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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(२९५)

चौका महि, तामो लोन्हो चीन्ह ॥ कहें कवीर सुन आमिनी, रहो हमारी आस । जीवन पार उतारिहौं, होइ चूरामन दास ॥ १ ॥

दीहल कालज्ञान ।

पांच घरी वायें चले, सोई दहिने होय । दस स्वासा सुख-
मन चले, ताहि विचारो लोय ॥ आठ पहर जबही चले, पिंगला
माहीं स्वास । तीन बरस काया रहे, ता पीछे होय नास । आठ
दिना जबहीं चले, स्वासा रवि की ओर । दोय बरस काया रहे,
प्राण जाय तन छोर ॥ सोरह दिन जबहीं चले, भान दाहिने
होय । बरस दिना काया रहै, पीछे रहै न कोय ॥ बीस रैन औ
बीस दिन, चले दाहिनो स्वास । षष्ट मास काया रहै, ता पीछे
होय नास ॥ एक मास औ एक दिन, रविके पहरा होय । स्वास
सरोधा सत्य है, नर जीवे दिन दोय ॥ नहि चंदा नहि सूर है,
नहीं सुषुमना बास । सुख सेती स्वासा चले, पहरमें होय बिनास ॥
कहें कवीर विचारके, गहो शब्द टकसार । सत्य लोक हंसा चले,
आवा गमन निवार ॥ २ ॥ निज अनंद घर महलमें, करो सदा
सुखबास । सो वर चीन्हौं संतो, काटो जमके फांस ॥ निज
उत्तम घर आपनो, सो तुम चीन्हत नाहि । बिन चीन्है कहाँ
जैहो, यह बड़ अचरज आहि ॥ अबहुं कहो जो मानहु, उलखो
वचन हमार । दुबधा डुरमत छोड़के, चीन्हो वस्तु सम्हार ॥
पांचतत्व निज मूल है, करता इनहीं मांहि । नख सिख तन
निज ढारिया, सो कहुं अन्ते नाहि ॥ अनत होय तो को गढे,
यह तन सुंदर रूप । सकल साज एक बुंदमें, ऐसा ख्याल
अनूप ॥ अगिन पवन जल पृथवी, इनमें साहब जीव । पुहुप
मध्य ज्यों बास है, दूध मध्य ज्यों घीव ॥ घरमें जल जलमें
घर, बोलनहार संजोग । सांचे सांचे ढारिया सांचें सुख भोग ॥