कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 968 में से
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पुरुषोत्तमोयं द्विजपादवारं ॥ महारौद्र घोरं नरेशान वंशा, तोयं
च बारं च वहिनीद नीशा। मदो दम दमंतं मतंगं च दीशा, मृगादी
च पश्यं करीशब्दचीशा ॥ महाभयं च सुलतान सजदापि जाई,
कदमखाखकेवल्य खुदेतं खोदाई। सुरशिद मिहखान साहब
दिगारभ। गुनहगार बन्दो तकसीर वारम् ॥ विनय वेश सततं च
कहूणा निधानं। सदा सत्य संगदि ध्येयं च ज्ञानम् ॥ रागस्थादि
बन्दीछोरं नमामि, सदानन्द रूपं कवीरं भजामि ॥ इति ॥
स्तोत्र ॥
भो कवीर हरन पीर धीर बुद्धि धारणं। सत्यनाम परमधाम
सर्वकरण कारणं ॥ हंसभूप परमरूप वेद विद्य छेदक। न्याय
नीत अति अजीत ज्ञानवृद्ध धारणं ॥ संतरक्ष साधुपक्ष भक्तमुक्त
तारणं। गुणातीत भयाभीत सर्वशिक्ष मंडनं ॥ निराधार सताधार
परमपार पारणं। प्रणत पाल अतिदयाल कालजालटारणं ॥
दयासिंधु क्षिमाइंदु श्वेतबिंदु शोभितं। शब्दरूप अति अनूप
अमीरूप सारणं। अकहनाम त्वं अकाममानहीन पालनं। पाप
ताप दहनकृत्य तिहुँ ताप नाशनं ॥ भवातीत जोगजीत हंसरूप
लक्षणं। सत्यरूप गुरुसरूप शरणागत तारणं ॥ प्रगट प्रतक्ष
अक्षज्ञान रूप साक्षिनं। सत्यनाम आदिपुष्प सर्वघट भासनं ॥
सद्गुरु पदरत प्रीत अति, सारं सार विचार।
सत्तनाम हंसा गहे, उतरे भौनिध पार ॥
कवीरचालीसा।
ॐ नमो आदि ब्रह्माय शब्दे सरूपं। नमोजीवजावद्व्रमय-
विश्वरूपं ॥ गहु शरणप्रानी जो सुखसिंधु चहु रे। कबीर कबीर
कबीर कहुरे ॥ १ ॥ का रूप करताय निरताय देखो। वा रूपविस्तार
नहि आन पेशो ॥ रा रूप रमताहि सब माँहि रहुरे। कबीर