कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय
नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर
मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥
कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें,
बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल
संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत
बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी,
आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर
जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार
बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन,
तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा
नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना
नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई,
सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय ।
सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं
थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम
अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय ।
हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन
जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो
सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना
जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी,
जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥
सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न
आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी
बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब