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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 968 में से

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पृष्ठ 306

(२९४)

कबीरपंथी—

शब्द तिनूकाका ।

जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥

एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥
सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु
हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार
बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥

शब्द कंठीका ।

पायो निजनाम गलेको हरवा ॥

सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार
कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर-
बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥
एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥

शब्द नामका ।

गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥

जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥
घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥
विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी
नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥

शब्द दीहल प्रारम्भः ।

आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं
तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार
न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे
नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन
मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश