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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

सन्तति निरोध

अर्थ- धनुषारी से चलाया गया वाण एक को भी मारे या न मारे। किन्तु बुद्धिमान से बुद्धि में चुक करने पर बुद्धि राजा के साथ राष्ट्र को भी ध्वस्त कर देती है।

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।

लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा।

न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥

भर्तृहरि नीति शतक ८५

अर्थ- नीति में पारंगत चाहे प्रशंसा करे या निन्दा, धन अपने पास आये या जाय, आज मरे या कल्यान्त में, परन्तु धीर पुरुष न्याय के मार्ग से एक पग भी विचलित नहीं होते।

वृत्तं यत्नैन संरक्षेत, वितभायति याति च।

अक्षीणो वित्ततः क्षीणः, वृत्ततस्तु हतो हतः॥

अर्थ- चरित्र को यत्न से रक्षित करना चाहिये, द्रव्य आता है और जाता है। धन से रहित व्यक्ति क्षीण नहीं होता, चरित्र से हीन व्यक्ति नष्ट हो जाता है।

शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्।

लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजते॥

महाभारत

अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़ कर स्नान करना चाहिये। लाख काम छोड़ कर दान और करोड़ों कार्यों को त्याग कर प्रभु भजन अर्थात् सन्ध्योपासनादि यज्ञकर्म करना।

एकेन तत् समर्ज्यैव, द्वाभ्यां शत गुणं भवेत्।

त्रीभिः शत सहस्रं च, अनन्तं तज्जनैः सह॥

व्याघ्रपाद स्मृति

अर्थ- जो अकेला बैठ कर उपासना करता है उसे एक का फल मिलता है, जो दो मिलकर उपासना करते हैं उन्हें सौ

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

गुना फल मिलता है, जो तीन मिलकर उपासना करते हैं उन्हें हजार गुना फल मिलता है, और जो इससे अधिक मिलकर उपासना करते हैं उनको अनन्त फल मिलता है।

गोलडसटकर साहब पैरिस अर्थात् फ्रांस देश निवासी अपनी (वायविल इन इण्डिया) में लिखते हैं । सब विद्या और भलाई का भण्डार आर्यावर्त देश है। और विद्या तथा मत इस देश से फैले हैं। और परमात्मा की प्रार्थना करते हैं कि हे परमेश्वर ! जैसी उन्नति आर्यावर्त देश की पूर्व काल में थी वैसीही हमारे देश की कीजिये।

जो उन्नति करना चाहो तो 'आर्य समाज' के साथ मिलकर उसके उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार कीजिये नहीं तो कुछ हाथ न लगेगा। क्योंकि हम और आपको अति उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे भी होगा, उसकी उन्नति तन, मन, धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें। इसलिये जैसा आर्य समाज आर्यवर्त देश की उन्नति का कारण है वैसा दूसरा नहीं हो सकता।

सत्यार्थ प्रकाश एकादशसमुल्लास
सब प्रकार से अपनी उन्नति करना चाहो तो आर्य समाज के सत्संगों में अवश्य जाया करो।

★★★

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सन्तति निरोध

वर्तमान समय में कई कारणों से सन्तति निरोध का प्रश्न छिड़ा हुआ है। जो कुछ अंशों में आवश्यक भी जान पड़ता है। मैं इससे पूर्व यह स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ कि यह सन्तति निरोध किस आयु में और कितनी सन्तानों के पश्चात् करना उचित है।

एक दम्पति को अधिक से अधिक ३५ या ४० वर्ष की आयु तक ही सन्तान उत्पन्न करनी चाहिये और अधिक से अधिक ३ बच्चे जिसमें २ पुत्र और एक पुत्री।

आप प्रश्न करेंगे कि, ४० वर्ष की ही आयु तक क्यों सन्तान को जन्म दें, और आगे को क्यों नहीं?

