इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
वीर्य
काम की इच्छा करता है और उपस्थेन्द्रियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।
इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।
वीर्य
वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्न पूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।
ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
सिद्धे विन्दो महा यत्ने।
किं न सिध्यति भूतले॥
अर्थ- जिसने वीर्य विन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायीं ओर अग्नि रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।
सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दीर्घों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु र्वींस द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य को द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।
एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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काम की इच्छा करता है और उपरस्थितियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।
इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।
★★★
वीर्य
वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्नपूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।
ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
सिद्धे विन्दो महा यत्ने।
किं न सिध्यति भूतले॥
अर्थ- जिसने वीर्य बिन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके
इच्छानुसार सन्तान
६७
वीरेन्द्र गुप्तः
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लिपि पृथ्वी पर कोई ऐसा कार्य नहीं जिसे सिद्ध न कर सकें।
यही अकाल मृत्यु को विजय करता है। ब्रह्मचर्य पालन ही आयु बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है। यही मनुष्य को अमर बना देता है इसी को बल प्रताप से असम्भव बातें भी सम्भव दीख पड़ने लगती हैं। भीष्म पितामह ने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा को अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल से पूर्ण किया जो संसार में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। अंजनी सुत अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान ने अकेले ही सारी लंका को योद्धाओं के छवकें छुड़ा दिये और अन्त में सारी लंका को अग्नि के अर्पण करके माता जानकी की सुध ले वापिस लौटकर श्रीरामचन्द्र जी को समाचार दिया। आप इन घटनाओं को त्रेता और द्वापर की कहकर छोड़ देंगे, तो आप कलयुग की उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारक ऋषि दयानन्द सरस्वती को ही ले लीजिये यह उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल तथा तेज का ही कारण है कि आज भारतवर्ष की काया ही पलटी दीखती है। सन् १८५७ की राज्य क्रान्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता का शब्द लुप्त हो गया था उस समय स्वतन्त्रता शब्द को मुख से निकालना मानों मृत्यु को आमंत्रित करना था परन्तु ऐसे भयंकर समय में जबकि भारत पर पश्चिमी शासकों का पूरा दमन चक्र चल रहा था और भारतीय जनता को खटमल और चींटी के समान मसला जा रहा था, जिसके फलस्वरूप भारतवासी अपने शब्दकोष से स्वतंत्रता शब्द को निकाल चुके थे, क्योंकि स्वतंत्रता के शब्द को उच्चारित करने वाले को गोली लगा दी जाती थी। ऐसे भयंकर समय में और यह जानते हुए भी, इस समय भारत में मेरे विचारों जैसा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं है। तिस पर भी एक अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य बल के प्रताप और ईश्वर की अपने ऊपर छाया के ही सहारे निर्भय निःसंकोच और स्वाभिमान के साथ कलकत्ते के भरे दरबार में वायसराय के सामने ऋषि दयानन्द सरस्वती ने गरज कर कहा कि अपने राज्य में चाहे सूखे चने ही क्यों न
इच्छानुसार सन्तान
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विरेंद्र गुप्तः
