसरी आरति त्रिभुवन सूझे । गुरुगमज्ञान अगोचर बूझे ॥ ४ ॥

चौथी आरति चहुँयुग पूजा । गुरु सम देव और नहीं दूजा ॥ ५॥

पंचयै आरति पद निरबाना । कहहीं कवीर (हंसा) लोकसमाना १६॥

आरती परम पुरुष निजदेवा । अनन्त कोटि जहां लावहिँ सेवा १

ओंकार चंटाधुनि बाजे सतगुण विष्णु आरती साजे ॥ २॥ शेष

महीकर कीन्हों भारा । सूर असखन ज्योति अपारा ॥ ३॥ शिव

सनकादिक मुनि ऋषि सारै । स्तुति ब्रह्मा वेद उचारे ॥ ४॥ ध्रुव

ग्रहलाद चैवर लिये ढारे । धूप दीप गणपति बिस्तारे ॥ ५॥ वरुण

इन्द्र पुहुपनकी माला । नाना रूप अनंत विशाला ॥ ६॥ व्यास

वसिष्ठ कपिल सत धारी । विविधि विधान सब साज सँवारी ॥ ७॥

शुकदेव नारद वेनु बजावैं । साहेब कवीर आरति गावैं ॥ १६ ॥

ऐसी आरति घुरै निसाना । सुनहु चितदै सन्त सुजाना ॥ १॥

जिह्वा वचन झूठ मति भाखो । सत्य शब्दमें चित दे राखो ॥ २॥

परधन त्यागो और पर नारी । शब्द अनाहद लेहु विचारी ॥ ३॥

काम क्रोध छाडो यह क्षण । हंस दशा धरि होहु सुलक्षण ॥ ४॥

तन मनसे परचे करु भाई । बिन परचे यम हाथ बिकार्ई ॥ ५॥

छाड़हु दूर दुरकेर बसेरा । उल्टा मिलै सो हंस हैं मेरा ॥ ६॥ पक्ष

वेष तजो चतुराई । सतसुकृत तब होहि सहाई ॥ ७ ॥ आशा

तृष्णा तजहु विकारा । सो ज्ञानी कहिये तत सारा ॥ ८ ॥ संत

विवेकी शीतल अंगा । अगर वास जस चन्दन संगा ॥ ९॥ प्रेम

प्रकाश भक्ति लौलीना । निर्मल हीरा न कबहुँ मलीना ॥ १० ॥

(३१२)

कवीरपंथी—

निर्मल सो जेहि संशय नाहीं । आपा मध्ये आप समाहीं ॥११॥
कहहि कवीर संतन सुखदाई । अजर अमर इस्थिर घर पाई १२ ॥१७॥

ऐसी आरती गुरुहिं लखायी । निरखत शब्द सुरति ठहरायी ॥१॥
ऐसी आरति आतम पोर । आगे पला न पकडे चोर ॥२॥ गहो
शब्द निहन्छर डोडी । धरमरायसे तिनका तोडी ॥३॥ तन धरती
चित लग्यो अकासा । विना पुहुप सुगंध निवासा ॥४॥ उलटि
अगोचर अमीरस चाखे । दरिया पार सुरति ले राखे ॥५॥
अनन्त जनमकी उगझ मिटावे । चौदह काल जीति घर आवे ॥
॥६॥ कहहि कवीर भाग नर तेरा । सतगुरु किये अमर पुर
देरा ॥७॥ १८ ॥

कैसे मैं आरति करौं तुम्हारी । महा मलिन साहब देह हमारी ॥१॥
छूतहिसे उपजे संसारा । मैं छुतिया गुनगाउँ तुम्हारा ॥२॥ झरना
झरे दशो दिशि द्वारा । कैसे मैं आऊँ साहब निकट तुम्हारा ॥३॥
जो प्रभु देउ अग्रकी देही । तब हम पायब (साहेब) नाम सनेही ॥४॥
मलयागिरि पर बसे भुवंगा । विष अमृत रह एकै संगा ॥५॥
तिनुका तोडि दियो प्रवाना । तब पाये (साहेब) पद निर्वाना ॥६॥
धनि धर्मदास कविर वल गाजे । गुरु प्रताप आरती साजे ॥
॥७॥ २ ॥ १९ ॥

