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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

( ७७ )
मार्गशीर्ष अमावस्या को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण तृतीया, मार्गशीर्ष
शुक्ल पञ्चमी में युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण अष्टमी, मार्गशीर्ष शुक्ल
एकादशी को युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण षष्ठी, मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी को
युद्ध मानने पर पौषकृष्ण सप्तमी और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को गीता जयन्ती
मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन सिद्ध होता है ।
परन्तु द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश असम्भव होने के कारण पौषकृष्ण
तृतीया को भीष्मपतन मानने पर चौदहवें दिन का रात्रि युद्ध पौषकृष्ण सप्तमी
को सिद्ध होता है । ऐसा मानने पर उत्तर रात्रि में तीन-चार मुहूर्त रात्रि शेष
रहते चन्द्रोदय वाला निर्देश खण्डित होता है । साथ ही पौषकृष्ण एकादशी को
युद्धान्त सिद्ध होने पर श्रवण नक्षत्र सम्बन्धी वचन भी निष्फल जाता है । अतः
पौष कृष्ण तृतीया को भीष्म पतन मानने वाला पक्ष सर्वथा अमान्य है ।
एकादशी को युद्धारम्भ असम्भव होने के कारण पौष कृष्ण षष्ठी को भीष्म-
पतन वाला पक्ष भी अमान्य सिद्ध होता है ।
एतावता पौषकृष्ण सप्तमी या अष्टमी भीष्मपतन की प्रामाणिक तिथियाँ
हो सकती हैं, यही जयद्रथ वध के बाद उत्तररात्रि में चन्द्रोदय के उपयुक्त
तिथियाँ भी हैं । अतः अब इन्हीं दृष्टियों से भीष्म निर्वाण सम्बन्धी विचार
कर्तव्य है ।* पौष कृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन मानने पर पौष कृष्ण द्वादशी को
रात्रि युद्ध सिद्ध होता है । इस दृष्टि से त्रिभागशेष रात्रि में युद्धारम्भ का अभि-
प्राय चन्द्रोदय सहित युद्धारम्भ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रथम पक्ष—यद्यपि पौष कृष्ण तृतीया से माघी ( माघपूर्णिमा ) तक
भीष्म जी के अट्ठावन दिन पूरे हो जाते हैं । अतः अब विचारणीय पक्ष यह
उपस्थित होता है कि माघ की अन्तिम तिथि पूर्णिमा है, इससे आगे भीष्म
निर्वाण असंभव है । इधर पौष कृष्ण अष्टमी से पूर्णिमा तक कुल तिरपन दिन
होते हैं । ‘अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः’ का प्रसिद्ध अर्थ अट्ठावन है, अतः किस रीति से
तिरपन ही अट्ठावन का रूप धारण कर सकता है ।
* ‘फाल्गुन्यां निहतो भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी’ यह भारत सावित्री का मत
भी युद्धान्त के अनुरूप नक्षत्र न होने के कारण अमान्य है ।