इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार
अर्थ- मंथुन के समय स्त्री पुरुष का चित्त एकाग्रित हो जाना ही काम की सफलता है, यदि उस समय दोनों का चित्त दो स्थानों पर रहा तो समागम में आनन्द नहीं आता।
महाभारत आदिपर्व की गाथा- जिस समय राजा शान्तनु के दोनों पुत्र चित्रवीर्य युवाकाल में और विचित्रवीर्य युद्ध में मारे गये। उस समय रानी सत्यवती को चिन्ता हुई कि वंश वृद्ध कैसे हो, तब उसने नियोग के लिए व्यास जी को बुला कर सन्तान लाभ के लिये प्रार्थना की जिस व्यास जी ने स्वीकार कर लिया। सत्यवती ने सुसज्जित कमरे में घृत का दीपक जलाकर उस कमरे को अम्बिका के लिये नियुक्त किया। जब उस कमरे में व्यास जी ने प्रवेश किया तो अम्बिका ने डर कर ओँखें बन्द कर लीं, व्यास जी ने माता का प्रिय साधने के लिये उसके साथ समागम किया परन्तु काशीराज की कन्या ने भय से उनकी ओर न देखा, अन्तः व्यास जी के घर से निकलने पर उनकी माता ने उनसे पूछा कि बेटा क्या इस वधु से गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा? इन्द्रियों के अतीत ज्ञानी सत्यवती के पुत्र व्यास जी ने माता की यह बात सुनकर कहा कि विधि पूर्वक जन्म लिया हुआ गर्भ में यह बालक सहस्र हाथियों के समान बलवान, विद्वान, राजर्षियों में श्रेष्ठ महाभाग, महावीर्यवान अति बुद्धिमान होगा, और वह महात्मा पुत्र उत्पन्न करेगा परन्तु माता दोष के कारण अन्धा होगा। पुत्र की यह बात सुनकर माता ने कहा कि हे तपोवन! अन्धा पुरुष कुल के योग्य भूषण नहीं हो सकता, इसलिए जाति कुल का रक्षक पितरों का वंश रखने वाला और कुरुवंश का राजा होने योग्य एक पुत्र और उत्पन्न करो। महायशस्वी व्यास जी इसे स्वीकार करके चले गये। समय आने पर अम्बिका ने ऋषि के वचनानुसार एक अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ देवी सत्यवती ने पहले की तरह पुत्र वधु की आज्ञा लेकर फिर ऋषि को बुलाया। महर्षि विधि के अनुसार अम्बालिका के पास आये। अम्बालिका उस ऋषि को देख कर पीली पड़ गई।
इच्छानुसार सन्तान १३९ वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
सत्यवती को पुत्र व्यास ने उसको डरी हुई दुःखित और पीली देखकर कहा कि तुम मुझ को कुरूप देखकर पीली हो गयीं इसलिए तुम्हारा पुत्र भी पीला होगा वह पीला अर्थात् पांडु नाम से प्रसिद्ध होगा। ऋषि यह बात कहकर घर से निकलने पर सत्यवती ने उनसे सन्तान की बात पूछी और व्यास जी ने माता से कहा कि पुत्र पीला होगा। सत्यवती ने यह सुन कर फिर उनसे एक पुत्र की और प्रार्थना की, महर्षि ने वह भी स्वीकार करली। समय आने पर देवी अम्बालिक ने सुन्दर पांडु वर्ण एक कुमार उत्पन्न किया। फिर बड़ी वधु का ऋतुकाल आने पर सत्यवती ने उसको राजर्षि के लिए नियुक्त किया। परन्तु उसने ऋषि शरीर की दुर्गन्ध स्मरण कर उसका कहना नहीं माना और देव कन्या रूपी उस काशीराज पुत्री ने अप्सरा समान एक दासी को अपने आभूषणों से अलंकृत कर व्यास जी के पास भेज दिया। ऋषि के आने पर दासी ने उठकर उनको नमस्ते की और ऋषि की आज्ञानुसार काम किया। व्रतशील महर्षि उसके पास रहकर अति प्रसन्न हुए और ज्ञाते हुए कहा कि तुम्हारा दासीपन जाता रहेगा। तुम्हारे गर्भ में स्थित सन्तान धर्मात्मा और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगी, व्यास जी के वीर्य से और उसके गर्भ से धृतराष्ट्र और पांडु के भाई विदुर ने जन्म लिया।
समागम समय आँखें मीचने पर धृतराष्ट्र अन्धे का जन्म हुआ। भय के कारण शरीर पीला पड़ जाने से पांडु (पीलिया रोगी) पुत्र जन्मा और निर्भय, प्रीतियुक्त, प्रसन्न चित्त और शान्ति पूर्वक विचारों से धर्मात्मा, नीतिज्ञ दूरदर्शी विद्वान विदुर ने जन्म लिया।
इसलिए समागम समय उत्तम सन्तान की इच्छा के लिए दम्पति को प्रसन्न चित्त, आनन्दमय, प्रीतियुक्त वातावरण में ही समागम करना उपयुक्त है, विपरीत दशा में नहीं। ऋतु काल में धर्म से गमन करने से सन्तान सौ और इससे भी अधिक वर्ष की आयुँ मोगती है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri