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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

( ६४ )
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्ता वेकमासीं त्रयोदशीम् ।
अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ॥
( भीष्म० ३।३३ )
उक्त व्यास वचनों में निर्दिष्ट 'भविष्यति रणे घोरे' तथा 'प्रजा संक्षप-
यिष्यतः' उक्तियों से युद्ध के अनारम्भ की सूचना मिलती है । साथ ही—
पतन्त्युल्काः सनिर्घाताः शक्राशनि समप्रभाः ।
अद्यचैव निशां व्युष्टामनयं समवाप्स्यथ ॥
( भीष्म० ३।३५ )
उक्त वचन से 'रात्रि बीतने पर आज ही' युद्धारम्भ का निर्देश प्राप्त होता
है । इस तथ्य की पुष्टि संजय के निम्नलिखित वचन से भी होती है—
यथा सभगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥
( भीष्म० १७।१ )
उक्त अवकाश युक्त गणना के अनुसार 'चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृत-
स्य वै ।' इस बलदेव वाक्यस्थ बयालीस दिनों की सिद्धि इस प्रकार
सम्भव है—
क्योंकि कार्तिकी पूर्णिमा कृत्तिका या रोहिणी में संभव है । अतः उपप्लव्य
से श्रीहरि का हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कार्तिक शुक्ल द्वादशी को न मानकर
कार्तिक शुक्ल एकादशी रेवती को माना जाय ? इस दृष्टि से कार्तिकी पूर्णिमा
रोहिणी में सिद्ध होगी । अब क्योंकि मार्गशीर्ष कृष्ण में दो तिथियों का क्षय
था, अतः पञ्चमी से पूर्व एक तिथि का क्षय मान कर मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी
पुष्य में भगवान् श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से उपप्लव्य आगमन सिद्ध होता है ।
पुनः रात्रि विश्राम के अनन्तर पञ्चमी और पुष्य के योग में ही श्रीबलदेवजी का
शुभागमन और प्रस्थान एवं तत्पश्चात् कुरुक्षेत्र के लिए सैन्य निर्याण सिद्ध होता
है । अब क्योंकि इस पक्ष में चतुर्दशी को राहु ने अमावास्या बना दिया था,
अतः पञ्चमी के बाद एक तिथि का क्षय मानकर युद्धान्त पौषशुक्ल प्रतिपदा तक