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सर्वकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

कि भीष्म के नेतृत्वकाल में भी लगातार ही युद्ध हुआ । अतः 'सप्तमाच्चापि
दिवसात्' ( उद्योग० १४२।१८ ) इस श्रीकृष्णवचन को इस अर्थ में ग्रहण
करना आवश्यक है कि युद्धारम्भ सम्बन्धी आवश्यक कृत्यों में उक्त समय का
उपयोग हुआ । ऐसा मान लेने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल
एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी में युद्धारम्भ हुआ ।
अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से चतुर्दशी या पूर्णिमा तक गीता जयन्ती
के उपलक्ष में महोत्सव मनाये जायें । समय और धनादि के अभाव में
एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी किसी एक तिथि में अथवा केवल एकादशी
में ही गीता जयन्ती मनाना भी उत्तम है । यद्यपि प्रामाणिक तिथि मार्गशीर्ष
शुक्ल चतुर्दशी ही सिद्ध होती है ।
भीष्म निर्वाण
सौप्तिक संहार के पश्चात् उषःकाल में दुर्योधन के देह त्याग के अनन्तर
संजय हस्तिनापुर गये । पुनः धृतराष्ट्र की प्रेरणा से धर्मराज युधिष्ठिर ने
मृतकों के सामूहिक दाह आदि की व्यवस्था की । उन्होंने जलाञ्जलि के
पश्चात् मासमात्र गंगा तट पर निवास किया—
कृतोदकास्ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः ।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भारतस्त्रियः ॥
तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः ।
शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिःपुरात् ॥
( शान्तिपर्व १।१–२ )
पुनः सभी हस्तिनापुर आये । धर्मराज युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण के
नेतृत्व में राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ । यथायोग्य महलों में पाण्डवों ने निवास
किया ।
पुनः भगवान् श्रीहरि की प्रेरणा से भीष्माचार्य के श्रीमुख से उपदेश
श्रवण की अभिलाषा से धर्मराज निज परिकर सहित पितामह की सेवा में
कुरुक्षेत्र उपस्थित हुए । श्रीभगवान् ने दिव्यशक्ति और दिव्यदृष्टि से देवव्रत