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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१२१)

सूक्ष्मं स्थूलं सम्बी मूलं अनइच्छा रूप सुजस भनियं ।
अज्ञौच अशेषी अमृत पियूषी सर्व मयी अविनाशनियं । सुरति
स्नेही अविचर देही आदि ब्रह्म अर्चित कहियं । स्वतः प्रकाशं
अमरनिवासं पोहपदीप सा मंडनियं ॥ ६ ॥

योग संतायन युक्ति परायन जासु नाम अघखण्डनियं । सुखु
धर्मदासं परम विलासं सत् कवीर सुमिरन कहियं ॥ इति ॥

गुरु शतकसागर नाम स्तोत्र ।

छन्द चौकड़ी । गुरुबोधसे-

दीनबन्धु करुणामय सागर । हंस उधारण तारण आगर ॥
दीना नाथ शरण सुखदाई अभय तासु पद गुरु समराई ।
बन्दीछोर बिरद अति तासू हंस रूप प्रगट जग जासू ॥ अधम
उधारण तारण स्वामी । प्रवर दिगार मालिक अनुगामी ॥ काल
जालके काटनहारे । विरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज क्षमा-
तत्त्व संयुक्ता । राम भूमिका वासक युक्ता ॥ चिन्ता रहित अचिन्त
गुसाई । पारख रूप प्रकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जाननहारे ।
कर्ता नाम प्रकट विस्तारे ॥ निःकामी माया परचंडा । ताको
नाशक पूरन ब्रह्मण्डा ॥ मंगलरूप गुसाई आपू । जगत विदित
पूरण परतापू ॥ साहब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष सबनके
पारा । महामोह दल नाशक स्वामी । हंसन नाह अपार अगामी ॥
आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥ सत्य
यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥ पूजनीय
अनुमान विनाशक । सत्य सुकृत प्रकाश प्रकाशक ॥ नाम सुनीन्द्र
सबन सुखदाई । बारम्बार कहों गोहराई ॥ सत्यसिन्धु प्रभु
दीनदयाला । नाशक अनुप्रय सहज कृपाला ॥ आप जीव नि-
कर्म निधाना । शब्दी अजर अकाल सम जाना ॥ साधुरूप पूरन
परमाना । गरीब निवाज गहहु गुरु ज्ञाना ॥ साई शब्द परखावन