आरती सतगुरु करौं तुम्हारी । कलह कल्पना हरहु हमारी ॥१॥
पहिले पुरुष पीछे भौ नारी । तेहि पाछे तिहुँ लोक सँवारी ॥२॥
जो नारी सो अंग छुवावे । सो चौरासीमें भर्मावे ॥३॥ जो नारी
सो न्यारा रहैं । ज्ञान ध्यान योग सब दहैं ॥४॥ साहेब कवीर
कहे समझाई । आपन आपनि निवेरहु भाई ॥५॥ २० ॥

सिरपर राखिय सोई परमगुरुदेवा ।

सुमिरन भजन आरति पूजा, सन्मुख करले सेवा ॥१॥ भव नदिया
बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । बनसे भी ऊपर ले राखे,
घटहीमें निज सार ॥२॥ मान सरोवर मंजन करिले, त्रिवेनीके

शब्दावली

(३१३)

घाट । अनहद धुनि सुनि पाँचो मोहे, खुलिये ज्ञान कपाट ॥३॥
अजपा जाप जपे विनु जिभ्या, मूल मंत्र अवराधि । स्थिर ध्यान
हठ आसन लागे, सहज समाधि ॥ ४ ॥ चांद सूर निसि वासर
नहीं, नहिं तहां विद्यावेद । साहेब कवीर मिले सुखसागर, विरला
पावे भेद ॥ ५ ॥ २१ ॥

आरति कीजे आतम पूजा । प्राण पुरुष सो अवर न दूजा ॥१॥
ज्ञान प्रकाश दीप उजियारा । घट घट देखो प्रान पियारा ॥२॥
भाव भक्ति कर और न भेवा । दया स्वरूपी करिले सेवा ॥ ३ ॥
सत संगति मिलि शब्द विराजे । धोखा द्रंद भर्म सब भाजे ॥४॥
काया नगर थिर होय भाई । आनन्द रूप सकल सुखदाई ॥५॥
शून्य ध्यान सबके मनमाना । तुम बैठो आतम अस्थाना ॥६॥
शब्द सुरति ले हृदय बसाओ । कपट क्रोधको दूर बहाओ ॥७॥
कहहि कवीर जिन रहनि सम्हारी । सदा आनंद रहते नर नारी ॥८॥ २२

सत स्वरूपकी आरति कीजे । साहब चीन्हि चरण चित दीजे ॥१॥
चिन्हों चिन्हों मन चित लाई । बिन चिन्हे कह जाओ भाई ॥२॥
जिह्व चिह्न तिन निर्मल अंगा । बिन चिह्न ते भये पतंगा ॥३॥
जब लग साहेब सो नहिं भेंटा । तब लग भाव भक्ति सब हेटा ॥४॥
शून्य सेज आरति करई । विबा कन्त का पूरी परई ॥ ५ ॥
भूषण पहिरो रूपकी रासी । फूलन सेज महलमें प्यासी ॥ ६ ॥
आरति लिये कन्तको जागे । पति विनु प्रेम कहो केहि लागे ॥७॥
केतिक पंडित मुनिजन योगी । केतिक नागे भक्त वियोगी ॥८॥
झूने झूने बहुत जमाती । बिन दुलहेकी कवन बराती ॥ ९ ॥
खोजो गगन शून्य ब्रह्मंडा । सात द्वीप पृथ्वी नव खंडा ॥ १० ॥
ग्रह माया तजि भये दिवाना । आप अपन पौ मर्म न जाना ॥११॥
जिनिके दूसर असरा नहीं । आपामध्ये आपहिं आहीं ॥१२॥
चेत चेत संशय कर दूरी । घटही माहिं संजीवन मूरी ॥ १३ ॥
साँचे सतगुरुकी बलिहारी । जिन यह कुंजी कुलफ उघारी ॥१४॥