सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

( ६७ )

से युद्धारम्भ मानने पर श्रवण तक बाईस दिन होते हैं । कदाचित् पौषकृष्ण में
दो तिथियों का तथा उनके अनुगुण दो नक्षत्रों का क्षय मानें तो भी दो तिथि
और नक्षत्र अवशिष्ट रहते हैं । इसलिये बीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता है, जो
कि अनवकाश वाले पक्ष में सर्वथा अमान्य है ।
कदाचित् अश्विनी में ध्वजारोहण, स्वस्तिवाचन और सैन्य शिक्षण तथा
युद्ध मर्यादा निर्धारणादि मानें और भरणी में ही एकादशी मानकर, इसी दिन
युद्धारम्भ मानें एवं पौष कृष्ण को ही त्रयोदश दिनों का पक्ष मानें तो भी एक
तिथि और नक्षत्र अवशेष रहते हैं, इसलिये उन्नीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता
है । कदाचित् पौष अमावस्या को ही युद्धान्त और श्रवण का योग मानें तो भी
श्रीबलदेव जी के बयालीस दिन न होकर चालीस दिन ही सिद्ध होते हैं ।
अतः पौषकृष्ण को त्रयोदश दिनों का पक्ष और मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से
पौष अमावास्या तक महाभारत युद्धकाल मानना केवल लगातार अठारह दिनों
की प्रसिद्धि को देखते हुए उचित प्रतीत होता है । परन्तु महाभारत में जो
रेवती, पुष्य, अनुराधा, ज्येष्ठा, मघा और श्रवण के रूप में नामोल्लेख पूर्वक
नक्षत्र निर्देश प्राप्त है उसके विरुद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी वाली गणना होने
के कारण आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं ।
इसके अतिरिक्त इस द्वितीय पक्ष की भी श्रीनीलकण्ठाचार्यादि के समय में
प्रसिद्धि नहीं थी, अतः अर्वाचीन प्रसिद्धि ही सिद्ध होती है । अल्प प्रामाणिकता
और अर्वाचीन प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस प्रामाणिकता और पूर्वाचार्यों की अनु-
स्मृति का आलम्बन अधिक उत्कृष्ट होता है ।
हेमन्ते प्रथमे मासे शुक्लपक्षे त्रयोदशी ।
प्रवृत्तं भारतं युद्धं नक्षत्रं यमदैवतम् ॥
(०भारत सावित्री ६४)
"हेमन्त ऋतु के प्रथम मास में शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को यमदैवत नक्षत्र
में भारत युद्ध प्रारम्भ हुआ ।"