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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

( ५८ )
परन्तु ऐसा मानने पर 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति । संग्रामो
युज्यतां तस्यां............' ( उद्योग० १४२।१८ ) भगवान् श्रीकृष्ण का यह वचन
अत्यन्त गौण सिद्ध होता है । क्योंकि मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा म मार्गशीर्ष
शुक्ल चतुर्दशी 'मृगशिरा' पन्द्रहवें स्थान पर है । पुष्य नक्षत्र में चली हुई सेना
ज्येष्ठा में कुरुक्षेत्र पहुँची, ऐसा भी नहीं कह सकते । करोड़ों की संख्या में
उपस्थित उभय पक्ष के सैनिक लगभग तीन सप्ताह में शिविरादि का निर्माण और
युद्धभूमि का परिष्कार कर पाये, ऐसा भी नहीं कह सकते । साथ ही ज्येष्ठा से
श्रवण तक बत्तीस दिनों में ही एक-एक दिन अवकाश देकर युद्ध हुआ, यह भी
संभव नहीं । 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्' इस श्रीकृष्ण वचन के
रहते हुए मृगशिरा से रोहिणी तक युद्ध के अनारम्भ का प्रामाणिक हेतु प्रकाश
में लाना चाहिये । अथवा अवकाश और अनवकाश-युक्त युद्ध की कोई प्रामाणिक
रूपरेखा का अनुसन्धान करना चाहिये ।
श्रीभीष्मपितामह के नेतृत्व में दश दिनों तक, द्रोणाचार्य के नेतृत्व में पाँच
दिनों तक, कर्ण के नेतृत्व में दो दिनों तक तथा शल्य के नेतृत्व में आधा दिन
युद्ध हुआ । उसके बाद भीमसेन और दुर्योधन का गदायुद्ध हुआ । फिर सौप्तिक
संहार हुआ । इस तरह अठारह दिन तक युद्ध हुआ अथवा अठारह दिनों में
महाभारत युद्ध पूर्ण हुआ ।
परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा ।
जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
( भीष्मपर्व १३।११ )
युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् ।
ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः ॥
( द्रोणपर्व २०१।१०० )
युद्धं कृत्वा महद्घोरं पञ्चाहानि महाबलः ।
ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥
( द्रोण० २०२।१५५ )

ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् ।
पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥
( आश्वमेधिक० ६०।२१ )
अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
तस्मिंस्तदार्द्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
( आश्वमेधिक० ६०।२४ )
अथापराह्ने तस्याह्नः परिवार्य सुयोधनः ।
ह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥
( शल्यपर्व १।१२ )
भारत सावित्री ने भी इसी तथ्य का प्रकाश किया है--
दिनानि दश भीष्मेण भारद्वाजेन पञ्च च ।
दिनद्वये तु कर्णेन शल्येनार्धं दिनं तथा ॥
दिनार्धं तु गदायुद्धमेतद्भारतमुच्यते ।
एवमष्टादशं हन्ति अक्षौहिण्यो दिन क्रमात् ॥
( भारत सावित्री ७९-८० )
'अठारह अक्षौहिणी सेना और अठारह दिनों तक युद्ध' महाभारत की यह
प्रसिद्धि महाभारत में ही एक श्लोक में सन्निहित है--
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ।
तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥
( आदिपर्व २।३८१ )
अवकाश-सहित
श्रवण युद्धान्त अथवा लगातार अठारह दिनों तक युद्धवाली गणनाओं की
समीक्षा करने से पूर्व अवकाश के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय परमा-
वश्यक है ।
मूल के अनुशीलन से यह सिद्ध है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर
दुर्योधन वध तक लगातार युद्ध हुआ । द्रोणाचार्य ने अभिमन्यु वध-तक प्रतिज्ञा

( ६० )
पूर्वक युद्ध किया । अभिमन्यु वध से क्रुद्ध अर्जुन ने जयद्रथ वध की अमोघ
प्रतिज्ञा की । जयद्रथ के पश्चात् क्रुद्ध दुर्योधन ने रात्रियुद्ध की घोषणा की ।
उसी रात्रियुद्ध में घटोत्कच के वध से शोकार्त धर्मराज युधिष्ठिर जब कर्ण से
युद्ध करने का निश्चय कर जीवन को संकट में डालकर आगे बढ़ रहे थे, तब
श्री व्यासदेव ने उन्हें ऐसा करने से रोका और दिव्यदर्शिता के अमोघ
प्रभाव से आँशीर्वाद देते हुए कहा—
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पार्थिवैश्च महात्मभिः ।
कौरवान् समरे राजन् प्रतियुद्ध्यस्व भारत ॥
पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ।
( द्रोणपर्व १८३।६४, ६५ )
“भरतवंशी नरेश ! तुम अपने समस्त भाइयों तथा महामना भूपालों
के साथ जाकर समरभूमि में कौरवों का सामना करो । तात ! आज के पाँचवें
दिन सारी पृथिवी तुम्हारी हो जायगी ।”
श्रीवेदव्यासजी का उक्त वचन तभी सार्थक हो सकता है जब उसके बाद
युद्ध लगातार संभव हो ।
तमिस्रा रात्रि के घोर अन्धकार को देखकर तथा प्रचण्ड युद्ध में उभय
पक्ष को श्रमित और निद्रित देखकर प्राज्ञ पार्थ ने रात्रियुद्ध को कुछ समय
के लिये विश्राम दिया । सबों ने युद्धभूमि में ही विश्राम किया । उत्तररात्रि
में चन्द्रोदय के प्रकाश में पुनः युद्धारम्भ हुआ । बस, द्रोणाचार्य के नेतृत्व का
अन्तिम दिन आ गया—
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्णस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्रिणः ॥
( द्रोणपर्व १९१।९ )
“उनके निरंतर बाण चलाते चार दिन और एक रात का समय बीत
चुका था । उस दिन के ( पन्द्रह भागों में ) तीन ही भाग में उनके सभी
बाण समाप्त हो गये ।”

( ६१ )
उक्त वचन से तो स्पष्ट ही है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश
की बात कौन कहे, एक रात्रि-युद्ध भी हुआ । जो अवकाशयुक्त युद्ध मानते
हैं, उन्हें भी चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानना पड़ता है ।
अब रही भीष्माचार्य के नेतृत्व में एक-एक दिन अवकाश की बात !
पितामह के नेतृत्व काल में सायंकाल चौथे दिन के अवहार के समय उनका
वचन है—
तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकारिभिः ।
घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥
( भीष्मपर्व ६४।७० )
“अतः विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध
करना मुझे नहीं रुचता । आज युद्धविराम घोषित कर दिया जाय, कल
सबेरे हम विपक्षियों से युद्ध करेंगे ।”
साथ ही अवहार के बाद रात्रि बीतने पर पुनः नित्य ही युद्धारम्भ का
वर्णन भी भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाशयुक्त युद्ध को अप्रामाणिक सिद्ध
करता है ।
भीष्म पतन के बाद अवकाशयुक्त युद्ध इसलिये भी असम्भव है, क्योंकि
ऐसा मानने पर शेष आठ दिन का युद्ध पितामह के शरशय्या के पन्द्रह दिन
सिद्ध करेगा ।
फिर भी विचारकों के सम्मुख यह गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है कि
मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी तक युद्ध को
अनारम्भ रखना भी अनुमान सिद्ध ही है । इस अनुमान में लगातार अठारह
दिनों तक युद्ध और श्रवण में युद्धान्तरूप वचन प्रमाण है । इसी तरह यह भी
कहा जा सकता है कि जैसे युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन प्रमाण है, वैसे ही
युद्धारम्भ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण है । न तो श्रीकृष्ण वचन के कारण
बलदेव वाक्य बाधित होने योग्य है और न बलदेव वचन के कारण श्रीकृष्ण
वचन ही बाधित होने योग्य है । साथ ही एक-एक दिन अवकाशयुक्त युद्ध
भी असम्भव है । इधर द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर युद्धान्त तक प्रतिज्ञा-

( ६२ )
बद्ध है दैनिक युद्ध का उल्लेख है, अतः इस अवधि में भी अवकाशयुक्त
युद्ध की धारणा असिद्ध है। अस्तु ! श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में लगातार युद्ध
की सामान्य सिद्धि, श्रीकृष्ण भगवान् के विशेष वचन के बल पर बाधित
होने के योग्य माना जा सकता है। क्योंकि जैसे श्रीकृष्ण भगवान् के उपप्लव्य
से हस्तिनापुर प्रस्थान और पुनः हस्तिनापुर से उपप्लव्य आने तक केवल
तीन दिनों का विवरण प्राप्त है, परन्तु वह सामान्य विवरण प्रयाध्वं वै कुरु-
क्षेत्रं पुष्योद्येति पुनः पुनः' इस श्रीकृष्ण मुख निर्गत दुर्योधन वाक्य से बाधित
हो जाता है, वैसे ही भीष्माचार्य के नेतृत्व में दैनिक युद्ध सम्बन्धी सामान्य
वचन श्रीकृष्ण वचन से बाधित होकर उसका अभिप्राय 'आगामी युद्ध काल
अर्थात् एक दिन अवकाश के बाद' ग्राह्य है।
परन्तु ऐसा मानने पर भी मार्गशीर्ष अमावस्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ नहीं
सिद्ध होता। कदाचित् इस दिन सैन्य शिक्षण और युद्धधर्म मर्यादा निर्धारण
मानें तो भी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को युद्धारम्भ नहीं सिद्ध होता, क्योंकि
ऐसा मानने पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा आर्द्रा में आठवें दिन का युद्ध सिद्ध होगा।
महाभारत के अनुसार उस दिन प्रदोष काल में अन्धकार होना चाहिये—
रजनी मुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये।
अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः॥
न्यविशन्ति यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥
(महा० भीष्म० ९६।८०)
‘फिर महाभयानक तथा अत्यन्त रौद्र रूप वाले प्रदोष काल में कौरव तथा
पाण्डव एक साथ अपनी सेनाओं को लौटाकर यथासमय शिविर में जा पहुँचे
और विश्राम करने लगे ॥'
साथ ही मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया पूर्वाषाढा से युद्धारम्भ मानने पर यद्यपि
आठवें दिन के युद्ध में पौषकृष्ण द्वितीया प्राप्त होती है, परन्तु उस दिन भी
प्रदोष काल में, 'रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये' यह लक्षण आंशिक ही
घटित होता है।

( ६३ )
साथ ही ऐसा मानने पर भी दो तिथियों और नक्षत्र को या तो पौषकृष्ण
को त्रयोदश दिनों का पक्ष मानकर पूर्ण करना होगा अथवा मार्गशीर्ष शुक्ल
चतुर्थी श्रवण से युद्धारम्भ मानकर द्रोणाभिषेक पर्यन्त अवकाश युक्त युद्ध मानना
होगा। मार्गशीर्ष कृष्ण में ही दो तिथियों का क्षय संभव और पौषकृष्ण
में असम्भव सिद्ध होने पर उक्त रीति से श्रवण से श्रवण तक युद्धकाल
मान्य होगा।
परन्तु भीष्म पतन के बाद अवकाश के दिन शरशय्या में सम्मिलित होने
के कारण युद्ध तुल्य सिद्ध होंगे। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी श्रवण में युद्धधर्म
मर्यादा निर्धारण और शुक्ल पञ्चमी धनिष्ठा में गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ
मानना उपयुक्त है। पौषकृष्ण चतुर्थी में आठवें दिन का युद्ध, पौषकृष्ण अष्टमी
चित्रा में भीष्म पतन और उसके पश्चात् पौषशुक्ल प्रतिपदा श्रवण तक अनवरत
युद्ध उपयुक्त परिलक्षित होता है। इस दृष्टि से पौषकृष्ण द्वादशी में जयद्रथ वध
तथा त्रिभागशेष उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय और युद्धारम्भ एवं पौषशुक्ल प्रतिपदा
में युद्धान्त सिद्ध होता है।
इस पक्ष में मार्गशीर्ष अमावास्या ‘ज्येष्ठा’ में स्वस्तिवाचन आदि माङ्गलिक
कृत्य और सीमा निर्धारण आदि तथा मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र से
मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण सिद्ध होता है।
'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्ण चतुर्दशीम्' ( भीष्म० ३।३३ ) इस व्यास
वचन में आसीत् का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी
( अमावास्या ) के बाद श्री व्यास भगवान् ने धृतराष्ट्र को उद्बोधित करते हुए
संजय को दिव्य-दृष्टि प्रदान किया। पुनः—
ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषिः ।
सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवती सुतः ॥
भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामहः ।
प्रत्यक्षदर्शी भगवान् भूतभव्य भविष्यवित् ॥
वैचित्र वीर्यं राजानं सरहस्यं ब्रवीदिदम् ।
शोचन्तमातं ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा ॥
( भीष्म २।१-३ )

