कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
धन जिन्ह अरपन कीन्हा । परम पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ कहै
कवीर हिरम्बर होय । निरख नाम निज चीन्हे सोय ॥ ४ ॥
आरती सत कवीर तुम्हारी । दया करो जाऊँ बलिहारी ॥
पहली आरति पुहुमी आये । काशी प्रगटे दास कहाये ॥ दूसर
आरति देवल थपायो । आसा रोपि समुद्र हटायो ॥ तीसर आरति
चरण जल दारे । हरिके पंडा जरते उबारे ॥ चौथी आरति तुरतहि
घाये । तोर जंजीर तीर ले आये ॥ पांचे आरति बलख सिधाये ।
चौरासी सिधके बन्ध छुडाये ॥ छठई आरति अविगती धारे ।
मुखदासो जिन्दा कर दारे ॥ सतयें आरति पीर कहाये । मगहर
आमी नदी बहाये ॥ आठे आरति मंडल सिधाये । जन ज्ञानीको
संशय मिटाये ॥ कहैं लगि कहौं वरनि नहिं जाय । धर्मदास
आरती सच पाय ॥ ५ ॥
आरती कीजे बन्दीछोर समरत्यकी । चरन शरन सतनाम
पुरुषकी ॥ आरती कर पुहमी पग धारे । सतयुगमें सतनाम पुकारे ॥
आरति कर मुख मंगल गाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥ कर
आरति जग पंथ चलाये । द्वापरमें करुनामय कहलाये ॥ आरति
युग २ बांधे आशा । कल्युग केवल नाम प्रकाशा ॥ चारों
युग धरे प्रगट शरीरा । आरति गावें बन्दीछोर कवीरा ॥ ६ ॥
आरती करहिं धनि धर्मदासा । पांच तत्त्व मुख भेद प्रकाशा ॥
प्रथमहिं वायु तेज है पानी । रहत अकास निरंतर जानी ॥ गगन
वायु गरजे असमाना । निज घर नित्य ध्वजा फहराना ॥ कोट
ब्रह्मा जहाँ कथे पुराना । कोट रुद्र जहाँ धरहीं ध्याना ॥ कोट विष्णु
बिन्वे कर जोरी । औरहु देव तेतीस करोरी ॥ शेष सहसमुख
निशि दिन गावे । स्तुति करे पार नहिं पावे ॥ जो गुरु मिले तो