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खाने को मिलें, पर वह विदेशी शासन की भुंखलाओं के बीच रहते हुए घी, दूध, और हलुआ-पूरी के सामने श्रेष्ठ है। लार्ड नार्थब्रुक ऐसे शब्द सुनकर चकित हो गया, जबकि भारत की जनता अपने घर में बैठकर भी स्वतंत्रता के शब्द का उच्चारण तो दूर रहा स्मरण भी नहीं कर सकती थी, उस समय देश का यह सन्यासी निर्भय होकर स्वतंत्रता के सच्चे सुख का अनुभव करे। परन्तु उस लार्ड का साहस न हुआ कि वह ऋषि दयानन्द सरस्वती को बन्दी बना सके। क्यों? क्योंकि ऋषि दयानन्द की निर्भयता, सच्ची देश भक्ति और चेहरे के तेज से वह भयभीत हो गया। लोकमान्य तिलक आदि देश भक्तों ने ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा उच्चारित स्वतंत्रता शब्द को अपने रक्त से सींचा और जिसके फलस्वरूप हम आज स्वतंत्र हैं। यही नहीं ऋषि दयानन्द सरस्वती की विद्वत्ता की दुंदुभी भी सारे विश्व-मण्डल में बज गई और अब बज भी रही है, उनका लिखित सत्यार्थप्रकाश संसार की २८ भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है और संसार की शेष सभी भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश का अनुवाद हो रहा है। फ्रांस ने सत्यार्थप्रकाश को तीसरे नम्बर पर मान्यता दी है। अतएव मुझे इतना ही कहना है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य द्वारा ही भारतवर्ष के सारे दुःख और क्लेश दूर हो सकते हैं। संसार के आगे सिर उठाने और गौरव बढ़ाने का साहस तभी हो सकता है कि जब संमस्त भारतवासी ब्रह्मचर्य के पालन करने में पूर्ण ध्यान देंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ अविवाहित होना नहीं है, परन्तु हर प्रकार से कम से कम युवकों को २५ वर्ष और युवतियों को १६ वर्ष तक वीर्य को खण्डित नहीं होने देना और पूर्णरूप से वीर्य की रक्षा करने को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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एषां वै भूतानां पृथिवी रसः |
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पृथिव्या | आपोऽपामोषधय
औषधीनां | पुष्पाणि
पुष्पाणां | फलानि
फलानां | पुरुषः
पुरुषस्य | रेतः ॥
ब्रह्मदर्पणकोपनिषद् ६/४/१
अर्थ- इन भूतों का रस (पंच भौतिक) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पों का रस फल है, फलों का रस (आधार) मनुष्य शरीर है तथा मनुष्य शरीर का रस (सार) शुक्र (वीर्य) है।
रसा इत्कं ततो मांसम्,
मासात्, मेदः प्रजायते।
मेद सोऽस्थि ततो मज्जा,
मज्जाः शुक्रस्य सम्भवः ॥
भावप्रकाश पु- प्र- ६३
अर्थ- (जो मनुष्य अन्नादि खाता है) शरीर में प्रथम उसका रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा (मीग जो हड्डी के अन्दर होती है) और मज्जा से शुक्र (वीर्य) बनता है।
उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वीर्य भोजनादि से किस प्रकार बनता है। एक दिन का खाया हुआ अन्न ४० वें दिन रस रक्त आदि बनता हुआ वीर्य रूप में आता है। एक बार वीर्य के पात में १ तोला वीर्य का क्षय होता है जो १ सेर रक्त का सार होता है। १ सेर रक्त ४० सेर अर्थात् १ मन अन्न जल के भोजन से बनता है। एक मन अन्न ४० दिन में एक मनुष्य खाता है इसका अभिप्राय यह है कि एक बार के वीर्य क्षय होने में ४० दिन के भोजन का सार रस शरीर से निकल जाता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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कामी पुरुषों का यह कहना है कि जब एक बार के भोग में ४० दिन के भोजन से बना यह वीर्य निकल जाता है, तो जब हम नित्य भोग करते हैं तो यह वीर्य कहीं से आता है। वह वीर्य संचित कोष से आता है जो बचपन से २५ वर्ष तक संचित होता रहता है। परन्तु ऐसे पुरुषों का वही हाल होता है, जैसा आयु कम और व्यय अधिक करने वाले का दिवाला निकल जाता है। उसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है।
कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है कच्चे फल तोड़ लेने से फलों का स्वादिष्टपन का आनन्द नहीं मिलता, कच्चा भोजन खाने से रोग उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार अपरिपक्व वीर्यपात से नपुन्मकत्त्व आदि महा भीषण रोग उत्पन्न हो जाते हैं जो मनुष्य को काल के गाल में शीघ्रतया पहुँचाने के लिए सहज साधन का कार्य करते हैं। ऐसी उत्तम वस्तु (वीर्य) को सुरक्षित रखने से जीवन प्राप्त होता है और पतन से मृत्यु।
मरणम् विन्दुपातेन जीवनम् विन्दु धारणम्।
तस्मात् अति प्रयत्नेन कुतृते विन्दु धारणम्॥
अर्थ— वीर्य का पतन मरण है, वीर्य धारण से जीवन, इस लिए अति प्रयत्न से वीर्य बिन्दु को धारण करें और रक्षा करें, उसका व्यर्थ क्षय न होने दें।
इसके अकालपात से मनुष्य केवल ठटरी रह जाता है। ऐसा पुरुष गृहस्थाश्रम का पूर्ण सुख अनुभव नहीं कर सकता। बाल्यवस्था (विद्यार्थी जीवन में) काम वासनाओं में प्रवृत्त हो जाने से युवाकाल में मुख लालिया रहित सौन्दर्य और तेज रहित तथा अशोभनीय लगता है। प्रथम तो ऐसे स्त्री पुरुषों के सन्तान ही नहीं होती, यदि होती भी है तो निर्बल, निस्तेज, मलीन, कुरूप, विद्याहीन, बलहीन, रोगी और निकृष्ट होती है। क्या जिस भारतवर्ष देश के अन्दर तैंतीस करोड़ देवता थे अर्थात् यहाँ का एक-एक नागरिक देवता के नाम से पुकारा जाता था। सारे संसार को विद्या सम्यत्ता
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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