( ६४ )
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्ता वेकमासीं त्रयोदशीम् ।
अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ॥
( भीष्म० ३।३३ )
उक्त व्यास वचनों में निर्दिष्ट 'भविष्यति रणे घोरे' तथा 'प्रजा संक्षप-
यिष्यतः' उक्तियों से युद्ध के अनारम्भ की सूचना मिलती है । साथ ही—
पतन्त्युल्काः सनिर्घाताः शक्राशनि समप्रभाः ।
अद्यचैव निशां व्युष्टामनयं समवाप्स्यथ ॥
( भीष्म० ३।३५ )
उक्त वचन से 'रात्रि बीतने पर आज ही' युद्धारम्भ का निर्देश प्राप्त होता
है । इस तथ्य की पुष्टि संजय के निम्नलिखित वचन से भी होती है—
यथा सभगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥
( भीष्म० १७।१ )
उक्त अवकाश युक्त गणना के अनुसार 'चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृत-
स्य वै ।' इस बलदेव वाक्यस्थ बयालीस दिनों की सिद्धि इस प्रकार
सम्भव है—
क्योंकि कार्तिकी पूर्णिमा कृत्तिका या रोहिणी में संभव है । अतः उपप्लव्य
से श्रीहरि का हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कार्तिक शुक्ल द्वादशी को न मानकर
कार्तिक शुक्ल एकादशी रेवती को माना जाय ? इस दृष्टि से कार्तिकी पूर्णिमा
रोहिणी में सिद्ध होगी । अब क्योंकि मार्गशीर्ष कृष्ण में दो तिथियों का क्षय
था, अतः पञ्चमी से पूर्व एक तिथि का क्षय मान कर मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी
पुष्य में भगवान् श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से उपप्लव्य आगमन सिद्ध होता है ।
पुनः रात्रि विश्राम के अनन्तर पञ्चमी और पुष्य के योग में ही श्रीबलदेवजी का
शुभागमन और प्रस्थान एवं तत्पश्चात् कुरुक्षेत्र के लिए सैन्य निर्याण सिद्ध होता
है । अब क्योंकि इस पक्ष में चतुर्दशी को राहु ने अमावास्या बना दिया था,
अतः पञ्चमी के बाद एक तिथि का क्षय मानकर युद्धान्त पौषशुक्ल प्रतिपदा तक

( ६५ )
इकतालीस दिन होते हैं । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल में युद्धारम्भ से पूर्व एक तिथि
की वृद्धि मान लेने पर तिथिक्षय की पूर्ति और श्रीबलदेवजी के अभीष्ट दिनों की
सिद्धि संभव है ।
रही ज्येष्ठा से उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण की प्रामाणिकता की बात !
भीष्म पर्व के आरम्भ में सैन्य मर्यादा निर्धारण का उल्लेख है । परन्तु उस
अध्याय का नाम पुष्पिकानुसार सैन्यशिक्षण है । अतः इससे अनुमान लगाना
चाहिये कि इन चार दिनों में युद्धक्षेत्र निर्धारण, मंगलाचरण और सैन्य शिक्षणादि
कृत्य सम्पन्न हुए । जैसे यज्ञ का पूर्वरूप भी यज्ञारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य है,
वैसे ही युद्धारम्भ का पूर्वरूप भी युद्धारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य ' होना
चाहिये ।
ज्योतिष के अनुसार श्रवण एवं धनिष्ठा ऊर्ध्वमुख नक्षत्र हैं, अतः इनमें
युद्धारम्भ उपयुक्त है—
उत्तरा त्रितयं पुष्यो रोहिण्यार्द्रा श्रुतित्रयम् ।
ऊर्ध्ववक्रोगणो ज्ञेयो नक्षत्राणां मनीषिभिः ॥
प्रासादच्छत्र गेहानि प्राकार ध्वज तोरणम् ।
नानाभिषेकमश्वं च कुर्यादूर्ध्वमुखे गणे ॥
( शीघ्रबोध २।८१-८२ )
'तीनों उत्तरा, पुष्य, रोहिणी, आर्द्रा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिभिषा ये
नक्षत्र पण्डितों को ऊर्ध्वमुख जानना चाहिये । महल, छत्र, घर, परकोटा, ध्वजा
तोरण, अभिषेक और घोड़े आदि की सवारी ऊर्ध्वमुख में उत्तम हैं ॥'
अब विचारणीय विषय यह है कि जैसे मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी
या चतुर्दशी में युद्धारम्भ मानने पर 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र
देवताम्' यह भगवद् वचन बाधित होता है; वैसे ही मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को
युद्धारम्भ मानने पर भी होता है । अतः भीष्मपितामह के नेतृत्वकाल में अव-
काशयुक्त युद्ध मानने की क्या उपयोगिता है, जबकि 'श्वो योत्स्यामः परैः स'
( भीष्मपर्व ६४।७० ) यह भीष्म वचन भी बाधित ही हो रहा है ?
५

