काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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इकतालीस दिन होते हैं । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल में युद्धारम्भ से पूर्व एक तिथि
की वृद्धि मान लेने पर तिथिक्षय की पूर्ति और श्रीबलदेवजी के अभीष्ट दिनों की
सिद्धि संभव है ।
रही ज्येष्ठा से उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण की प्रामाणिकता की बात !
भीष्म पर्व के आरम्भ में सैन्य मर्यादा निर्धारण का उल्लेख है । परन्तु उस
अध्याय का नाम पुष्पिकानुसार सैन्यशिक्षण है । अतः इससे अनुमान लगाना
चाहिये कि इन चार दिनों में युद्धक्षेत्र निर्धारण, मंगलाचरण और सैन्य शिक्षणादि
कृत्य सम्पन्न हुए । जैसे यज्ञ का पूर्वरूप भी यज्ञारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य है,
वैसे ही युद्धारम्भ का पूर्वरूप भी युद्धारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य ' होना
चाहिये ।
ज्योतिष के अनुसार श्रवण एवं धनिष्ठा ऊर्ध्वमुख नक्षत्र हैं, अतः इनमें
युद्धारम्भ उपयुक्त है—
उत्तरा त्रितयं पुष्यो रोहिण्यार्द्रा श्रुतित्रयम् ।
ऊर्ध्ववक्रोगणो ज्ञेयो नक्षत्राणां मनीषिभिः ॥
प्रासादच्छत्र गेहानि प्राकार ध्वज तोरणम् ।
नानाभिषेकमश्वं च कुर्यादूर्ध्वमुखे गणे ॥
( शीघ्रबोध २।८१-८२ )
'तीनों उत्तरा, पुष्य, रोहिणी, आर्द्रा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिभिषा ये
नक्षत्र पण्डितों को ऊर्ध्वमुख जानना चाहिये । महल, छत्र, घर, परकोटा, ध्वजा
तोरण, अभिषेक और घोड़े आदि की सवारी ऊर्ध्वमुख में उत्तम हैं ॥'
अब विचारणीय विषय यह है कि जैसे मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी
या चतुर्दशी में युद्धारम्भ मानने पर 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र
देवताम्' यह भगवद् वचन बाधित होता है; वैसे ही मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को
युद्धारम्भ मानने पर भी होता है । अतः भीष्मपितामह के नेतृत्वकाल में अव-
काशयुक्त युद्ध मानने की क्या उपयोगिता है, जबकि 'श्वो योत्स्यामः परैः स'
( भीष्मपर्व ६४।७० ) यह भीष्म वचन भी बाधित ही हो रहा है ?
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