कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
टकसार ॥ बिन हंस हंस न पहुंचई, बीचाहिं परे भुलाय । काल
कठिन भरमावई, कामिन परे उरझाय ॥ हंस हंस मिलि लेचले,
जहां पुरुष रहिवास । साहब कवीर कहि दीहल, निर्गुन अथर
निवास ॥ १५ ॥ सहतेजी चित् चेतहु, सुमिरो नाम अथार ।
हंसन पार उतारहु, परख २ टकसार ॥ भौसागर बड दारुन,
विषके लहर फिराय । बिन सतगुरु नहिं बांचिहो, सबै काल
धरखाय ॥ मोरहु नरियर मोरहु, आपन अंस विचार । काल
कठिन दुर्गदानिया, काह करे झखमार ॥ सहतेजी चित् चेतहु,
काल कठिन बल जोर । लगन साध परमोधहु, पला न पकडै
चोर ॥ निर्गुन नाम निअक्षर, सुमिरत कर्म कटाय । साहब
कवीर कहि दीहल, सहतेजी ससुझाय ॥ १६ ॥ चार कमल
चित् चेतहु, जहां जीवको बास । जुग जुग पान सुधारहु, मेटो
जमको त्रास ॥ कमल तत्त्वचित् चेतहु, जिव ना नसे तेह मांह ।
लगन सनेह बिचारहु, देउ हंसको बांह ॥ जाहि कमल बस
जीयरा, ताहि लगन देव पान । प्रीतम जैसुन जगपती, हंस होय
निरवान ॥ या बिधि भेद बिचारहु, निरखो तत्त्व निसान । तब
छुटिहै भौसागरा, जिव कहं पहुंचे यान ॥ कमल तत्त्व नहिं
दरसई, जिव धोखे पर जाय । परमोदिक भये दारुन, राखो
काल झुलाय ॥ राये बंकेज बिचारहु, जीवन करहु सुधार ।
साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १७ ॥ राज
बरन जुग बांधहु, भांवर सती सनेह । येही गमन करो दुलहिन,
बहुर धरो जिन देह ॥ चंपा पहूम चमेलिया, लाये करेउ बनाय ।
तिलक लिलार सम्हारहु, जमकी दासी छुड़ाय ॥ हंस हंस जुग
बांधहु, चौदह पवन लखाय । शब्द चित्त गहु दुलहिन, कोटिन
कर्म कटाय ॥ जाहि पवन पर शशि बसे, चित्त गहि रहे चकोर ।