( ६६ )
इसका उत्तर यह है कि जैसे आहुति प्रदान रूप मुख्य यज्ञ नवग्रहादि पूजन
रूप कृत्यों का सहिष्णु होता है, वैसे ही अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग रूप मुख्य युद्ध
चार दिनों का अतिरिक्त व्यवधान सह सकता है। क्योंकि युद्ध-मर्यादा रूप
व्यवधान तो व्यास वचन से ही सिद्ध है। शेष व्यवधान 'सैन्य शिक्षण और
स्वस्तिवाचनादि' संकेतों से अनुमेय है।
अवकाश-दिन से पूर्व यदि कार्यालय का कोई अधिकारी सेवकों से कहे—
“अब आज कार्यालय बन्द कर दो, शेष कार्य 'कल' करूँगा" तो उसके इस
वचन का अभिप्राय जैसे एक दिन बाद समझा जायगा, यदि इसी शैली में
भीष्मजी का उक्त सामान्य वचन मान्य हो तब तो यह संगति उपयुक्त है।
अन्यथा भीष्म प्रतिज्ञा की तरह भीष्म-वचन ही पूर्ण सत्य रहने दिया जाय और
अठारह दिन लगातार युद्ध मान कर श्रीनीलकण्ठाचार्य की शैली में श्रीबलभद्र
वाक्य के सर्वंथा अनुगुण श्रवण नक्षत्र और उसके अनुकूल तिथि से सत्रह दिन
पूर्वं मार्गशीर्ष शुक्ल मृगशिरा नक्षत्र में ही युद्धारम्भ उपयुक्त माना जाय ?
रही 'सप्तमाच्चापिदिवसात्' के अनुसार पुष्य के सातवें दिन ज्येष्ठा नक्षत्र
की बात ? तो पहले की तरह 'ज्येष्ठा' को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर तथा मार्गशीर्ष
कृष्ण पञ्चमी से अमावास्या तक एक तिथि एवं उसके अनुगुण एक नक्षत्र का
क्षय मानकर पुष्य से नवें स्थान पर ज्येष्ठा है, अतः 'सप्तमाच्चापि' का 'एक
सप्ताह बाद अर्थात् मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी पुष्य के पश्चात् नवें दिन' ऐसा भावार्थ
ग्रहण करना चाहिये ।
अवकाश-रहित
अब प्रतिदिन लगातार अठारह दिनों तक युद्ध को प्रमाण मानकर मार्ग-
शीर्ष शुक्ल दशमी, द्वादशी या त्रयोदशी तक युद्ध के अनारम्भ की दृष्टि से
विचार प्रारम्भ किया जाता है—
नवीन पञ्चाङ्गों के अनुसार तथा प्रचलित प्रसिद्धि के अनुसार गीता जयन्ती
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को सिद्ध होती है ।
नक्षत्र गणना के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा मृगशिरा या आर्द्रा में संभव है,
अतः शुक्ल एकादशी को अश्विनी और भरणी नक्षत्र होना चाहिये । अश्विनी

( ६७ )

से युद्धारम्भ मानने पर श्रवण तक बाईस दिन होते हैं । कदाचित् पौषकृष्ण में
दो तिथियों का तथा उनके अनुगुण दो नक्षत्रों का क्षय मानें तो भी दो तिथि
और नक्षत्र अवशिष्ट रहते हैं । इसलिये बीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता है, जो
कि अनवकाश वाले पक्ष में सर्वथा अमान्य है ।
कदाचित् अश्विनी में ध्वजारोहण, स्वस्तिवाचन और सैन्य शिक्षण तथा
युद्ध मर्यादा निर्धारणादि मानें और भरणी में ही एकादशी मानकर, इसी दिन
युद्धारम्भ मानें एवं पौष कृष्ण को ही त्रयोदश दिनों का पक्ष मानें तो भी एक
तिथि और नक्षत्र अवशेष रहते हैं, इसलिये उन्नीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता
है । कदाचित् पौष अमावस्या को ही युद्धान्त और श्रवण का योग मानें तो भी
श्रीबलदेव जी के बयालीस दिन न होकर चालीस दिन ही सिद्ध होते हैं ।
अतः पौषकृष्ण को त्रयोदश दिनों का पक्ष और मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से
पौष अमावास्या तक महाभारत युद्धकाल मानना केवल लगातार अठारह दिनों
की प्रसिद्धि को देखते हुए उचित प्रतीत होता है । परन्तु महाभारत में जो
रेवती, पुष्य, अनुराधा, ज्येष्ठा, मघा और श्रवण के रूप में नामोल्लेख पूर्वक
नक्षत्र निर्देश प्राप्त है उसके विरुद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी वाली गणना होने
के कारण आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं ।
इसके अतिरिक्त इस द्वितीय पक्ष की भी श्रीनीलकण्ठाचार्यादि के समय में
प्रसिद्धि नहीं थी, अतः अर्वाचीन प्रसिद्धि ही सिद्ध होती है । अल्प प्रामाणिकता
और अर्वाचीन प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस प्रामाणिकता और पूर्वाचार्यों की अनु-
स्मृति का आलम्बन अधिक उत्कृष्ट होता है ।
हेमन्ते प्रथमे मासे शुक्लपक्षे त्रयोदशी ।
प्रवृत्तं भारतं युद्धं नक्षत्रं यमदैवतम् ॥
(०भारत सावित्री ६४)
"हेमन्त ऋतु के प्रथम मास में शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को यमदैवत नक्षत्र
में भारत युद्ध प्रारम्भ हुआ ।"

