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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(११६)

कवीरपंथी—

राजसं वकार विष्णु सात्त्विकं ॥ रकार शम्भु तामसं उपाय पोष
धातकं । समस्त दोष पातकं निपातकं नमोस्तुते ॥ १६ ॥

कवीर पाद पंकजं सनेम प्रेम ध्यायकं । गुणानि नाम कीर्तनं
सुधाम काम दायकं ॥ विराग त्याग लभ्यते हदं पदं गहायकं।
तरंत तारनं भयं विदारनं नमोस्तुते ॥ १६ ॥

अथ मध्याह्न-शबैया ।

कवीर ज्ञानप्रकाश पृष्ठ ५३०.

तन भंग पतंग उतंग भये, बट पार जुबारकी खोजन पाईं ।
बरते नव खण्डमें तेज महा, ब्रह्माण्डमें आनि रह्यो ठहराईं ॥ पहरी
अरु स्वान सुखी सबही, पथिको निर्भय श्रम पन्थ बिहाईं । तुमरे
परताप सन्ताप गयो, मम दंड प्रणाम तुम्हें रविराईं ॥ १ ॥

गिरि कन्दर अन्दर दुष्ट दुरे, रवि तेजप्रवाह सभी तम भंजे ।
यम काल सकाल विहाल पडे, नहि आय कोई धर्मराजके पंजे ॥
हग दृष्टि प्रचंड ते अंड सुझे, जन रञ्जन पायनके रज अंजे । गुरु
नाम चरित्र पवित्र लखे, खल चोर निशान निसाचर गंजे ॥ २ ॥

तम वंश विध्वंस न संशकहूँ, दशाहूँ दिशि हंस सभा सरसाईं ।
मृत्यु नाथ अनाथ बेहाथ भये, बल वीरज धीरज तेज गवाईं ॥
रमि राम चले पर धाम सबे, चहुँ ओर फिरी सत नाम दुहाईं ।
श्रम भंड करे न विहंडकने, यम दंडक दंडन मारि भजाईं ॥ ३ ॥

नहि खोट है ओट उलूक लुके, सुचि सेत सती विरती वर
गाजे । सब झार कवीर कवीर कहै, छल छिद्रपै श्रम संशय भाजे ॥
तिहुँ काल है सत्य कवीर सुखी, गुण गाव सभी सुखको सज
साजे । यह बारह पंथ कला रविको, प्रभु पूरण ब्रह्म हो न्योम
विराजे ॥ ४ ॥

हिमजार जुबार जुबार धने, निज शृङ्ग शिलापै किला घर छाईं ।
बड वृद्धि भई खगरे वगरे, फिर स्वर्ग दिशा शिर ऊंच उठाईं ॥