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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

( ७० )
मघा विषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत ।
दीप्यमानाश्च सम्पेतुर्दिवि सप्तमहाग्रहाः ॥
( भीष्म० १७।१-२ )
यद्यपि प्रथम श्लोक युद्धारम्भ सम्बन्धी है और उससे संलग्न होने के
कारण द्वितीय श्लोक का अर्थ मघा नक्षत्र में युद्धारम्भ व्यक्त होता है । परन्तु
श्रवण से पूर्व तेरहवें स्थान पर मघा होने के कारण मघा से युद्धारम्भ सभी
मतों में अमान्य है । यही कारण है कि श्रीनीलकण्ठाचार्य ने मघा का अभिप्राय
मृगशिरा ग्रहण किया है ।
अथवा 'मघा विषयगः सोमः' का कूटार्थ इस प्रकार ग्राह्य है—
मघा के पाँचवें स्थान पूर्व मृगशिरा है, उसके देवता सोम हैं । अतः सोम
देवता सम्बन्धी नक्षत्र में युद्धारम्भ हुआ । विषय अर्थात् पाँच और विषयगः
अर्थात् पाँचवाँ स्थान ।
अथवा प्रथम श्लोक से इसका सम्बन्ध न माना जाय, क्योंकि आगे के
श्लोक विक्रम ढंग से पृथक्-पृथक् घटनाओं के प्रतिपादक हैं । अतः स्वतन्त्र
रीति से ऐसा मानना उचित है कि पुष्य में कुरुक्षेत्र के लिए चली सेना के
मघा में कुरुक्षेत्र पहुँचने का संकेत ग्रंथकार ने प्रस्तुत श्लोक में प्रदान किया है ।
इस दृष्टि से 'दिवि सप्तमहाग्रहाः' का तात्पर्य यह है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष ही
त्रयोदश दिनो का पक्ष था और उसी में सप्त महाग्रहो का योग भी था ।
श्रीबलराम जी के बयालीस दिनों की पूर्ति मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में युद्धारम्भ
से पूर्व एक तिथि की वृद्धि मानकर सम्भव है ।
युद्धारम्भ में श्रीनीलकण्ठाचार्य को प्रमाण माननेवाले महाराष्ट्र के
भारताचार्य चिन्तामणिराव वैद्य आदि भी हैं ।
ज्योतिर्विद पंडित देवकीनन्दन खंडेवाल लिखित 'महाभारत युद्धकालनिर्णय'
( पृष्ठ ८ ) तथा 'भारतीय काल गणना' ( पृष्ठ १२६ ) में युद्धारम्भ नक्षत्र
भरणी माना है । भारत सावित्री ने भी भरणी में ही युद्धारम्भ माना है ।
श्री अभ्यंकर के अनुसार युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी में प्रारंभ
हुआ । भीष्म पतन कृष्ण ६ हस्त में हुआ, अभिमन्युवध कृष्ण ९ विशाखा में