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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(११०)

कवीरपंथो—

ज्योहि ज्यों सत् समीप गयो, बलछीन भयो सब शस्त्रन खोई ।
नियरान गयन्दहि प्राण तबै जरि, छार भयो तब खाक मिलोई ॥१॥

वैराग विवेक विचार बढे, अरु ज्ञान चढे है निशान बजाई ।
चारिहु युत्थप संग अनी, चतुरंग धनी दम संयम ताई ॥ शुचि
साधन मोन अरु दान दया, है आचार तपोधन कौन गनाई । दल
साजिकै सत्य कवीर चढे; रिपु धीर कहा जो सके समुहाई ॥१०॥

दुसरी दिशिते मनराव अनी, नहिं जात गनी अगनी गहि धाई ।
तह काम रु कोध है मोह महा, अरु लोभ रहा सरदार लडाई ॥
निरदाय असत् अशौच लिये, सब आय सहाय भये यक ठाई ।
चवगान समाज जुरे दल दो, घमसान परे तहैं लोह चलाई ॥११॥

दिननायक सायक छूटि चले, महि खेसघनी ध्वजनी ध्वज टूटे ।
तमके दमके बुति दामिनि ज्यों, दसहूँ दिशि घेरि लियो खल फूटे ॥
करको सर कोटि दिवाकरको, सब देश विदेशनमें जब टूटे । नहिं
शूर कोई भजि दूर गये, रिपुसेन सहाय सबे गहि कूटे ॥१२॥

हरि श्वेत ध्वजा फहरान लगे, घहरान लगे हैं अनाहत ढंका ।
यम युत्थ अपार खभार परे, जितही तितही सब सोच संसंका ॥
बल वीर कवीर के सन्मुख हो, नहिं धीर धरे तिरछा अरु बंका ।
गण तीर शरीर समाय गये, छनमांह भये सब कालको फंका ॥१३॥

मद मार महामतवार चले, समुहाय बजावत ढोल दमामा ।
गहि शस्त्र अनेक चमू चमकी, पहिरे गहिरे रंग जामिन जामा ॥
दुरबुद्धि दगा छल छिद्र पगा तहैं; कपट अखंड सगा सठ तामा ।
भय भयं भयावन भूत चले, बहु दूत कपूत रले अघधामा ॥१४॥

क्रमही क्रम ज्यों नियराय चले सियराय चले अगिले भट भोरे ॥
हरुए हरुए बिचले बिचले, पछिले पछिपलि रहे कुछु थोरे ॥
थिरता पद हानि डटे कितने, अभिमान ते बात सटे बरजोरे ।
जब पेलि अगार लगार चले, गहि गूजसों सुज हडावरि फोरे ॥१५॥

शब्दावली

(१११)

शर शब्द सगसर छूटि चले, यहि ओरते शत्रुके सेनमें छाई।
सब घायल भूमि परे छनमें, आरिचंड प्रचंड अनी विचलाई॥
गहि ज्ञानके गोलन सदैं कियो, महि मर्द गनी महि गर्द मिलाई।
रनमें मन राडको हाड गडे, वैराग विवेककी टेक रहाई ॥१६॥

बलवान विराग रु ज्ञान भये, रिषु सेन दिये सबही विचलाई।
जय शंख निशान रु घंट बजे, शहनाइ अनाहत केरि सुहाई ॥
चहुँओरते घेरि लियो गलियो, निज बन्धन बाँधि लियो मनराई।
गढमें पहरा बिठलाय दियो, अरु नग्र फिरी सतनाम दुहाई ॥१७॥

प्रभु दीन प्रकाश जो उग्रनको, सोई सूषच छुद्र चमार चंडारो।
नहि तारत बार खला वृखला, अघओघ नसाय कसाय उबारो ॥
सम भाव डुराव नहीं जिनके, यवनादिकहु सुखधाम सिधारो।
कर्म नासहि देव सरी सभके, खल पावन सत्तहैं नाम तुमारो ॥१८॥

प्रभु देखि सतोषुन व्यापि गयो, कलिमें भूत है कृतकी वृत्त
बाना। महि भीतरको डर गाड घने, तम घोर न उल्ल सभी
उस थाना ॥ निजु सेन समेत समाय तहाँ, तुमरे डरते कलि
जाय छिपाना। चकचोंधरिचोचमगादरके, प्रभुनिन्दक ताहि न
काहि ठिकाना ॥ १९ ॥

रथ धर्म अरूढ अगार बढे, गहि ज्ञानन गूढ निसा मदहारी।
मुख सप्त तुरङ्ग सुरङ्ग सजे, प्रभु अंश प्रशंस पुरान पुकारी ॥
सत नाम सही रथवाहक तौ, रथ चक्र जो वेद स्वसम्म उचारी।
गुरुचार सोई गुनचार वने, तप तेज अभै कर दुष्ट संहारी ॥२०॥

कवित ।

जम ज्वाल जरत जगतपति जोहि जग, जीवन जियावत
जुडाव जगजरनी। भाग भल भक्त भगवन्त भजु भोर भोर,
भंजत भरम भय भीर भय भरनी। वारिनिधि वोहित वदव बुध

(११२)

कबीरपंथी—

बेदबर, वेद वरदानन बखान बर बरनी । कलि कलमख कुल
कंटक कटक कोटि; कीर्तन कवीर करतारकर करनी ॥

कबीर मानुप्रकाशपृष्ठ २४१.

इति कबीर शानु उदय सर्वथा और कवित ।

मध्याह्न संध्या-साखी ।

साहब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय । शरण आय
यम सो बचे, आवागमन न होय ॥ १ ॥ दया करन अवगुण
हरण तारण तरण उदार । अशरण शरण, वन्दू चरण तुम विनु
नहिं निस्तार ॥ २ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके
हाथ । त्रसित गह्यो साहिब शरण, भव भय हारि सनाथ ॥ ३ ॥
प्रभु सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान । लोह कनक पारस
करे, साहब शरण समान ॥ ४ ॥ वन्दों चरण सब दुखहरन,
प्रभु प्रसाद दुख धूरि । दया करी सब दुखहरी, संसृत शूल भो
दूरि ॥ ५ ॥ बहे बहाये जात थे, भौसागरके माँहि । दयाकरी पखाँय
सब, शरण आय गहि बाँह ॥ ६ ॥ संतत अभय गुरुके चरण, सदा
परख प्रकाश । समन सवे भवजालतम, राम रहस सुख वास ॥ ७ ॥
सर्वोपरि गुरुके चरण, जो हारी भवखेद । परम उदार सागर दया,
थाह न पावे वेद ॥ ८ ॥ वारों तन मन धन सबे, पद परखावन हार ।
गुण अनन्त जो पचिमरे, विनु गुरु नहिं निरतार ॥ ९ ॥ संधि
परखावे जीवकी, काटे यमको फन्द । साहब दीन दयाल सो,
संशय खंडे द्रन्द ॥ १० ॥ द्रन्दज सत्य असत्यको, जहाँ नहीं
कुछ लेश । सो प्रकाशक गुरु परख है, मेटत सकल कलेश ॥ ११ ॥
जाहि दया गुरु परखलहि, मेटे सब भव जाल । रक्षक बन्दी
छोर सो, साहब दीन दयाल ॥ १२ ॥ भेष अमद्गल नष्ट गुण
जेते त्रयविधि फांस । अदल चलाई कालपर, सो त्रिदोषहिं
नाश ॥ १३ ॥ अदल चलाई सत्यका, साहब बन्दी छोर ।

शब्दावली ।

(११३)

पारख छोरे जीवको, यमका हाथ मरोर ॥ १४ ॥ दया दयाल
पारखलहि, सुधरे सब भ्रमजाल । अदल चले तब सत्यका, शिर
धुनि रोवे काल ॥ १५ ॥ प्रथम शब्द सुधारिके, टारे त्रयविधि
जाल । झायीं मेटत संधिको, ऐसो शरण दयाल ॥१६॥ पारख
गुरु सुख बास है; जहाँ न फन्द काल । सो विनु जीव विनाश
है, चौरासीके जाल ॥ १७ ॥ जो रहस युत पारखी, साहब
साँचा सोय । तरे तारे भव जालसे, काल देखि रहे रोय ॥१८॥
पारख तोड़े भ्रम गढ़, खीजे काल कराल । करि न सके प्रभुता
कछु, ऐसो शरण दयाल ॥ १९ ॥ सत्य शरण प्रभु पायते, दूटे
मोहक डोर । अभय भक्ति पारख सदा; काल न लागे चोर ॥२०॥
प्रभुकी शरण सहाय विन, कैसे होय उबार । अधमकाल आसे
सबे, अपनी जाल पसार ॥ २१ ॥ परवश जियरा कालके, दुख
पावे संसार । बिनु पारख भटकत फिरे, थके विचार विचार ॥२२॥
चारि वेद षष्ठ अंससो, प्रगट भये जग आय । अर्थ विचारत
जिव थके, झगरा बहुत मंचाय ॥२३॥ षट षट षटकी जानहीं,
ते न परै भव फंद । गुरु पारख प्रतापसो, सदा रहे आनन्द ॥२४॥
महासागर संसार है, जाके संशय धार । सुर नर मुनि सब बहि
गये, पारखि उतरे पार ॥२५॥ पारख अचल अखंड है, ताहि
परे नहिं और । विनु तेहि भटकि जग रहे, जहाँ नहीं तिथि
ठौर ॥ २६ ॥ राम रहस साहब शरण, अभय अशंक उदोत ।
आवागमनकी गम नहीं, भोर साँझ नहिं होत ॥ २७ ॥ नाशक
के सब रूप हैं, रहे तेहि मध्य समाय । कष्ट विविधि विधि पावते,
पारखलीन छुड़ाय ॥ २८ ॥ प्रभु शरणागत परख दृढ़, सत्य-
लोक प्रणाम । सन्तत जीव बिलास है, दूटा काल गुमान ॥२९॥
जो जीव परख बिलासमें, लहे सदा सुख चैन । तिनके त्रास न

(११४)

कवीरपंथी-

कालके, और कहेको बैन ॥ ३० ॥ परख विलासी जीवजे, धनी सोई संसार । और सबे निर्धन रहे, यम के हाथ खुबार ॥३१॥ संतत सुख है परखमें, साधन यतन विनास । भूलि भटक मति जाहु जिव, विविध कर्मके फाँस ॥३२॥ धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार । तेई बन्दी छोर हैं, तारणतरण उदार ॥३३॥

अथ माध्याह्न दिनकी स्तुति

कवीरभानु प्रकाश पृष्ठ ५२८ (नराच छन्द)

प्रभुं परे पारायणं समस्त ज्ञानसागरं । विश्वंभरं धराधरं कृपा-
करं उजागरं ॥ कलिकलंक नाशनं कवीर नाम नागरं । कृतान्त
तीख त्रासनं कृपानिधे नमोस्तुते ॥ १ ॥

कृपा सुवारि तोषकं सुसन्तशालि पालकं । कृपा सुभक्ति-
पोषकं पराग पापघालकं ॥ समस्तशोकशोषकं दरिद्रदोषदालकं ।
सुकृत सर्व सार कृत कारकं नमोस्तुते ॥ २ ॥

निजं निरीह निर्गुणं अनन्तलोकनायकं । अनादिदेवपायकं ॥
करालकालदालकं तौ संकटं सहायकं । निरंजनं नारायणं नरो-
त्तमं नमोस्तुते ॥ ३ ॥

गणेश शेष शारदं गुणानि नित्यगावनं । अजादि देव नारदं
सुकृत नाम ध्यावनं ॥ शरीरभै नशावनं कवीर जक्तपावनं ।
सुभक्त चित्तभावनं सोहावनं नमोस्तुते ॥ ४ ॥

चकोर चित्त चौरकं चचारु चन्द शोभितं । सुनिन्द पादपं-
कजं अलिन्द सन्त लोभितं ॥ विज्ञाननैन जोहिनं सुकण्ठ नाम
पोहितं । निचिन्त निर्विकल्पकं सकल्पकं नमोस्तुते ॥ ५ ॥

क्रमं वनं सहारणं सुबारणं कुमारकं । विनीति प्रीति पालनं
सुबुद्धि निद्धिधारकं । दुःख तरु कुठारकं भव भयविदारकं ॥
कवीर नाम तारकं विहारकं नमोस्तुते ॥ ६ ॥

शब्दावली

(११५)

अगोचरं अछेदनं अभेदनं अखण्डनं । सुभक्तचित्त मण्डनं शुभं भवं तरंडनं ॥ यज्ञं भनन्त अखण्डनं प्रताप तो प्रचण्डनं । कृत्तांत दण्ड दण्डनं विहण्डनं नमोस्तुते ॥ ७ ॥

तव नाम ब्रह्मवीजकं शरीरवृक्ष मूलकं । द्विजार अष्ट फूलकं अनन्त लोक थूलकं ॥ त्व सक्ति प्रक्तिसागरं द्विलोक वेद कूलकं । हनं शोक शूलकं ॥ अतूलकं नमोस्तुते ॥ ८ ॥

स्नेहवारि पूरितं विषै कुजन्तु धूरितं । चरितमुक्ति माणिकं विकारवासदूरितं ॥ पदार्थ अष्ट षष्ठकं त्वभक्ति रत्न मूरितं । रमन्त योगिनानि राम नाम तो नमोस्तुते ॥ ९ ॥

मथतं शोकसिन्धु तो मुनीन्द्र नाम मन्दरं । धरा च वेद उद्घरन्त मच्छकच्छ मुन्दरं । हिरण्य अक्षघालनं अत्रूपरूप भूधरं । निकाम काम दायकं सहायकं नमोस्तुते ॥ १० ॥

तो नारसिंह वामन द्विजाति राम पावनं । ब्रजैक वल्लभं नरेशकं सदावनं ॥ बउद्ध निष्कलंक गुणतो गुणनि गाथ गावनं । पदाम्बुजैक भक्त भौर भावनं नमोस्तुते ॥ ११ ॥

त्रयलोक लोक पालकं त्रयदेव देव यक्षकम् ॥ उपायकं च रक्षकं पुनः समस्त भक्षकम् ॥ त्व सर्व मय अक्षकं प्रतापतोप्रत्यक्षकम् । वसन्त वासुदेवकं अभेवकं नमोस्तुते ॥ १२ ॥

त्रयशूल पाणि दीन दानि कत्रशूल नाशनं । त्रय काल पाप त्रै पुरं तो दाहकं हुतासनम् ॥ समाधि तव अखण्डितं प्रचण्ड योग आसनं । शुभं करोति शंकरं भयंकरं नमोस्तुते ॥ १३ ॥

कवीर नाम आदितं सुभक्त चित्त राजितं । विमोह यामिनी गतं प्रकाश ज्ञान भ्राजितं । कलिमलं अपर्वलं उलूक लेखभाजितं कवीर कारणं वरं कृपाकरं नमोस्तुते ॥ १४ ॥

जलं सुस्वाति नाम तौ सुभक्त चित्त चातकं । ककार ब्रह्म

(११६)

कवीरपंथी—

राजसं वकार विष्णु सात्त्विकं ॥ रकार शम्भु तामसं उपाय पोष
धातकं । समस्त दोष पातकं निपातकं नमोस्तुते ॥ १६ ॥

कवीर पाद पंकजं सनेम प्रेम ध्यायकं । गुणानि नाम कीर्तनं
सुधाम काम दायकं ॥ विराग त्याग लभ्यते हदं पदं गहायकं।
तरंत तारनं भयं विदारनं नमोस्तुते ॥ १६ ॥

अथ मध्याह्न-शबैया ।

कवीर ज्ञानप्रकाश पृष्ठ ५३०.

तन भंग पतंग उतंग भये, बट पार जुबारकी खोजन पाईं ।
बरते नव खण्डमें तेज महा, ब्रह्माण्डमें आनि रह्यो ठहराईं ॥ पहरी
अरु स्वान सुखी सबही, पथिको निर्भय श्रम पन्थ बिहाईं । तुमरे
परताप सन्ताप गयो, मम दंड प्रणाम तुम्हें रविराईं ॥ १ ॥

गिरि कन्दर अन्दर दुष्ट दुरे, रवि तेजप्रवाह सभी तम भंजे ।
यम काल सकाल विहाल पडे, नहि आय कोई धर्मराजके पंजे ॥
हग दृष्टि प्रचंड ते अंड सुझे, जन रञ्जन पायनके रज अंजे । गुरु
नाम चरित्र पवित्र लखे, खल चोर निशान निसाचर गंजे ॥ २ ॥

तम वंश विध्वंस न संशकहूँ, दशाहूँ दिशि हंस सभा सरसाईं ।
मृत्यु नाथ अनाथ बेहाथ भये, बल वीरज धीरज तेज गवाईं ॥
रमि राम चले पर धाम सबे, चहुँ ओर फिरी सत नाम दुहाईं ।
श्रम भंड करे न विहंडकने, यम दंडक दंडन मारि भजाईं ॥ ३ ॥

नहि खोट है ओट उलूक लुके, सुचि सेत सती विरती वर
गाजे । सब झार कवीर कवीर कहै, छल छिद्रपै श्रम संशय भाजे ॥
तिहुँ काल है सत्य कवीर सुखी, गुण गाव सभी सुखको सज
साजे । यह बारह पंथ कला रविको, प्रभु पूरण ब्रह्म हो न्योम
विराजे ॥ ४ ॥

हिमजार जुबार जुबार धने, निज शृङ्ग शिलापै किला घर छाईं ।
बड वृद्धि भई खगरे वगरे, फिर स्वर्ग दिशा शिर ऊंच उठाईं ॥

शब्दावली

(११७)

हरषे नहि धर्म रखे करखे, दम संयम भक्ति कृषी दुख दाई ।
जब सूज तेज तपै तिनपै, तेहि बूजते धरि धूज मिलाई ॥ ५ ॥

कहु सूजमुखी यक पाय खडा, चितवै चित चाहते सील नवावे ।
जेहि प्रीति अभंग पतंग पिया, पदनीरजको धरि धीरज ध्यावे ॥
अम भंजकहु वन कंज खिले, दिन भूप स्वरूप अनूप दिखावे ।
गिरि निश्चल आसन ध्यान धरे, करुणा प्रभुलाल अमोलक पावे ॥ ६ ॥

प्रभु तीक्ष्ण तेज तपै महिपै, बन लोल लवारन आगिते पूरी ।
नव खण्डमें पवन प्रचंड चले, भरिमारन मूठिन ता दग धूरी ।
तम ग्रीषम झार अपार तपै, प्रभुनाम जपै जनभक्त अंकूरी । दिन-
नाथ दयाल भये तबहीं, जनको सबही दुख कीनेहु दूरी ॥ ७ ॥
गुण खान पियाकी हिया हरषा, करि तोष तिया वर्षा झरि
लायो । धरती भई गर्भवती तबही चहुँ खानिके जिन्सको वंश
उपायो ॥ तप कीन महीननलों भलसों, अबतो सबको फल पूरण
पायो । बडि बृद्धि भई पुत्र पौत्रनको, बहु रंगमें स्थावर जंगम
जायो ॥ ८ ॥

फुलबागन फूल अनन्त फुले, धनवंत यथा यशवंत सुहाई ।
जनु सम्पति पाय सती गिरही, श्रद्धा युत द्विज साधु बुलाई ॥
कहु वेल चमेलिन फैलि रही, हरि भक्तनकी जिमि कीरति छाई ।
फल पूरित शाख नवे कितहु, मन अर्थ लहै जो गहे नमराई ॥ ९ ॥

लहरी तृणपात भरी धरती, तपसिद्ध तपी ऋधि ज्ञान ज्यों
पूरे । कहु ऊपर घास न फूस रहे, गम्म गुन्न विना हिय सून्य
ज्यों कूरे ॥ जल कीच है धूरि न धूरि कहुँ, सतसंगतिसो जिमि
हुर्जन दूरे । पर त्यागलो पंजन खंजनहु, अम भंजन दरशते
ज्ञान ज्यों फूरे ॥ १० ॥

(११८)

कवीरपंथी-

कहुँ भूख सँहारक ऊँख भई, पर हेत सहे दुख जो अधिका।
कहुँ स्वेत कपास विकास कियो । पर छिद्र छुपावन जो तन धारा ॥
कहुँ अन्न रु साग व पात उगे, तरकारि वनस्पति चौदह भार।
सुख साज सभी सब घेर मही, यह केवल भानु प्रताप तुम्हारा ॥११॥

कक आदिपिता कथि वादि निता, ख ख सुन्न निरंजन ताहि ते
हेरा ॥ खखते प्रगट भये खंड सबै, खख ज्योति अखंड दिशों दिशि
हेरा ॥ वसुदेव बकार विश्वभ्रम है, बर बीज चराचर चीजचितेश।
रचनाके भंडारको धारकसो, धर ओष्ठन द्वारके ऊपर डेरा ॥१२॥

भवसागर जालको काल बने, ररकार बडे सरकार कहायो ।
तिन खोलि केवाडि लियो, बितको तेहि ठाहर ते गहि बाहर
आयो ॥ तप घोर करे यक पाय खडे, भव बारिध जारिध राज
लिखायो । तरनी-कक-है कडि हार-बबा रर-दंड तिहुँ जगको
उधरायो ॥ १३ ॥

ररकार धरे शिर बिन्दु जबै, इभि नाद रु बिंद है जिन्द यती
सो । सो कृशान रु भान ससांक भये, नहि पावत पार अपार
गतीसो ॥ ररविन्दके बीच अकारछपै, कहँ रामको नाम विरंच
मतीसो । रररेफ गफेलमै भेद सही, नहीं जात कही वह बात
रती सो ॥ १४ ॥

रर पूर्ण ब्रह्म निरंजन है, वह भाँतिके भाजन भञ्जन कीन्हों।
बब बीज विना कछु चीज नहीं, दोउ एक भये रचना चित
दीनों ॥ कक कायक कर्म किया सबही, फबही तबही जबही
मिले तीनों । ककही बबही ररही ररही, सरही सब काम कवीर
जो चीन्हो ॥ १५ ॥

कक कंटपै बैठिके चेतनदे, जिव संठ उदार सुधारत वानी ।
बब अग्र गयो जहँ नग्र नयो, सरहद पै लह जमा सब आनी ॥

शब्दावली

(११९)

ररवीर बली तब पील चली, कर क्रोध विरुद्ध हो युद्ध जो ठानी।
ककहू बबहू दवही रहिगै, ररको धरको थरको जगजानी ॥१६॥

कक केवल ब्रह्म है देवलमें, बबदीन कपाट सुपाट हुवारी। तहँ
जाय जो कोय सो होय अभय, दरसै दरपै परब्रह्म पुजारी ॥ कोई
जान नहीं भ्रम भान नहीं, शक खोलकी टोल लगी तहँ तारी ॥
रर रारकरी पट टार धरी, गहि भार भरी भव जार सँवारी ॥१७॥

करुणामय कंत कवीर कहो, कवि कोविद को कुल कर्म
कटैगौ। मन मोहन भीत सुनीन्द्र मिली, मद मोह मनोज सु
मौज मिलैगो ॥ सत सुकृत सत्यस्वरूप सदा, सतनाम सँभाल
सुधाम सटैगो। घन घोर घटा घट घाट गिरे, घटि घालत
घूमर घेर घटैगो ॥ १८ ॥

रस पाय सुधा यस गाय बुधा, मम लेखनि पै सुर वृक्षकी
शाखा। सुखते यहि अमृत धार खवे, न मरे न परे भव जो
सब चाखा ॥ न लगे कहू भूख पियूष पिये, न हिये कहू और
रही अभिलाषा। सब स्वारथको परमारथको, फल चार पदारथ
हाथ न राखा ॥ १९ ॥

युग आदिहु मध्यमें अन्त विषै कलिहू कृतमें अरु द्वापर
त्रेता। गुरु देव दयालहि चीन्हत जो, चरनों चित्त लाइके होत
सचेता ॥ तिन सार लहा पुनि हार कहा, भवपार गये परिवार
समेता। कर कोरिके जोटि प्रणाम तिन्है, तिहुँ काल जो, जीवन
को सुधि लेता ॥ २० ॥

छन्द मधुकर

सर्कार बडा। सर्कार बडा। विश्वास करो हो आन खडा ॥
वैपार कडा वैपार कडा। जो तौल सबै गहि ज्ञान घडा ॥ जो
डाल दियो सो डाल महा। कत्ताल समय पत्ताल गहा ॥ जय
जक्त पिता जगदीश यजो। कब्बीर कब्बीर कब्बीर भजो ॥ ११ ॥

(१२०)

कवीरपंथी—

साखी ।

हरि गुरु पीर कवीर लख, अलख पुरुष रुख जोय । हजरतको
पहिचान जब, बजरत काल न कोय ॥ १ ॥

इति श्रीमध्याह्न स्तुति ॥

स्तोत्र ।

(छोटी एकोत्तरी नित्य पाठकी)

सतगुरु शरणं पंकज चरणं मनवच कर्म सदा गहियं । जग
मरण भयं निवारणं अखिलेश्वर अभय कहियं ॥ भेषज नाम
नित प्रति धामं महा काल दारुण गहियं । दीनदयालं जन
प्रतिपालं भवसागर तारण कहियं ॥ १ ॥

भव भय भञ्जन अन्तक गंजन सन्त चकार मयंकं लहियं ।
अनहद नादं दहृत विषादं सोहं हंसा निश्चलयं ॥ अजपा जापं
हरत सन्तापं आदि नाम जपिये अभियं । सहज समाधं हरत
विषादं दयावन्तं सुकृत चहियं ॥ २ ॥

करुणा आदं नाम अनादं मोहित सुनि गेहित वियं । परमा-
नन्दं सचिदानंदं सत्यलोक हठरोहनियं ॥ दीननबन्धुं करुणा-
सिन्धुं अभयनाम जपिये अभयं । कलिकाल करालं फांसी
व्यालं सत्यनाम निश्चय जपियं ॥ ३ ॥

स्थिरं ज्ञानं बीजक ध्यानं अक्षयनाम निज अक्षरयं । नाम
उजागरपति सुख सागर अक्षय राज नायक कहियं ॥ अपरं पारं
नाम है सारं तासु भजन भौ निस्तरियं । सुखसागर दाता
जागृत व्राता अजर अमर सांचो लहियं ॥ ४ ॥

दुर्गजदानी परम अभिमानी धर्मराय शिर मर्दनियं । कलि-
काल करालं फांसी व्यालं तासु भजन भौ निस्तरियं ॥ अजर
अविगत जान विश्रामं कृपा विशेषं निःअंशनियं । जय जय
स्वामी अंतर््यामी ब्राहि ब्राहि करुणानिलयं ॥ ५ ॥

शब्दावली

(१२१)

सूक्ष्मं स्थूलं सम्बी मूलं अनइच्छा रूप सुजस भनियं ।
अज्ञौच अशेषी अमृत पियूषी सर्व मयी अविनाशनियं । सुरति
स्नेही अविचर देही आदि ब्रह्म अर्चित कहियं । स्वतः प्रकाशं
अमरनिवासं पोहपदीप सा मंडनियं ॥ ६ ॥

योग संतायन युक्ति परायन जासु नाम अघखण्डनियं । सुखु
धर्मदासं परम विलासं सत् कवीर सुमिरन कहियं ॥ इति ॥

गुरु शतकसागर नाम स्तोत्र ।

छन्द चौकड़ी । गुरुबोधसे-

दीनबन्धु करुणामय सागर । हंस उधारण तारण आगर ॥
दीना नाथ शरण सुखदाई अभय तासु पद गुरु समराई ।
बन्दीछोर बिरद अति तासू हंस रूप प्रगट जग जासू ॥ अधम
उधारण तारण स्वामी । प्रवर दिगार मालिक अनुगामी ॥ काल
जालके काटनहारे । विरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज क्षमा-
तत्त्व संयुक्ता । राम भूमिका वासक युक्ता ॥ चिन्ता रहित अचिन्त
गुसाई । पारख रूप प्रकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जाननहारे ।
कर्ता नाम प्रकट विस्तारे ॥ निःकामी माया परचंडा । ताको
नाशक पूरन ब्रह्मण्डा ॥ मंगलरूप गुसाई आपू । जगत विदित
पूरण परतापू ॥ साहब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष सबनके
पारा । महामोह दल नाशक स्वामी । हंसन नाह अपार अगामी ॥
आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥ सत्य
यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥ पूजनीय
अनुमान विनाशक । सत्य सुकृत प्रकाश प्रकाशक ॥ नाम सुनीन्द्र
सबन सुखदाई । बारम्बार कहों गोहराई ॥ सत्यसिन्धु प्रभु
दीनदयाला । नाशक अनुप्रय सहज कृपाला ॥ आप जीव नि-
कर्म निधाना । शब्दी अजर अकाल सम जाना ॥ साधुरूप पूरन
परमाना । गरीब निवाज गहहु गुरु ज्ञाना ॥ साई शब्द परखावन

(१२२)

कवीरपंथी-

हारे। तारण तरण विगत संभारे॥ मन अनुमान गुमान विनाशक।
मोद प्रत्यक्ष दान निज दासक ॥ वेद कुरान बुझाय यथारथ।
मन कर्म बचन साधुमें स्वारथ॥ इति शत नाम गुरु गनि आयी।
सब वृत्तांत गुरु मुख जो बुझायी ॥ साधु गुरु कबीर गुसाई।
बन्दीछोर नाम जपु गाई ॥

स्तोत्रं । (कबीर कृपालं)

(महंत मरजाद दास विरचित)

नमो आदि ब्रह्म अरूपं अनामं । भई आप इच्छा रचे सर्व-
धामं ॥ न जानामि कोई करै कौन ख्यालं । नमोहं नमोहं कवीरं
कृपालं ॥१॥ नहीं वेद ब्रह्मा नहीं विष्णु ईशं । नहीं पंचतत्त्वं नहीं
ते अहीशं॥ नहीं जोतरूपा न माया करालं । नमोहं नमोहं कवीरं
कृपालं ॥२॥ नहीं देवदेवी न सूर्य प्रकाशं । नहीं चंद्रतारा नहीं
कोइ आसं ॥ नतो स्वर्गभूलोक नहीं पतालं । नमोहं नमोहं
कवीरं कृपालं ॥३॥ तहां आप इच्छा महाशब्द गाजं । विदेहं
स्वरूपं अनूपं विराजं ॥ भई शब्दते सर्वलोकें विशालं । नमोहं
नमाहं कवीरं कृपालं ॥४॥ तहां सच्चिदानंद लोकें प्रकाशं । सदा
सर्वदा हंस करते विलासं ॥ तहां आपते आप प्रगटे सुकालं ।
नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥५॥ भयो तेजरूपं सबै विश्व कांपो ।
कवीरं कवीरं सबै सृष्टि जापो ॥ सुनी दीनबानी भये है दयालं ।
नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥६॥ तबै नाथ नररूप अवनी सिधारे ।
घरे कालके फैल तेते उबारे ॥ महादीनदासै सु करते निहालं ।
नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥७॥ करै कौन तेरी प्रशंसा सुबाना ।
थके विष्णु ब्रह्मा महेशो भवानी ॥ थके शेष गणनाथ बाणीवि-
शालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥८॥ न काहू कहूं नाथ
तुव पार पायो । अनादे अगम्मे निगम्मे बतायो ॥ तुही निर्गुणं
सर्गुणं रूपजालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥९॥ तुही कोटको-

शब्दावली

(१२३)

टान ब्रह्मांड कीन्हो । तुही सर्वको सर्वदा सुःख दीन्हो ॥ बसे सर्वमें सर्वरूपं दयालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१०॥ जुदे सर्वतेहो मिले सर्वजीवं । अमै नाथ सर्वे लहे नाहि सोवं । भई जोर माया असो चित्ताहलं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥११॥ सबे संतकारं सु तोही बतावैं । यही वेद ब्रह्मादि षट्शास्त्र गावैं ॥ जपै नाम तेरो भजे जो त्रिकालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१२॥

लहे ज्ञान विज्ञान कैवल्यपूरं । महामोहमाया रहे ताहि दूरं ॥ लखी ताहि डरपे महाचित्त कालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१३॥ तजो विषय विस्मादके दुःख भाई । भजो रे कवीरं सदा सुःखदाई ॥ विनय हों करो कवीरं धन्य पाप भालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१४॥ चहो मोद जो नित्त चित्ते विचारं । कवीरं कवीरं कवीरं पुकारं ॥ गहो चरण रहो रत तजो भर्मजालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१५॥ सदादासपै तो कृपा जो विचारं । गऊ बच्छ ये तो हृदय प्रीतधारं ॥ तजे स्वाभि ऐसो जु हैं निष्ठ-भालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥ १६ ॥ कवीर अष्टक जो सुने औ सुनावे । पढे प्रेम युक्ता सो मुक्ता कहावे ॥ धरे संत प्रीते करे कंठमालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं । बिने दास मर्यादकी चित्त दीजे ॥ १७ ॥ प्रभु दासको दास तो मोहिं कीजे ॥ सदा दीनके तो हरो दुःख जालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१८॥

कवीर स्मृष्टिकारणं अस्थूलसूक्ष्मधारणं, कवीरसंतरंजनं दरिद्रदोषभंजनं । कवीर ब्रह्मद्वयं अखंडव्यापतं स्वयं, प्रणम्य पादपंकजं कवीर सद्गुरुं अजं ॥११॥ कवीर सत्तसुकृतं सुनीन्द्रकारुणायतं, कवीरयोगजीतयं अर्चित अन्नअन्ययं ॥ कवीरज्ञानवर्धनं दयाल पाल सज्जनं, प्रणम्य पादपंकजं कवीर सद्गुरुं अजं ॥२॥ कवीर सर्वलायकं सभक्तमुक्तिदायकं, कवीर त्वं भजामि हं विदे-

(१२४)

कवीरपंथी-

हपुरुष वं स्वहं । कवीर सत् सिधये आद्यंतमध्यहीनये, प्रणम्य पादपंकजं कवीर सद्गुरुं अजं ॥३॥ कवीरचित्तकोमलं करोति हंस निर्मलं, कवीर सुंदरं वरं अनाद त्वं अगोचरं । कवीर त्वं निरंतरं वदंति संत तत्परं, प्रणम्य पादपंकजं कवीर सद्गुरुं अजं ॥ ४ ॥ कवीरतातमातरं स्वदेवमित्रात्रातरं, कवीरयोगध्यानमे समूलमंत्र प्रानमे । कवीरनाम सर्वदा जपंति ऋद्धिसिद्धिदा, प्रणम्यपादपंकजं कवीरसद्गुरुं अजं ॥१५॥ कवीरनामभेषजं विध्वंस कर्मरोगजं, कवीरशरनचोत्तमं नृदंदमोदसत्यमं ॥ कवीर त्वं भवागतं प्रबोधजीव आरतं, प्रणम्य पादपंकजं कवीरसद्गुरुं अजं ॥ ६ ॥ कवीर यह प्रसीदयं सजातिलोकधीरयं, कवीररूप जाहशंत जन्ममरण नाशयेत् । कवीर अस्तुतिनिंतं पठेह श्रेय शोभितं, प्रणम्य पादपंकजं कवीरसद्गुरुं अजं ॥ ७ ॥

स्तोत्र ।

सानिविकारं गुरुरूप धारं संसारषारं स्वजनप्रियस्त्वं । यथा घटाकाश तथा त्वमेकं, शब्दं स्रूयं कवीरं नमामि ॥ कवीर नामं पतितं पुनीतं, युगे युगे स्वामि हरंत दुःखं । दातार मुक्तिं पुरुषं पुराणं, चरणारविंदं सततं नमामि ॥ कवीरब्रह्मा तु विष्णुः शिवस्तु, कवीरत्वं देव देव्या समस्तु । मातापिता बंधु सखो

नोट—यह स्तोत्र जैसा मिला है वंसाही डालदिया है. संस्कृतके पंडितोंको इसके शुद्धाशुद्धका विचार करना चाहिये. यदि कोई पंडित शुद्धकर भेज देंगे या यह सूचना देंगे कि. सर्वथा अशुद्धही है तो दूसरी आनूतिमें रखने न रखनेका विचार किया जायगा.

नत्वा तं पदपंकजं सद्गुरुं प्रनतपालं दयालं । आदिपुरुषं विदेहं स्रूयं अमरलोकेशुधीशं ॥ भोभोसत्कवीरयोगजीतं सुनीन्द्रं, करुणामयं सर्वव्यापिकेवलं । शृणुतयां बंदीछोरं दयांकुरु, सत्यं चिदानन्द अखंड नामं । अद्वै अलै शब्द निर्वाणरूपं, निहंगमूलं सतसुकृतस्य ॥ अजाबनंसप्तसिंधुः कृपालं, निस्तत्त्व-

शब्दावली

(१२५)

निष्काम अजाभिनाशी । निगक्षं ब्रह्मस्वयंप्रकाशी, 'अवखंडनं-
त्वंसजीवनं च' पुरुषोत्तमं बंदीछोरं नमस्ते ॥ नमोस्तुते आदि
निरक्षरस्यात्, त्वदक्षरं ब्रह्मक्षरस्य माया । समस्तमूलं च जानाति
कोवा, भजामित्वं पाद पुरुषं बिदेही ॥ अंतर्बहिर्भिन्यते कायवाचं,
ध्यानस्मृतं पाद मुखारविंदं । जे नत्वगृह्य चरणं शरण्यं, ते सत्य-
लोके हंसागमख्यात ॥ मायापरे पुर्वत्वमेक सत्यं, अनाद चैतन्य
स्वतंत्रं नित्यं । सुखागरं सत्तलोकं अनूपं, सिंहासनं पुष्पदीपनिवासं ॥
धनाद्यं, कवीरं त्वं पारमं न शेषं ॥ प्रणम्य त्वं पाद भो धर्मदासं,
बंकेज सहतेज चतुर्भुजेषु । भवाधि कैवर्तं चतुर्गुरुणां, चित्तकोमलं
सर्वदुःखं हतं च ॥ चूडामणिनाम सुदर्शनं च, कुलपतेः प्रमोदं तत्कौल
नाम । अमोलमाचार्य सुरतः सनेही, तद्विहितं हक सुपाकनामं ॥
तुभ्योनमः प्रगटनामं च धीर्यं, किमस्तुति स्वाभि परं पुराणं ।
असंख्य चंद्रार्कं प्रकाशयुक्तं, पुरुषैकरोमं नच भाव तुल्यं । षष्ठ-
हदसह सूर्यं हंसह प्रकाशं, करोति ध्यानं चरणं नमस्ते ॥ शिक्षा
त्वया पुर्वबलवान माया, बिछोह कुरुवांत पदाम्बुजस्य । अपार
संसार भो दीनबंधू, जानामि सर्वांनि मनंतरेषु ॥ पुरुषं च एकं
सुतह षोडशानां, भवेभिन्नतामे निराकार अद्या । शिवं शक्तिजायं
विधिहविष्णुरुद्रो, कियोचारखानीमुजक्तंसमुद्रो ॥ कूर्म जलारंग
विवेकज्ञानं, दया क्षमाशील निःकाम धीर्यं । अर्चितमानंद सुभाव
प्रेमं, सतोष सहजं निरंजनाद्या ॥ अग्रं च भुङ्क् मथह सुर्ति सोहं,
सापंचमे योगजीतं अमीयं । मुक्तामनिर्नाम वेहदी विहंगं, कवीर
त्वं सर्वं बीजम् प्रनामं ॥ नमोस्तुते आदिपुरुषं बिदेह, त्रैलोक
वेदान सर्वोपरित्वं । अनंतब्रह्मांड त्वयाश्रितं च, निर्गुणौ गुणस्यात्
बिस्तारकारं ॥ नमोस्तुते स्वाभि समर्थ रूपं, संतायनं सत्तनामं च
ज्ञानि । अग्रं अर्चितं पुरुषं मुनींद्रं, करुणामयं योगजीतं अमीयं (?)

(१२६)

कवीरुपथी—

इंसो हितार्थाय वंदेगुरुर्णां, मे देहि मे देहि चरणं शरण्यं ॥ नमो
नमो उग्रनामं प्रसिद्धं, दयापाल दृष्टो समग्रं समुद्धो । यथा भानु
उदयतमोपुंजदहनं, तथास्तु प्रतापस्य चरणं प्रपद्ये ॥ नमोस्तुते
वंशबयालिसं च, चरणाभृतं पानमहाप्रसादं । गुरोः कृपायस्य सदा
शुभस्य, शरणागतं मुक्त भवेतहंसा ऋद्धिचसिद्धिचबुद्धिचदाता,
विवर्धनं भक्त त्वमेव ज्ञाता । येभक्तिर्कुर्वन्ति तत्तत्पादपद्मे, प्रमुच्यते
तस्य दुःखस्य राशिः ॥ सर्वाघदहनं च यो जीव मुक्तो, इदं च
स्तोत्रं नित्यं भणंते । पुरुषस्य अंशं नमोहंसवंशं, प्रणम्यत्वं दास
शीतलं शरण्यं ॥ नमः स्तुति स्वामि जानामि को वा, अकथं
महत्त्वं परंपुराणं । सदा कृपा हंसदितार्थ रूपं, मे देहि मे देहि
चरणं शरण्यं ॥

स्तोत्र ॥

नमामि कलातीत कामादि रहितं, वरिष्ठं बरीयान विज्ञान
सहितं । रंकारमस्मी सदाकाल धन्यं, रमेतिकवीरं न भेदानभिन्नम् ॥
स्वयं शाश्वतं केवलं ज्ञेयरूपं, निजानंदमूर्ति अखंडं सरूपं ।
सुधाशब्दपुंजं चिदामर्कइंद्रुम्, सदोदित्यनुदैश तेजारबिंदं ॥ गुणं
निर्गुणं वर्णाश्रमं धर्मरहितं, स्थितप्रज्ञगृह्यं समे चित्यसततं ।
महदादिमेको गुणातीतनित्यं, षष्ठं चतुष्ठादिशब्दादिव्यक्तम् ॥ पृथ्वी
तेजआकाशतोयं समीरं, निजाकिंचिदंतव्यापककवीरं । अनामं
अनादिं श्रुतियं वंदती, कवीरादिशब्दं गिरा न रंवदंती ॥ उदया-
स्ततीतं परापारमीशं, तुरीयादिमेकं स्फुरंतं अशेषं । दयाआदिदे
धर्मसंपन्नज्ञानं, लोभादिरागादितमनाशभानं ॥ अन्ययवलं निर्गुणं
निर्विकारं, अनादिमव्यक्त गगनोपकारं । पक्षविपक्षं निजदेशकालं,
नमामि कव्वीर गिरासुत्रमालं ॥ इदं सर्वं जगतं महा इंद्रजालं,
मृगावारपश्यं प्रभो प्रभिवालं । प्रभु बरदयालं जनानंदकारी,

शब्दावली

(१२७)

पुरुषोत्तमोयं द्विजपादवारं ॥ महारौद्र घोरं नरेशान वंशा, तोयं
च बारं च वहिनीद नीशा। मदो दम दमंतं मतंगं च दीशा, मृगादी
च पश्यं करीशब्दचीशा ॥ महाभयं च सुलतान सजदापि जाई,
कदमखाखकेवल्य खुदेतं खोदाई। सुरशिद मिहखान साहब
दिगारभ। गुनहगार बन्दो तकसीर वारम् ॥ विनय वेश सततं च
कहूणा निधानं। सदा सत्य संगदि ध्येयं च ज्ञानम् ॥ रागस्थादि
बन्दीछोरं नमामि, सदानन्द रूपं कवीरं भजामि ॥ इति ॥

