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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 134

(१२८)

कवीरपंथी-

कक्वीर कक्वीर० ॥ २ ॥ का कृष्णरूपं सरूपं अरूपं । वा विष्णु
धारी सबे देव भूपं ॥ रा रुद्ररमताहि दमताहि गहुरे । कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ३ ॥ कहुरे का कुलकुला जो नहीं आन कोई ।
वा बेलबेली अकेली न दोई । रा रार मेटो समेटो न बहुरे, कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ४ ॥ का काहि कैवल्य करताहि आपे । वा
बीजविस्तार हरे तीन तापे । रा रोमरोमाहि नर ताहि गहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ५ ॥ का काल मरदम्य सो हरदम जपोरे ।
वा बीज जेठरान तप ना तपोरे ॥ रा राह निरबाह गुरुबाह गहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ६ ॥ का कहि डरपेजु अरपे सिंहको ।
वा बोलबोलै सो गहुरे गुरुको ॥ रा राह एही सो देही न दहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ७ ॥ का कोउ तेरी सो महिमा पढे है ।
वा कहय रूपे सरूपे गढे है ॥ रा रमताहि सबमाहि अहुरे । कक्वीर
कक्वीर कक्वीर० ॥ ८ ॥ जिहि पाय इच्छाय सतलोककीन्हा । उप-
जाय कंजाय तहां बासलीन्हा । बहुर्भाति सुखधाम तहां रास
रहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ९ ॥ तहां एक अंडाय तेजा-
सुभयेऊ । करि लोकन्यारा सु त्रैलोक दयेऊ ॥ तिहि आय जग-
जीव जम दाह दहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १० ॥ जी त्रास
जम फांस करुना उचारे । हे पुरुष हे पुरुष बानी पुकारे ॥ सुनी
श्रवण झनकार रुस्कार बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ११ ॥
नर रूपधर भूप गुरुरूप धाये । जिमि दाठ बाघेसे सुरभी छुडाये ॥
तिमि जगत जम जीव गजग्राह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर०
॥ १२ ॥ दे सत्यशन्दे विदारी विथा है । जुगन जुगन जीवकी बरनी
कथा है ॥ कलजुग जिवकाज दुख आप सहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर०
॥ १३ ॥ हे ब्रह्म आपे सु लीला करी है, न तत्त्वपांचों न देही धरी
है सुखदुःखन्यारे है कहवे में अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर