कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथो—
ज्योहि ज्यों सत् समीप गयो, बलछीन भयो सब शस्त्रन खोई ।
नियरान गयन्दहि प्राण तबै जरि, छार भयो तब खाक मिलोई ॥१॥
वैराग विवेक विचार बढे, अरु ज्ञान चढे है निशान बजाई ।
चारिहु युत्थप संग अनी, चतुरंग धनी दम संयम ताई ॥ शुचि
साधन मोन अरु दान दया, है आचार तपोधन कौन गनाई । दल
साजिकै सत्य कवीर चढे; रिपु धीर कहा जो सके समुहाई ॥१०॥
दुसरी दिशिते मनराव अनी, नहिं जात गनी अगनी गहि धाई ।
तह काम रु कोध है मोह महा, अरु लोभ रहा सरदार लडाई ॥
निरदाय असत् अशौच लिये, सब आय सहाय भये यक ठाई ।
चवगान समाज जुरे दल दो, घमसान परे तहैं लोह चलाई ॥११॥
दिननायक सायक छूटि चले, महि खेसघनी ध्वजनी ध्वज टूटे ।
तमके दमके बुति दामिनि ज्यों, दसहूँ दिशि घेरि लियो खल फूटे ॥
करको सर कोटि दिवाकरको, सब देश विदेशनमें जब टूटे । नहिं
शूर कोई भजि दूर गये, रिपुसेन सहाय सबे गहि कूटे ॥१२॥
हरि श्वेत ध्वजा फहरान लगे, घहरान लगे हैं अनाहत ढंका ।
यम युत्थ अपार खभार परे, जितही तितही सब सोच संसंका ॥
बल वीर कवीर के सन्मुख हो, नहिं धीर धरे तिरछा अरु बंका ।
गण तीर शरीर समाय गये, छनमांह भये सब कालको फंका ॥१३॥
मद मार महामतवार चले, समुहाय बजावत ढोल दमामा ।
गहि शस्त्र अनेक चमू चमकी, पहिरे गहिरे रंग जामिन जामा ॥
दुरबुद्धि दगा छल छिद्र पगा तहैं; कपट अखंड सगा सठ तामा ।
भय भयं भयावन भूत चले, बहु दूत कपूत रले अघधामा ॥१४॥
क्रमही क्रम ज्यों नियराय चले सियराय चले अगिले भट भोरे ॥
हरुए हरुए बिचले बिचले, पछिले पछिपलि रहे कुछु थोरे ॥
थिरता पद हानि डटे कितने, अभिमान ते बात सटे बरजोरे ।
जब पेलि अगार लगार चले, गहि गूजसों सुज हडावरि फोरे ॥१५॥