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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली ।

(३०१)

काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी,
तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥
कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी
तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय ।
कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥

दीहल आगन तान ।

पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर
घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस-
कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥
गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न
आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र
गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥
स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे,
हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव ।
चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन
संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो
पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द
उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच
नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥
जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो
बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके
घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे
पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर,
उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार ।
जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया-
वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल