कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
बेदबर, वेद वरदानन बखान बर बरनी । कलि कलमख कुल
कंटक कटक कोटि; कीर्तन कवीर करतारकर करनी ॥
कबीर मानुप्रकाशपृष्ठ २४१.
इति कबीर शानु उदय सर्वथा और कवित ।
मध्याह्न संध्या-साखी ।
साहब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय । शरण आय
यम सो बचे, आवागमन न होय ॥ १ ॥ दया करन अवगुण
हरण तारण तरण उदार । अशरण शरण, वन्दू चरण तुम विनु
नहिं निस्तार ॥ २ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके
हाथ । त्रसित गह्यो साहिब शरण, भव भय हारि सनाथ ॥ ३ ॥
प्रभु सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान । लोह कनक पारस
करे, साहब शरण समान ॥ ४ ॥ वन्दों चरण सब दुखहरन,
प्रभु प्रसाद दुख धूरि । दया करी सब दुखहरी, संसृत शूल भो
दूरि ॥ ५ ॥ बहे बहाये जात थे, भौसागरके माँहि । दयाकरी पखाँय
सब, शरण आय गहि बाँह ॥ ६ ॥ संतत अभय गुरुके चरण, सदा
परख प्रकाश । समन सवे भवजालतम, राम रहस सुख वास ॥ ७ ॥
सर्वोपरि गुरुके चरण, जो हारी भवखेद । परम उदार सागर दया,
थाह न पावे वेद ॥ ८ ॥ वारों तन मन धन सबे, पद परखावन हार ।
गुण अनन्त जो पचिमरे, विनु गुरु नहिं निरतार ॥ ९ ॥ संधि
परखावे जीवकी, काटे यमको फन्द । साहब दीन दयाल सो,
संशय खंडे द्रन्द ॥ १० ॥ द्रन्दज सत्य असत्यको, जहाँ नहीं
कुछ लेश । सो प्रकाशक गुरु परख है, मेटत सकल कलेश ॥ ११ ॥
जाहि दया गुरु परखलहि, मेटे सब भव जाल । रक्षक बन्दी
छोर सो, साहब दीन दयाल ॥ १२ ॥ भेष अमद्गल नष्ट गुण
जेते त्रयविधि फांस । अदल चलाई कालपर, सो त्रिदोषहिं
नाश ॥ १३ ॥ अदल चलाई सत्यका, साहब बन्दी छोर ।