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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

प्रातः काल

प्रातःकाल

उठो देव गण! जागो, सुन्दर प्रभात-वेला आई।
निशा-देवी गृह को चली, उषा अरुणिमा नभ छाई॥
नव जीवन की आभा फैली, हुआ प्रकृति का नव श्रृंगार।
दिव्य ज्योति का उदय हुआ, फिर चमक उठा सारा संसार॥

देखो कितना सुन्दर और सुहावना समय है। इस समय को अमृतवेला कहा जाता है। इस समय प्रकृति कितनी शान्त और सुहावनी होती है। इस शान्ति और सुहावनेपन को यदि हम अपने हृदय में पान कर लें तो अमृतमय हो सकते हैं। यह तो है ही कि इस सुन्दर अमृतवेला में जो संस्कार हम अपने में डालेंगे, वे हमारे अन्दर अमर हो सकते हैं, स्थायी हो सकते हैं।

ब्राह्मो मुहूर्त उत्तिष्ठे ज्जीर्णाजीर्ण।

निरुपयन् रक्षार्थ मायुषः स्वस्थ्योः॥

अर्थ- रात्रि के अन्त और सूर्योदय के एक घण्टा पूर्व समय को ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं। जिस समय मूर्गा बींग (ध्वनि) देता है वही उठने का समय है मूर्गा प्राकृतिक बिगुल, भौंपु, घड़ी का एलार्म है जो ब्राह्ममुहूर्त के समय बोलता है। उसी समय उठकर अंग के जीर्ण-अजीर्ण का ज्ञान करना चाहिए और अजीर्ण मालूम पड़े तो न उठना चाहिए, और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ा लेना चाहिए। अभ्यास से कष्ट नहीं होता। निद्रा त्यागते (चारपाई से उठते) ही पारब्रह्म परमेश्वर का ध्यान करके शय्या से उठो। प्रातः काल वेद मंत्रों का उत्तम रीति से सानन्द पाठ व उच्चारण करने से आत्मा उत्साहित होकर मानसिक दुर्भाव रूपी शत्रुओं का नाश होता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

ब्रह्ममुहूर्त में पढ़ने योग्य मंत्र पाठ।

ओं प्रातरर्गिन प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्भिन्नावरुणा प्रातरशिवना।

प्राभर्गं पृषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातस्सो ममृत रुद्रं हुवेम॥१॥

ओं प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेतो विधत्ता।

आध्रशिचर्घं मन्य मानस्तुरिचिद्राजा विघ्नां भगं भस्तीत्याह॥२॥

ओं भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगो धियमुदवा ददन्तः।

भगप्रणो जनय गोभिर्शर्वैर्भग प्र नृभिनृं वन्तः स्याम॥३॥

ओं उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्त्व उत मध्ये अहहनाम्।

उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमती स्याम॥४॥

ओं भग एव भगवीं अस्तु देवास्तेनवयं भगवन्तः स्याम।

तं त्वा भग सर्वं इज्जोहवीति स नो भग पुरएताः

ब्रह्मवेद ७/४१/१ से ५ तक

अर्थ- हे स्त्री पुरुषों! जैसे हम विद्वान् उपदेशक लोग प्रभातवेला में स्वप्रकाशस्वरूप परम ऐश्वर्य के दाता और परमेश्वर्ययुक्त, प्राण उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान सूर्य, चन्द्र को जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और भजनीय, सेवनीय, ऐश्वर्य युक्त, पुष्टिकर्ता, अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन हारे, अन्तर्धानी प्रेरक और पापियों को रलाने हारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की स्तुति प्रार्थना करते हैं, वैसे तुम लोग भी किया करो॥१॥

प्रातः पाँच घड़ी रात्रि रहे, जयशील ऐश्वर्य के दाता, तेजस्वी, अन्तरिक्षस्य सूर्य की उत्पत्ति करने हारे और जो कि सूर्यादि लोकों का विशेष करके धारण कर्ता, सब का जानने हारा, दुष्टों का भी दण्डदाता और सबका प्रकाशक है- उस भजनीय स्वरूप को इस प्रकार सेवन करता है और भगवान् परमेश्वर भी इसी प्रकार सबको उपदेश करता है कि 'जो मैं सूर्यादि जगत् को बनाने और धारण करने हारा हूँ, उस मेरी आज्ञा में तुम चला करो'॥२॥

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हं भजनीय स्वरूप! सबके उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक, ऐश्वर्यदाता! हमें प्रज्ञा दीजिए और अपने दान पर हमारी रक्षा कीजिए! आप, घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को हमारे लिए प्रकट कीजिए। आपकी कृपा से हम लोग उत्तम मनुष्यों के सहयोग से बहुत वीर मनुष्य होंगे।॥३॥

हे भगवान्! आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इस समय प्रकर्षता तथा उत्तमता की प्राप्ति में और इन दिनों के मध्य में ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान होंगे। और हे परमपूजित! असंख्य धन देने हारे! सूर्य लोक के उदय में पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप लोगों की अच्छी उत्तम प्रज्ञा और सुमति में हम लोग सदा प्रवृत्त रहें।॥४॥

हे सकलेश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर! जिससे आपकी सब सज्जन निश्चय करके प्रशंसा करते हैं वह आप, हे ऐश्वर्यप्रद! इस संसार और हमारे गृहस्थाश्रम में अग्रगामी और आगे सत्य कर्मों में बढ़ने हारे हजिए और जिससे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे पूजनीय देव होंगे, इसी हेतु से हम विद्वान लोग सकलैश्वर्य सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन, धन से प्रवृत्त हों।॥५॥

ब्रह्ममुहूर्त में उठने के सम्बन्ध में एक पश्चिमी कहावत सत्य है। 'अरलि टु बैड एण्ड अरलि टु राइज, इज द वे टु वि हैलिड वैलिड एण्ड वाइज'। अर्थात् सवारी सोना और सवारी जागना स्वास्थ्‍य ऐश्वर्य और धन की वृद्धि के लिए उत्तम है। वैद्य भी कहते हैं कि दिन को अधिक सोये रहने तथा रात्रि को अधिक जागे रहने का क्रम मत डालो इससे स्वास्थ्‍य और धन का नाश होता है।

जिस समय श्री रामचन्द्र जी वन यात्रा को जा रहे थे। और पहला विश्राम पंचवटी में किया। उस समय जब भरत जी उनसे मिलने को गये तब उन्होंने श्री रामचन्द्र जी से कहा भ्राताजी

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri