इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
सोलाह कला
के शरीर की त्वचा पर अजगर सर्प की त्वचा के समान चिन्ह थे। वह सोचने लगा बच्चे की त्वचा पर यह चिन्ह क्यों बने? कई से चर्चा की, परन्तु कोई समाधान नहीं मिला। चर्चा होने पर पता चला कि टूक डाइवर एक बार टूक लिये जा रहा था, रास्ते में सड़क पर एक अजगर सर्प निकला जा रहा था, बहुत लम्बा था, उसकी चाल भी बहुत मन्द थी, देरी हो जाने के कारण उसे टूक से कुचलता हुआ चला गया। उससे जानकारी मिली कि उसने एक दिन रतिक्रिया समय पत्नी को यह घटना सुनाई थी, और उसी समय गर्भ भी स्थापित हो गया था। समाधान स्पष्ट है, रतिक्रिया समय की भावना के अनुरूप बच्चे की त्वचा पर अजगर सर्प की त्वचा के चिन्ह बन गये।
रति समय पर जो भावना, विचार मुख पर अथवा मन में होते हैं और उसक समय गर्भ स्थित हो जाये तो वह भावना और विचार बच्चे में प्रवेश हो जाते हैं। इसलिये गर्भावस्था के समय विचारों का शुद्ध और संयत होना अतिआवश्यक है।
★★★
पुरुष और नारी का अन्तर
परमात्मा ने पुरुष और नारी के समस्त अवयव समान रूप से ही बनाये हैं। किसी में कोई अन्तर नहीं। जिस प्रकार पुरुष के पास अण्डकोष और शिश्न होते हैं, उसी प्रकार नारी के पास भी अण्डकोष और शिश्न होते हैं। केवल अन्तर इतना ही है कि पुरुष के अण्डकोष और शिश्न बाहर होते हैं और नारी के अण्डकोष और शिश्न अन्दर होते हैं। उनके बाहर और अन्दर होने से ही लिंग भेद बनता है। इसी अन्तर के कारण दोनों के स्वभाव, क्रिया, उत्तरदायित्व और कार्यक्षेत्र भी बदल जाते हैं। यहाँ तक ही नहीं स्वरूप में भी अन्तर आ जाता है।
उच्चानुसार प्रकाशित। Digitized by eGangotri Collection. Digitized by eGangotri Collection. Digitized by eGangotri Collection. Digitized by eGangotri Collection.
अण्डकोष और शिशन बाहर होने पर इसकी संज्ञा पुरुष बन जाती है और पुरुष में पुरुषार्थ, उद्यमी, कठोर परिश्रम में भी लग जाना, आवाज में भी कड़कपन और दाड़ी-मूछों का निकलना आदि लक्षण पुरुष के बन जाते हैं।
अण्डकोष और शिशन अन्दर होने पर इसकी संज्ञा नारी बन जाती है और नारी में सौन्दर्य, कोमलता, आकर्षण, शीलता, लज्जा, मधुर कण्ठ और दाड़ी-मूछ का न होना, कमर का पतलापन और सीने पर उधार आदि लक्षण नारी के बन जाते हैं।
सूर्य गुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन बाहर होते हैं और चन्द्रगुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन अन्दर रहते हैं।
गर्भावस्था में ही समस्त अंगों का निर्माण होता है। यह निर्माण कार्य ६५-७० दिन में पूर्ण हो जाता है। सबसे अन्त में लिंग अर्थात् अण्डकोष और शिशन का निर्माण होता है। यह निर्माण १० दिन में आकर परिपूर्ण होकर परिपक्व भी हो जाता है। अर्थात् उस अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसका प्रयोजन स्पष्ट है कि यदि ८० दिन के पास गर्भणी को सूर्य गुण की अधिकता से परिपूर्ण कर दिया जाये तो अण्डकोष और शिशन अन्दर ही न रुककर बाहर आ जाते हैं।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
१२५
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
सोलह कला
रात्री चतुर्थ्यां पुत्रभ्यात् अल्पायुर्धन वंजिताः।
पंचम्यां पुत्रिणी नारी बाढ्यां पुत्रस्तु मध्यमः॥
सप्तम्याम् प्रजायोषिदष्टम्यां मीश्वरः सुतः।
नवम्यां शुभगानारी दशम्यां चतुरः पुमान्॥
एकादश्यामधर्मास्त्री द्वादश्यां पुरुषोत्तमः।
त्रयोदश्यां सुतातस्यवर्ण संकर करिणी॥
धर्माश्वचकृतशश्च आत्मवेदीदृढाव्रतः।
प्रजापतये चतुर्दश्यां गुणी वैजंगतीपतिः॥
रजपत्नीमहाभागराजवंशगता तथा।
जायते पंचदश्यात् बहुपुत्रापतिव्रता॥
विद्यालक्षण सम्पूर्ण सत्यवादी जितेन्द्रियः।
आश्रायः सर्वभूतानां षोडश्यां जायते पुमान्॥
व्यासः
अर्थ- चौथी रात्रि का गर्भ अल्पायु और दरिद्री पुत्र का देने वाला है।
पौर्चर्यां रात्रि में कन्या पुत्र वाली।
छठी रात्रि में पुत्र मध्यमायु वाला।
सातवीं रात्रि में कन्या बन्ध्या।
आठवीं रात्रि में पुत्र ऐश्वर्यशाली।
नवमीं रात्रि में कन्या ऐश्वर्यशालिनी।
दसवीं रात्रि में चतुर बालक।
ग्यारहवीं रात्रि में दुश्चरित्र कन्या।
बारहवीं रात्रि में पुरुषोत्तम पुत्र।
तेरहवीं रात्रि में वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न करने वाली कन्या।
इच्छानुसार सन्तान
१२६
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri