कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
निर्मल सो जेहि संशय नाहीं । आपा मध्ये आप समाहीं ॥११॥
कहहि कवीर संतन सुखदाई । अजर अमर इस्थिर घर पाई १२ ॥१७॥
ऐसी आरती गुरुहिं लखायी । निरखत शब्द सुरति ठहरायी ॥१॥
ऐसी आरति आतम पोर । आगे पला न पकडे चोर ॥२॥ गहो
शब्द निहन्छर डोडी । धरमरायसे तिनका तोडी ॥३॥ तन धरती
चित लग्यो अकासा । विना पुहुप सुगंध निवासा ॥४॥ उलटि
अगोचर अमीरस चाखे । दरिया पार सुरति ले राखे ॥५॥
अनन्त जनमकी उगझ मिटावे । चौदह काल जीति घर आवे ॥
॥६॥ कहहि कवीर भाग नर तेरा । सतगुरु किये अमर पुर
देरा ॥७॥ १८ ॥
कैसे मैं आरति करौं तुम्हारी । महा मलिन साहब देह हमारी ॥१॥
छूतहिसे उपजे संसारा । मैं छुतिया गुनगाउँ तुम्हारा ॥२॥ झरना
झरे दशो दिशि द्वारा । कैसे मैं आऊँ साहब निकट तुम्हारा ॥३॥
जो प्रभु देउ अग्रकी देही । तब हम पायब (साहेब) नाम सनेही ॥४॥
मलयागिरि पर बसे भुवंगा । विष अमृत रह एकै संगा ॥५॥
तिनुका तोडि दियो प्रवाना । तब पाये (साहेब) पद निर्वाना ॥६॥
धनि धर्मदास कविर वल गाजे । गुरु प्रताप आरती साजे ॥
॥७॥ २ ॥ १९ ॥
आरती सतगुरु करौं तुम्हारी । कलह कल्पना हरहु हमारी ॥१॥
पहिले पुरुष पीछे भौ नारी । तेहि पाछे तिहुँ लोक सँवारी ॥२॥
जो नारी सो अंग छुवावे । सो चौरासीमें भर्मावे ॥३॥ जो नारी
सो न्यारा रहैं । ज्ञान ध्यान योग सब दहैं ॥४॥ साहेब कवीर
कहे समझाई । आपन आपनि निवेरहु भाई ॥५॥ २० ॥
सिरपर राखिय सोई परमगुरुदेवा ।
सुमिरन भजन आरति पूजा, सन्मुख करले सेवा ॥१॥ भव नदिया
बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । बनसे भी ऊपर ले राखे,
घटहीमें निज सार ॥२॥ मान सरोवर मंजन करिले, त्रिवेनीके