इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
मलमूत्र त्याग
अर्थ- आठ चुल्हू जल प्रातःकाल पीने से अर्श, शोथ, संग्रहणी, उदर रोग, बुढ़ापा, कूष्ठ, मेदरोग मूत्रधात, रक्तपित्त, कान रोग, सिर शूल, नेत्ररोग, वात, पित्त, कफ, रक्त से उत्पन्न होने वाले रोग नष्ट होकर सौ वर्ष की आयु सुखपूर्वक व्यतीत होती है।
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मल मूत्र त्याग
मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदक्ष मुखः।
दक्षिणाभिमुखो रात्रौसन्ध्ययोश्चयथा दिवा॥
मनु४/५०
अर्थ- दिन और दोनों संध्याओं में उत्तर दिशा की ओर मुख करके और रात्रि को दक्षिण दिशा को मुख करके, मल, मूत्र त्याग किया करें।
मूत्रं नोत्तिष्ठिता कार्यम्।
अर्थ- (महाभारत अनुशासन पर्व १०४) खड़े होकर पेशाब नहीं करना चाहिये, यह अमंगलकारी और अलक्ष्मी दायक है। कालान्तर में पक्षाघात, हृदय रोग, आंत का उत्तरना, राशा जैसे भयंकर रोगों का हो जाना सम्भव है।
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं च प्रतिसोमोदकद्विजान्।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रशा नश्यति मेहतः॥
मनु४/५२
अर्थ- अग्नि, सूर्य, चन्द्र, जल ब्राह्मण, गौ और वायु इनके सम्मुख मूत्र करने वाले की बुद्धि नष्ट होती है।
मल-मूत्र त्यागते समय उपरोक्त बातों का ध्यान रखना और उस समय बातें न करना किसी भी कार्य को न सोचना, परन्तु यह ध्यान करना उचित है कि मल का विसर्जन ठीक प्रकार हो रहा है और पेट शुद्ध हो गया। सबसे बढ़कर मनुष्य शरीर को हानि
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वीरेन्द्र गुप्ता
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पहूँचाने वाले जितने विष शरीर में पैदा होते हैं उनमें सबसे अधिक विष विषावरोग (मल वेग के रोकने) से होता है। मल जब तक पूर्ण रूप से साफ होता रहता है तो मनुष्य सतेज और स्फूर्तियुक्त रहता है। जहाँ मल रुका सोई अन्य व्याधियाँ हुई कि मानव शरीर निस्तेज हो अनेक रोग जाल में फँस जाता है। किसी ने सत्य कहा है— प्रतिदिन दस्त साफ हो और खुलकर भूख लगे, इससे बढ़कर और क्या स्वस्थता होती है। मल त्याग की इच्छा होते ही मल का त्याग करना चाहिए, उस समय को किसी भी कार्य में न टालना चाहिए। जब शरीर में मल रुक जाता है तो वायु दूषित होती है जो पेट से न निकल कर पेट में ही भरने लगती है जिससे आध्यान होता है और हृदय पर दबाव पड़ता है। जिससे प्रतिशय्य अस्थि शोथादि होते हैं। उदरस्थ मल सूखकर पत्थर के समान कठोर हो जाता है जो सुगमता से फिर बाहर नहीं आ सकता। अर्श और उदर में भारीपन होकर अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। थोड़ी गर्मी और सर्दी सहन नहीं होती, सदा सिर में दर्द रहता है, इसका प्रभाव शनैः शनैः मन पर होने लगता है। थोड़ा-सा परिश्रम भी अधिक भार रूप अनुभव होता है। मन हर समय शोक और चिन्तित रहता है आनन्द एकदम विलीन हो जाता है, धीरे-धीरे रक्त और त्वचा भी दूषित होने लगती है। यह सब उपद्रव तभी होते हैं जब द्तिहित संयोग विरुद्ध पदार्थों का सेवन किया जाय और समय पर शौच के लिए न जाया जाय और मल वेग को रोक कर अन्य कार्य में लग जाय। शौच का समय निश्चित कर लें। उस समय इच्छा हो या न हो शौच अवश्य ही जाना चाहिए जिससे आँतों को अश्यास पड़ जाये। पेट में विबन्ध (कब्ज) हो जाने पर भोजनोपरान्त दोनों समय दो नग अजीर और सात नग मुनक्का खाना चाहिए। इससे भोजन शीघ्र पचता है और पेट का मल भी साफ होकर शरीर हल्का रहता है।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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