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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

(११८)

कवीरपंथी-

कहुँ भूख सँहारक ऊँख भई, पर हेत सहे दुख जो अधिका।
कहुँ स्वेत कपास विकास कियो । पर छिद्र छुपावन जो तन धारा ॥
कहुँ अन्न रु साग व पात उगे, तरकारि वनस्पति चौदह भार।
सुख साज सभी सब घेर मही, यह केवल भानु प्रताप तुम्हारा ॥११॥

कक आदिपिता कथि वादि निता, ख ख सुन्न निरंजन ताहि ते
हेरा ॥ खखते प्रगट भये खंड सबै, खख ज्योति अखंड दिशों दिशि
हेरा ॥ वसुदेव बकार विश्वभ्रम है, बर बीज चराचर चीजचितेश।
रचनाके भंडारको धारकसो, धर ओष्ठन द्वारके ऊपर डेरा ॥१२॥

भवसागर जालको काल बने, ररकार बडे सरकार कहायो ।
तिन खोलि केवाडि लियो, बितको तेहि ठाहर ते गहि बाहर
आयो ॥ तप घोर करे यक पाय खडे, भव बारिध जारिध राज
लिखायो । तरनी-कक-है कडि हार-बबा रर-दंड तिहुँ जगको
उधरायो ॥ १३ ॥

ररकार धरे शिर बिन्दु जबै, इभि नाद रु बिंद है जिन्द यती
सो । सो कृशान रु भान ससांक भये, नहि पावत पार अपार
गतीसो ॥ ररविन्दके बीच अकारछपै, कहँ रामको नाम विरंच
मतीसो । रररेफ गफेलमै भेद सही, नहीं जात कही वह बात
रती सो ॥ १४ ॥

रर पूर्ण ब्रह्म निरंजन है, वह भाँतिके भाजन भञ्जन कीन्हों।
बब बीज विना कछु चीज नहीं, दोउ एक भये रचना चित
दीनों ॥ कक कायक कर्म किया सबही, फबही तबही जबही
मिले तीनों । ककही बबही ररही ररही, सरही सब काम कवीर
जो चीन्हो ॥ १५ ॥

कक कंटपै बैठिके चेतनदे, जिव संठ उदार सुधारत वानी ।
बब अग्र गयो जहँ नग्र नयो, सरहद पै लह जमा सब आनी ॥