( ६८ )
'भारत सावित्री' का यह वचन नक्षत्र गणना की दृष्टि से महाभारत के प्रति-
कूल है। यद्यपि हेमन्त ऋतु का प्रथम मास मार्गशीर्ष होता है। 'शरदन्ते हिमागमे'
( उद्योग० ८३।७ ) इस पूर्वोक्त वचन के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ने शरद्
ऋतु के अन्त और हेमन्त के शुभागमन पर उपप्लव्य से हस्तिनापुर के लिए
प्रस्थान किया था। रेवती नक्षत्र को देखते हुए तथा ज्येष्ठा में मार्गशीर्ष की
अमावास्या को देखते हुए 'कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे' का अर्थ
पूर्वरीत्या मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी सिद्ध होता है। मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष में दो
तिथियों का क्षय सिद्ध होने के कारण कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होने
वाली हेमन्त ऋतु का प्रथम मास शुक्ल त्रयोदशी को पूर्ण होता है। अतः
'हेमन्ते प्रथमे मासे शुक्लपक्षे त्रयोदशी' यह सावित्री-वचन सर्वथा सत्य है।
परन्तु 'प्रवृत्तं भारतं युद्धं नक्षत्रं यम दैवतम्' इस वचन के सम्बन्ध में यह
विचार उपस्थित होता है कि यम देवता सम्बन्धी प्रसिद्ध नक्षत्र भरणी है।
भरणी से श्रवण इक्कीसवें स्थान पर है। इधर भारत सावित्री को मार्गशीर्ष
शुक्ल त्रयोदशी से पौष अमावास्या तक ही युद्ध मान्य है। अस्तु ! अठारह
दिनों का लगातार युद्ध भरणी से प्रारम्भ होने पर मूल नक्षत्र में पूर्ण होना
चाहिये । मूल में पौष अमावास्या मानने पर पुनर्वसु में पौष पूर्णिमा
भी उचित ही है। परन्तु तिथिक्षय अमान्य होने पर तीन नक्षत्रों के
क्षय की कल्पना भी सर्वथा अशक्य है। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी
की तरह ही मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी वाला पक्ष भी महाभारत के विपरीत
सिद्ध होता है।
कहा जा सकता है कि क्योंकि श्रवण से मृगशिरा सत्रहवें स्थान पूर्व है,
अतः यम का अर्थ युग्म करके मृगशिरा को ही यम देवता सम्बन्धी नक्षत्र
मानकर युद्धारम्भ माना जाय। परन्तु ऐसा मानने पर दो विघ्न उपस्थित
होते हैं। प्रथम यह कि मृगशिरा के चन्द्रमा अधिपति हैं। यम से युग्म का
यकार और मकार की दृष्टि से पाठ साम्य होने पर भी यम से चन्द्र का पाठतः
अथवा अर्थतः साम्य नहीं सिद्ध होता । यदि श्रीनीलकण्ठाचार्य के शब्दों में
मृगशिरा का पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध राशिगत दो विभाग कर पूर्वार्द्ध में वृष और

( ६९ )
उत्तरार्द्ध में मिथुन का चन्द्र माना जाय, वृष के शुक्र और मिथुन के बुध
अधिपति होने के कारण आसुर शक्ति की पराजय और देवशक्ति का अभ्युदय
सूचक मृगशिरा में ही युद्धारम्भ माना जाय तो नक्षत्र के अनुगुण चतुर्दशी या
पूर्णिमा तिथि भी मान्य होगी । साथ ही यह प्रश्न उपस्थित होगा कि राशिगत
पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध भेद तो पुनर्वसु आदि नक्षत्रों का भी हो सकता है, फिर
मृगशिरा का ही क्यों माना जाय ? द्वितीय आपत्ति यह है कि स्वयं भारत
सावित्री को भी यमदैवत नक्षत्र—'मृगशिरा' अमान्य है ? 'फाल्गुन्यां निहतो
भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी ।' इस भारत वचन से तो यही सिद्ध होता है कि
फाल्गुनी नक्षत्र में भीष्म पतन हुआ । पूर्वाफाल्गुनी भरणी के बाद ठीक नवें
स्थान पर है । अतः ऐसा तभी संभव है जब भरणी में युद्धारम्भ हो ।
मृगशिरा में युद्धारम्भ मानने पर चित्रा में भीष्म पतन होना चाहिये । अतः
दस दिनों के भीतर ही तीन-तीन नक्षत्रों की हानि सर्वथा असंभव है ।
अस्तु ! युद्धारम्भ के सम्बन्ध में ही नहीं; अभिमन्युवध, जयद्रथवध,
भगदत्तवध, वृषसेनवध सम्बन्धी भारत सावित्री का दिन भी मूल के विरुद्ध
है । महाभारत के अनुसार अभिमन्युवध तेरहवें दिन के युद्ध में होना चाहिये
न कि ग्यारहवें दिन, इसी तरह जयद्रथवध चौदहवें दिन होना चाहिये न कि
बारहवें दिन, इसी प्रकार भगदत्तवध बारहवें दिन होना चाहिये न कि तेरहवें
दिन, वृषसेनवध सत्रहवें दिन होना चाहिये न कि सोलहवें दिन ।
श्रीनीलकण्ठाचार्य
श्री महाभारत के प्रसिद्ध टीकाकार श्रीनीलकण्ठाचार्य के-मत में महाभारत
युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी मृगशिरा में आरम्भ होता है और पौष शुक्ल
प्रतिपदा श्रवण में अन्त होता है । तिथि, नक्षत्र, मास गणना की दृष्टि से यह
पक्ष सर्वोत्तम है ।
यथा स भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥

( ७० )
मघा विषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत ।
दीप्यमानाश्च सम्पेतुर्दिवि सप्तमहाग्रहाः ॥
( भीष्म० १७।१-२ )
यद्यपि प्रथम श्लोक युद्धारम्भ सम्बन्धी है और उससे संलग्न होने के
कारण द्वितीय श्लोक का अर्थ मघा नक्षत्र में युद्धारम्भ व्यक्त होता है । परन्तु
श्रवण से पूर्व तेरहवें स्थान पर मघा होने के कारण मघा से युद्धारम्भ सभी
मतों में अमान्य है । यही कारण है कि श्रीनीलकण्ठाचार्य ने मघा का अभिप्राय
मृगशिरा ग्रहण किया है ।
अथवा 'मघा विषयगः सोमः' का कूटार्थ इस प्रकार ग्राह्य है—
मघा के पाँचवें स्थान पूर्व मृगशिरा है, उसके देवता सोम हैं । अतः सोम
देवता सम्बन्धी नक्षत्र में युद्धारम्भ हुआ । विषय अर्थात् पाँच और विषयगः
अर्थात् पाँचवाँ स्थान ।
अथवा प्रथम श्लोक से इसका सम्बन्ध न माना जाय, क्योंकि आगे के
श्लोक विक्रम ढंग से पृथक्-पृथक् घटनाओं के प्रतिपादक हैं । अतः स्वतन्त्र
रीति से ऐसा मानना उचित है कि पुष्य में कुरुक्षेत्र के लिए चली सेना के
मघा में कुरुक्षेत्र पहुँचने का संकेत ग्रंथकार ने प्रस्तुत श्लोक में प्रदान किया है ।
इस दृष्टि से 'दिवि सप्तमहाग्रहाः' का तात्पर्य यह है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष ही
त्रयोदश दिनो का पक्ष था और उसी में सप्त महाग्रहो का योग भी था ।
श्रीबलराम जी के बयालीस दिनों की पूर्ति मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में युद्धारम्भ
से पूर्व एक तिथि की वृद्धि मानकर सम्भव है ।
युद्धारम्भ में श्रीनीलकण्ठाचार्य को प्रमाण माननेवाले महाराष्ट्र के
भारताचार्य चिन्तामणिराव वैद्य आदि भी हैं ।
ज्योतिर्विद पंडित देवकीनन्दन खंडेवाल लिखित 'महाभारत युद्धकालनिर्णय'
( पृष्ठ ८ ) तथा 'भारतीय काल गणना' ( पृष्ठ १२६ ) में युद्धारम्भ नक्षत्र
भरणी माना है । भारत सावित्री ने भी भरणी में ही युद्धारम्भ माना है ।
श्री अभ्यंकर के अनुसार युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी में प्रारंभ
हुआ । भीष्म पतन कृष्ण ६ हस्त में हुआ, अभिमन्युवध कृष्ण ९ विशाखा में

( ७१ )
हुआ, जयद्रथवध तथा रात्रियुद्ध कृष्ण १० अनुराधा में, द्रोणवध कृष्ण ११
ज्येष्ठा में, कर्णवध कृष्ण १३ पूर्वाषाढ़ा में, शल्यवध कृष्ण १४ उत्तराषाढ़ा में
तथा उसी दिन सायंकाल भीम-दुर्योधन गदायुद्ध हुआ ।
'भारतीय युद्धकाल निर्णय' (मराठी) के लेखक प्रो० र० वि० वैद्य
(१९६४) पुनर्वसु-पुष्य में युद्धारम्भ मानते हैं। इनके अनुसार युद्ध केवल
सोलह दिनों का था। इनका यह भी कहना है कि भीष्म निधन शुक्लपक्ष में
कदापि नहीं हो सकता ।
परन्तु युद्धारम्भ और युद्धान्त में श्रीनीलकण्ठाचार्य का 'स्वमत' ही
प्रामाणिक सिद्ध होता है।
निष्कर्ष
जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्‌अमावास्या भवि-
ष्यति । संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' ( उद्योग० १४२।१८ )
केवल इस वचन को प्रमाण मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ
मानकर अठारहवें दिन महाभारत युद्ध की समाप्ति मानते हैं, उनके मत में एक
तो 'पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः' ( शल्य० ३४।६ ) इस बलदेव-
वाक्य के अनुसार सैन्य निर्याण से युद्ध समाप्ति तक बयालीस दिनों की पूर्ति
नहीं हो पाती, साथ ही श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त नहीं हो पाता और आठवें,
नौवें दिन सन्ध्याकाल में अन्धकार सम्बन्धी संकेत एवं चौदहवें दिन रात्रियुद्ध
के पश्चात् तीन-चार मुहूर्त्त रात्रि शेष रहने पर चन्द्रोदय का स्पष्ट उल्लेख भी
सर्वथा अपूर्ण ही रहता है—
ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् ।
अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥
( द्रोणपर्व १५४।५२ )
त्रिभागमात्र शेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत ।
कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशांपते ॥
( द्रोणपर्व १८६।१ )

३. तृतीय खण्ड: युगाब्द, मन्वन्तर, प्रलय एवं काल मीमांसा उपसंहार

( ७२ )
जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनों के वचन अक्षरशः
सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से मार्गशीर्ष अमावस्या से एक-एक दिन अवकाश
युक्त किन्तु चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानते हुए श्रवण में
युद्धान्त मानते हैं, वे महाभारत के अत्यन्त प्रामाणिक वचनों के सर्वथा विरुद्ध
अवकाश की कल्पना कर वस्तुस्थिति से सुदूर चले जाते हैं ।
इन सब दृष्टियों से श्रीनीलकण्ठाचार्य का मत नक्षत्र गणना, नक्षत्र के
अनुगुण तिथि गणना और युद्धारम्भ एवं युद्धान्त की दृष्टि से सर्वथा निर्दोष
परिलक्षित होता है । अवश्य ही आचार्य ने युद्धारम्भ और युद्धान्त को भारत-
सावित्री के अनुसार और श्रवण में युद्धान्त को महाभारत के अनुसार सिद्ध
करने में समन्वय की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, वह पूर्णरूपेण ग्राह्य नहीं कही
जा सकती ।
गीता जयन्ती जो कि आजकल मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के रूप में
प्रसिद्ध है, इसकी प्रामाणिकता भी श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त को देखते हुए
खण्डित हो जाती है ।
भारत सावित्री के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी यद्यपि युद्धारम्भ की
तिथि सिद्ध होती है, तथापि श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त की दृष्टि से इसकी भी
पूर्ण प्रामाणिकता नहीं सिद्ध होती ।
केवल भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाश और अन्यत्र अनवकाश मानकर
नक्षत्रादि गणना के सर्वथा अनुरूप मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी से युद्धारम्भ वाला
इस ग्रन्थ में निर्दिष्ट पक्ष भी अवकाश-अनवकाश के साङ्कर्य की दृष्टि से सन्दिग्ध
कहा जा सकता है ।
परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि महाभारत युद्ध ऐतिहासिक है, काल्प-
निक नहीं । साथ ही महाभारत के अनुसार सर्वमान्य युद्धकाल प्राप्त होना भी
कठिन है । हाँ इतना ही कहा जा सकता है कि कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष
में युद्धारम्भ हुआ । यह भी कहा जा सकता है कि द्रोण, कर्ण और शल्य के
नेतृत्व काल में अवकाशरहित ही युद्ध हुआ । 'श्वो योत्स्यामः परैः सह'
( भीष्म० ६४।७० ) इस भीष्मवचन के अनुसार यह भी मान्य हो सकता है

कि भीष्म के नेतृत्वकाल में भी लगातार ही युद्ध हुआ । अतः 'सप्तमाच्चापि
दिवसात्' ( उद्योग० १४२।१८ ) इस श्रीकृष्णवचन को इस अर्थ में ग्रहण
करना आवश्यक है कि युद्धारम्भ सम्बन्धी आवश्यक कृत्यों में उक्त समय का
उपयोग हुआ । ऐसा मान लेने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल
एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी में युद्धारम्भ हुआ ।
अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से चतुर्दशी या पूर्णिमा तक गीता जयन्ती
के उपलक्ष में महोत्सव मनाये जायें । समय और धनादि के अभाव में
एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी किसी एक तिथि में अथवा केवल एकादशी
में ही गीता जयन्ती मनाना भी उत्तम है । यद्यपि प्रामाणिक तिथि मार्गशीर्ष
शुक्ल चतुर्दशी ही सिद्ध होती है ।
भीष्म निर्वाण
सौप्तिक संहार के पश्चात् उषःकाल में दुर्योधन के देह त्याग के अनन्तर
संजय हस्तिनापुर गये । पुनः धृतराष्ट्र की प्रेरणा से धर्मराज युधिष्ठिर ने
मृतकों के सामूहिक दाह आदि की व्यवस्था की । उन्होंने जलाञ्जलि के
पश्चात् मासमात्र गंगा तट पर निवास किया—
कृतोदकास्ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः ।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भारतस्त्रियः ॥
तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः ।
शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिःपुरात् ॥
( शान्तिपर्व १।१–२ )
पुनः सभी हस्तिनापुर आये । धर्मराज युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण के
नेतृत्व में राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ । यथायोग्य महलों में पाण्डवों ने निवास
किया ।
पुनः भगवान् श्रीहरि की प्रेरणा से भीष्माचार्य के श्रीमुख से उपदेश
श्रवण की अभिलाषा से धर्मराज निज परिकर सहित पितामह की सेवा में
कुरुक्षेत्र उपस्थित हुए । श्रीभगवान् ने दिव्यशक्ति और दिव्यदृष्टि से देवव्रत

( ७४ )
भीष्मजी को सम्पन्न किया । साथ ही जीवन के शेष दिनों का रहस्योद्घाटन
करते हुए श्रीहरि ने पितामह से कहा—
पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर
शेषं दिनानां तव जीवितस्य ।
ततः शुभैः कर्मफलोदयैस्त्वं
समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ॥
( शान्तिपर्व ५१।१४ )
तत्पश्चात् उसी दिन चन्द्रोदय के दिव्य प्रकाश में सेना सहित पाण्डव
हस्तिनापुर के लिये प्रस्थित हुए—
ततः पुरस्ताद् भगवान् निशाकरः
समुत्थितस्तामभि हर्षयंश्चमम् ।
दिवाकरा पीतरसा महौषधीः
पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ॥
( शान्तिपर्व ५२।३३ )
फिर रात्रि बिता कर उपदेश श्रवण के योग्य परिकर सहित धर्मराज
भगवान् श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में भीष्माचार्य के समीप समुपस्थित हुए । कई
दिनों तक उपदेश हुआ । पुनः भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर से कहा—
आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव ।
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे ॥
( अनुशा० १६६।१४ )
तत्पश्चात् पाण्डव हस्तिनापुर आकर रहने लगे । यथा समय धर्मराज को
भीष्मजी के देह त्याग का स्मरण हो आया । वे सम्बन्धियों सहित पितामह
की सेवा में समुपस्थित हुए—
उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे ।
समयं कौरवाग्रस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥

( ७५ )
स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारितः ।
दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥
( अनुशा० १६७।५-६ )
निज सेवा में समुपस्थित धर्मराज से पितामह ने कहा—
अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः ।
शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ॥
माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर ।
त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥
( अनुशा० १६७।२७-२८ )
‘इन तीखे अग्रभाग वाले बाणों की शय्या पर शयन करते हुए आज
मुझे अट्ठावन दिन हो गये, किन्तु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं ।’
‘युधिष्ठिर ! इस समय सौम्य माघ का महीना प्राप्त है । त्रिभाग शेष है,
यह शुक्ल पक्ष है ।’
अब विचार करना है कि ‘मास मात्र’, ‘पञ्चाशत षट्’, ‘पञ्चाशत्’ और
‘अष्ट पञ्चाशतं’ ये सब “माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिरः । त्रिभाग-
शेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥” इस भीष्मवचन के अनुसार माघ शुक्ल
की सीमा में होने पर ही सार्थक हैं । अतः माघ से आगे इनकी गति अमान्य है ।
इधर ‘पञ्चाशतं’ का प्रसिद्ध अर्थ पचास, ‘पञ्चाशतं षट्’ का छप्पन और
‘अष्टपञ्चाशतं’ का अट्ठावन होता है । ऐसी स्थिति में शरशय्या के तीसरे दिन
ही जब श्रीहरि पितामह से उनके छप्पन दिन शेष की बात कर रहे हों तभी
वाच्यार्थ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण हो सकता है । परन्तु मूल के अनुशीलन से
ही यह सिद्ध होता है कि युद्धान्त तक भीष्मजी के शरशय्या पर कम-से-कम
( बिना अवकाश के ) नौ दिन हुए । पुनः पाण्डवों ने मासमात्र नगर के
बाहर नदी तट पर निवास किया । तत्पश्चात् हस्तिनापुर में श्राद्ध एवं राज्या-
भिषेकादि में व्यतीत हुआ । कुछ दिन यथायोग्य महलों में निवास किया ।
अतः कम-से-कम तीन-चार दिन हस्तिनापुर में व्यतीत हुए । इस तरह

( ७६ )
९ + ३० + ४ = ४३ दिन भीष्माचार्य के पास पहुँचने में लगे । अतः उसके
बाद भीष्मजी के छप्पन दिन शेष मानें तो ४३ + ५६ = ९९ दिन होते हैं ।
इधर माघ की अवधि, उधर पौष में अधिमास असंभव । उत्तरायण की
प्रतीक्षा देखते हुए माघ में अधिमास की कल्पना भी निरर्थक । इन सब
दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है कि 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्',
'पञ्चाशत्' और 'अष्टपञ्चाशतं' सबको माघोऽयं समनुप्राप्तः मासः सौम्यः' के
अनुगुण घटाया जाय ? अथवा 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' का अट्ठावन दिन अर्थ
ग्रहण कर उसी के अनुरूप 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्', 'पञ्चाशतं' और
'त्रिभागशेषः' को लगाया जाय ।
किसी भी दृष्टि से माघ का अतिक्रमण सर्वथा अनुपयुक्त है । अतः माघ
की सीमा में रहते हुए भी उक्त पक्षों पर विचार अपेक्षित है । परन्तु किसी भी
पक्ष को स्वीकार करने से पूर्व भीष्म पतन की प्रामाणिक तिथि प्राप्त होना
परमावश्यक है ।
श्रीकवीश्वर, जो कि चित्रा को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या
से युद्धारम्भ मानते हैं, उनके मत में पौष कृष्ण तृतीया भीष्म पतन की
तिथि है ।
प्रचलित गीता जयन्ती के अनुसार पौषकृष्ण ❀ षष्ठी में भीष्मपतन सिद्ध
होता है । भारत सावित्री के अनुसार पौषकृष्ण सप्तमी में भीष्मपतन सिद्ध
होता है ।
श्रीनीलकण्ठाचार्य के अनुसार गीता जयन्ती मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी
को भीष्मपतन सिद्ध होता है ।
मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी में भीष्म-
पतन सिद्ध होता है । मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से भीष्माचार्य के नेतृत्वकाल
में अवकाश युक्त युद्ध मानने पर पौषकृष्ण तृतीया को शरशय्या का प्रथम दिन
सिद्ध होता है । इस तरह--
♣ त्रयोदश ( तेरह ) दिन का पक्ष

( ७७ )
मार्गशीर्ष अमावस्या को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण तृतीया, मार्गशीर्ष
शुक्ल पञ्चमी में युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण अष्टमी, मार्गशीर्ष शुक्ल
एकादशी को युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण षष्ठी, मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी को
युद्ध मानने पर पौषकृष्ण सप्तमी और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को गीता जयन्ती
मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन सिद्ध होता है ।
परन्तु द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश असम्भव होने के कारण पौषकृष्ण
तृतीया को भीष्मपतन मानने पर चौदहवें दिन का रात्रि युद्ध पौषकृष्ण सप्तमी
को सिद्ध होता है । ऐसा मानने पर उत्तर रात्रि में तीन-चार मुहूर्त रात्रि शेष
रहते चन्द्रोदय वाला निर्देश खण्डित होता है । साथ ही पौषकृष्ण एकादशी को
युद्धान्त सिद्ध होने पर श्रवण नक्षत्र सम्बन्धी वचन भी निष्फल जाता है । अतः
पौष कृष्ण तृतीया को भीष्म पतन मानने वाला पक्ष सर्वथा अमान्य है ।
एकादशी को युद्धारम्भ असम्भव होने के कारण पौष कृष्ण षष्ठी को भीष्म-
पतन वाला पक्ष भी अमान्य सिद्ध होता है ।
एतावता पौषकृष्ण सप्तमी या अष्टमी भीष्मपतन की प्रामाणिक तिथियाँ
हो सकती हैं, यही जयद्रथ वध के बाद उत्तररात्रि में चन्द्रोदय के उपयुक्त
तिथियाँ भी हैं । अतः अब इन्हीं दृष्टियों से भीष्म निर्वाण सम्बन्धी विचार
कर्तव्य है ।* पौष कृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन मानने पर पौष कृष्ण द्वादशी को
रात्रि युद्ध सिद्ध होता है । इस दृष्टि से त्रिभागशेष रात्रि में युद्धारम्भ का अभि-
प्राय चन्द्रोदय सहित युद्धारम्भ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रथम पक्ष—यद्यपि पौष कृष्ण तृतीया से माघी ( माघपूर्णिमा ) तक
भीष्म जी के अट्ठावन दिन पूरे हो जाते हैं । अतः अब विचारणीय पक्ष यह
उपस्थित होता है कि माघ की अन्तिम तिथि पूर्णिमा है, इससे आगे भीष्म
निर्वाण असंभव है । इधर पौष कृष्ण अष्टमी से पूर्णिमा तक कुल तिरपन दिन
होते हैं । ‘अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः’ का प्रसिद्ध अर्थ अट्ठावन है, अतः किस रीति से
तिरपन ही अट्ठावन का रूप धारण कर सकता है ।
* ‘फाल्गुन्यां निहतो भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी’ यह भारत सावित्री का मत
भी युद्धान्त के अनुरूप नक्षत्र न होने के कारण अमान्य है ।