काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७४ )
भीष्मजी को सम्पन्न किया । साथ ही जीवन के शेष दिनों का रहस्योद्घाटन
करते हुए श्रीहरि ने पितामह से कहा—
पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर
शेषं दिनानां तव जीवितस्य ।
ततः शुभैः कर्मफलोदयैस्त्वं
समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ॥
( शान्तिपर्व ५१।१४ )
तत्पश्चात् उसी दिन चन्द्रोदय के दिव्य प्रकाश में सेना सहित पाण्डव
हस्तिनापुर के लिये प्रस्थित हुए—
ततः पुरस्ताद् भगवान् निशाकरः
समुत्थितस्तामभि हर्षयंश्चमम् ।
दिवाकरा पीतरसा महौषधीः
पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ॥
( शान्तिपर्व ५२।३३ )
फिर रात्रि बिता कर उपदेश श्रवण के योग्य परिकर सहित धर्मराज
भगवान् श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में भीष्माचार्य के समीप समुपस्थित हुए । कई
दिनों तक उपदेश हुआ । पुनः भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर से कहा—
आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव ।
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे ॥
( अनुशा० १६६।१४ )
तत्पश्चात् पाण्डव हस्तिनापुर आकर रहने लगे । यथा समय धर्मराज को
भीष्मजी के देह त्याग का स्मरण हो आया । वे सम्बन्धियों सहित पितामह
की सेवा में समुपस्थित हुए—
उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे ।
समयं कौरवाग्रस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