स्तोत्र ॥

भो कवीर हरन पीर धीर बुद्धि धारणं। सत्यनाम परमधाम
सर्वकरण कारणं ॥ हंसभूप परमरूप वेद विद्य छेदक। न्याय
नीत अति अजीत ज्ञानवृद्ध धारणं ॥ संतरक्ष साधुपक्ष भक्तमुक्त
तारणं। गुणातीत भयाभीत सर्वशिक्ष मंडनं ॥ निराधार सताधार
परमपार पारणं। प्रणत पाल अतिदयाल कालजालटारणं ॥
दयासिंधु क्षिमाइंदु श्वेतबिंदु शोभितं। शब्दरूप अति अनूप
अमीरूप सारणं। अकहनाम त्वं अकाममानहीन पालनं। पाप
ताप दहनकृत्य तिहुँ ताप नाशनं ॥ भवातीत जोगजीत हंसरूप
लक्षणं। सत्यरूप गुरुसरूप शरणागत तारणं ॥ प्रगट प्रतक्ष
अक्षज्ञान रूप साक्षिनं। सत्यनाम आदिपुष्प सर्वघट भासनं ॥

सद्गुरु पदरत प्रीत अति, सारं सार विचार।
सत्तनाम हंसा गहे, उतरे भौनिध पार ॥

कवीरचालीसा।

ॐ नमो आदि ब्रह्माय शब्दे सरूपं। नमोजीवजावद्व्रमय-
विश्वरूपं ॥ गहु शरणप्रानी जो सुखसिंधु चहु रे। कबीर कबीर
कबीर कहुरे ॥ १ ॥ का रूप करताय निरताय देखो। वा रूपविस्तार
नहि आन पेशो ॥ रा रूप रमताहि सब माँहि रहुरे। कबीर

(१२८)

कवीरपंथी-

कक्वीर कक्वीर० ॥ २ ॥ का कृष्णरूपं सरूपं अरूपं । वा विष्णु
धारी सबे देव भूपं ॥ रा रुद्ररमताहि दमताहि गहुरे । कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ३ ॥ कहुरे का कुलकुला जो नहीं आन कोई ।
वा बेलबेली अकेली न दोई । रा रार मेटो समेटो न बहुरे, कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ४ ॥ का काहि कैवल्य करताहि आपे । वा
बीजविस्तार हरे तीन तापे । रा रोमरोमाहि नर ताहि गहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ५ ॥ का काल मरदम्य सो हरदम जपोरे ।
वा बीज जेठरान तप ना तपोरे ॥ रा राह निरबाह गुरुबाह गहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ६ ॥ का कहि डरपेजु अरपे सिंहको ।
वा बोलबोलै सो गहुरे गुरुको ॥ रा राह एही सो देही न दहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ७ ॥ का कोउ तेरी सो महिमा पढे है ।
वा कहय रूपे सरूपे गढे है ॥ रा रमताहि सबमाहि अहुरे । कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ८ ॥ जिहि पाय इच्छाय सतलोककीन्हा । उप-
जाय कंजाय तहां बासलीन्हा । बहुर्भाति सुखधाम तहां रास
रहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ९ ॥ तहां एक अंडाय तेजा-
सुभयेऊ । करि लोकन्यारा सु त्रैलोक दयेऊ ॥ तिहि आय जग-
जीव जम दाह दहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १० ॥ जी त्रास
जम फांस करुना उचारे । हे पुरुष हे पुरुष बानी पुकारे ॥ सुनी
श्रवण झनकार रुस्कार बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ११ ॥
नर रूपधर भूप गुरुरूप धाये । जिमि दाठ बाघेसे सुरभी छुडाये ॥
तिमि जगत जम जीव गजग्राह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर०
॥ १२ ॥ दे सत्यशन्दे विदारी विथा है । जुगन जुगन जीवकी बरनी
कथा है ॥ कलजुग जिवकाज दुख आप सहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर०
॥ १३ ॥ हे ब्रह्म आपे सु लीला करी है, न तत्त्वपांचों न देही धरी
है सुखदुःखन्यारे है कहवे में अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर

शब्दावली

(१२९)

कहुरे ॥ १४ ॥ शाह सिकंदर सु अंदरमें लेखा । कैसा फकीरा य
चहिये तो देखा ॥ कर बांध पग बांध बोरे सु दहुरे । कक्वीर
कक्वीर कक्वीर कहुरे ॥१५॥ टूटे है जंजीर बैठे हैं तीरा ॥ बोला
सो शाह यह सांचा फकीरा ॥ फिर बोल बोले कि गजमस्त
अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १६ ॥ मातंग माते न जाते
ढिगे हैं । लख रूप सिंधे सु चिक्कार भगे हैं ॥ देशाह अजमत
स्वामी सु बहुरे कक्वीर कक्वीरकक्वीर कहुरे ॥१७॥ देखो सबे काम
करता खिजूका । भर तोप गोला सु रोपा बिजूका ॥ जिम देह
गजतूल गोली न लहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥१८॥ है दीनबंधू
दया देख अंदर । गत जौन जैसी सो नाचत सु बंदर ॥ तिय आप
शाह सिकंदर जो चहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १९ ॥ फिर
शाह बोला य गोला न डरपे । तेगे अनेगे चलाया है गरपे ॥ जल
धार जिम सार मझि आय बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२०॥
कहांलो कहां और केतो कहानी । तजी स्वामि ऐसो भुलानोरे
प्रानी ॥ निष्काम निष्कोध निरलोभ बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर
॥२१॥ हारा है शाह सो दैऽनेक पीरा ॥ नाही फकीरा यह है आप
पीरा ॥ जाना सो नरनाह सरनाह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर०
॥२२॥ खूने अनेक जो शाहूने कीन्हा । जानाजी अपने सु चितमें
न दीन्हा ॥ जिमितात सुतकेर औगुण न गहुरे । कक्वीर कक्वीर
कक्वीर० ॥२३॥ डारे सु सिरपेज ऐचे जु मूछे । का लेत । का लेत ।
बातें सो पूछे ॥ है स्वामि सबकेर सब माहीं बहुरे । कक्वीर कक्वीर
कक्वीर० ॥२४॥ फिर एक औरि सुनोरे गुनोरे । तजि-स्वामि ऐसो
न सीसे धुनोरे ॥ कहीं है पुरी आप काशीमें रहुरे । कक्वीर कक्वीर
कक्वीर० ॥२५॥ गोपालपंडा सो अटका बनायो । फूटा है पटका
सु चटका बुझायो ॥ काहू न ताको वो भेद लहुरे । कक्वीर कक्वीर

कवीरपंथी शब्दावली ५