इसका उत्तर यह है कि आज संसार में जो मनोवृत्ति, भाई-भाई, तथा भाई-बहिन के मध्य चल रही है। उस दृष्टि से ३५ या ४० वर्ष तक ही सन्तान को जन्म देना उचित है। हर मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि जब मैं धनोपार्जन करता हूँ तो उससे मैं क्यों ना सुख उठाऊँ? वह यह नहीं चाहता कि यदि उसका पिता मर गया है और उसके २ या ३ और छोटे भाई हैं तो वह अपनी आय से माता तथा भाइयों का पोषण करे। हीं करते भी हैं, परन्तु वह सौ में से १,२ इसलिये कम से कम सन्तान, और कम आयु हीं में सन्तान को जन्म दें, ताकि वह अपने ही सामने पढ़ लिखकर सब के सब अपने पैरों पर खड़े हो सकें, ताकि किसी का भार किसी पर न पड़ सके। मान लीजिये आपने अन्तिम बच्चे को ४० वर्ष की आयु में जन्म दिया और आप

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आश्रम व्यवस्था में पूर्ण आस्था रखते हैं। तो आप ५५ वर्ष की आयु में वानप्रस्थ लेंगे तो उस समय आपका सबसे छोटा बच्चा १५ वर्ष का होगा, जो हर प्रकार अपने को संभाल सकता है और यदि कहीं आपने ४८ या ५० वर्ष की आयु में किसी बच्चे को जन्म दिया तो आप स्वयं ही समझ लें कि उस बच्चे की क्या दशा होगी। मेरे स्वयं देखने में आया है कि पुरुषों ने ६५ वर्ष की आयु में कन्या को जन्म दिया और जन्म देने के पश्चात् उनका स्वास्थ्य इतना थक गया कि वह धनोपार्जन नहीं कर सकते। यह उनका उस कन्या के प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है। ६६ वर्ष के आप हैं कन्या १ वर्ष की है वह किसके आसरे पलेगी, कौन उसे शिक्षा दिलायेगा और कौन उसका विवाह करेगा। आज पुत्र सर्विस कर रहा है और आपको भी कुछ धन दे रहा है, यदि कल को उसके भी २,३ बच्चे हो गये तो वह आपको देगा या अपने परिवार का पोषण करेगा। उस समय आप सोचेंगे कि मैंने काम के वशीभूत होकर यह क्या किया। इसीलिये सन्तान को ४० वर्ष की आयु के पश्चात् कभी जन्म न दें।

आज जो सन्तति निरोध का प्रश्न उठा है वह भारत की निर्धनता, अन्न की कमी या भूमि की कमी के कारण नहीं परन्तु इन इन्द्रियों में लिप्त कामी, विषयी पुरुषों के कारण उठा है। जब भारतवर्ष में सन्तति के सम्बन्ध में पूरा ध्यान रखा जाता था उस समय दस मास बच्चे के गर्भ में रहने के, दस मास बच्चे के दूध पीने के और दस मास स्त्री को अपना स्वास्थ्य ठीक करने के लिये छोड़ते थे अर्थात् २१। वर्ष के पश्चात् जब स्त्री पुरुष पुष्ट होते थे तो दूसरी सन्तान के लिए समागम करते थे।

जो वीर्य २१। वर्ष तक शरीर के मध्य समस्त इन्द्रियों द्वारा तप्त होकर कूटनमय बन जाता था, तब उस वीर्य से जो सन्तान होती थी वह भी अनुपम होती थी।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सन्तति निरोध के लिये ३५ वर्ष की आयु के पश्चात् ही उपाय करना चाहिए। परन्तु आजकल इसका उलटा हो रहा है। और इस कृत्रिम सन्तति निरोध ने व्यभिचार को इतना बढ़ा दिया है कि जिसकी सीमा नहीं रही।

महात्मा गांधी ने एक लेख में लिखा था—

“इन कृत्रिम साधनों से ऐसे-ऐसे कुपरिणाम आये हैं, जिनसे लोग बहुत कम परिचित हैं। स्कूली लड़के और लड़कियों के गुप्त व्यभिचार ने क्या तूफान मचाया है, यह मैं जानता हूँ। मैं जानता हूँ, स्कूलों में कालिजों में ऐसी अविवाहिता जवान लड़कियाँ भी हैं जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कृत्रिम सन्तति निग्रह का साहित्य और मासिक पत्र बड़े चाव से पढ़ती रहती हैं और कृत्रिम साधनों को अपने पास रखती हैं। इन साधनों को विवाहित स्त्रियों तक ही सीमित रखना असम्भव है और विवाह की पवित्रता तो तभी लोप हो जाती है जब कि उसके स्वभाविक परिणाम सन्तानोत्पत्ति को छोड़ कर महज अपनी पाशविक विषय वासना की पूर्ति ही उसका सबसे बड़ा उपयोग मान लिया जाता है।”

इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्यों के हृदय में कृत्रिम सन्तति निग्रह के इस आन्दोलन से पवित्रता के स्थान पर किस प्रकार निम्न कोर्ट की कामुकता का आधिपत्य हो रहा है और किस प्रकार हमारे अपरिपक्व मति बालक और बालिकायें इसके शिकार होकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं।

सन्तति निरोध का सबसे बढ़िया साधन एक मात्र इन्द्रिय संयम है।

हम पिछले पृष्ठों में लिख आये हैं कि स्त्री के मासिक धर्म से १६ दिन तक ही समागम करने पर गर्भ स्थित हो सकता है, इसके पश्चात् नहीं, इसलिये मासिक धर्म के दिन से १८ दिन तक स्त्री समागम न करे। और अन्त में मासिक धर्म प्रारम्भ होने

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वीरेन्द्र गुप्तः

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से २ दिन पूर्व भी रति न करे। ऐसा करने से उस मास में गर्भ स्थित नहीं होगा।

आपके समक्ष कुछ अभूतपूर्व एवं नवीनतम अनुसन्धानात्मक प्राकृतिक गर्भ निरोधक साधनों पर प्रकाश डालते हैं, जो अत्यन्त उपयोगी, सुलभ एवं वान्छित फल के दाता हैं, साथ में स्वास्थ्य पर किञ्चित मात्र भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं होने देते अपितु आंशिक रूप से ब्रह्मचर्य के पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध हैं।

प्रथम साधन- हमने अपने पूर्व के साहित्य में अंकित किया है कि स्वर्गों की साधना द्वारा अपनी इच्छा के अनुरूप पुत्र एवं पुत्री को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि शरीर के साथ-साथ वीर्य पर भी स्वर्गों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

आप सभी जानते हैं कि बिजली को उपयोग में लाने के लिए दो प्रकार के तारों का प्रयोग होता है। 'निगेटिव और पोजिटिव' एक गर्म तार और दूसरा ठण्डा तार। प्रकाश करने अथवा बिजली के यन्त्र को क्रिया में लाने के लिये इन दोनों ही तारों का प्रयोग होता है। यह असम्भव है कि दोनों तार गर्म हों और प्रकाश हो जाये। इसी प्रकार दोनों तार ठण्डे होने पर भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। प्रकाश तो तभी होगा जब एक तार गर्म और दूसरा तार ठण्डा हो।

चुम्बक पत्थर (मैग्नेट) के दो ध्रुव होते हैं। पहला उत्तरी ध्रुव दूसरा दक्षिणी ध्रुव। आप दो चुम्बक पत्थर ले लीजिए, इन दोनों के उत्तरी ध्रुवों को आपस में मिलायें आप देखेंगे की दोनों आपस में मिलने की अपेक्षा दूर भागते हैं। इसी प्रकार दोनों के दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने पर भी दूर भागेंगे। यह दोनों आपस में तब मिलेंगे जब एक के उत्तरी ध्रुव और दूसरे के दक्षिणी ध्रुव को मिलाया जाय तब आप देखेंगे कि वह पीछे भागने की अपेक्षा आपस में दौड़कर मिलेंगे।

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आप ठण्डे पानी में एक ठण्डा ही लोहे का गोला डालकर देखें, कोई भी प्रतिक्रिया नहीं होगी। इसी प्रकार पानी और लोहे के गोले को एक सी ही डिग्री पर गर्म करके मिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी। इसमें प्रत्यक्ष प्रक्रिया तब होगी जब पानी ठण्डा और लोहे का गोला गर्म हो।

इस प्रकार रति के समय स्त्री-पुरुष दोनों के गर्म तार हों तो गर्भ स्थित नहीं होगा और न ही दोनों के ठण्डे तार होने पर गर्भ स्थित होगा। गर्भ स्थित तभी हो सकेगा जब एक का गर्म तार हो और दूसरे का ठण्डा।

वेद में कहा है:-

गन्धर्वो अस्वप्या च योषा सानौ।

नाभिः परम जाभि तन्नी॥

अथर्ववेद १८/१/४ ऋग्वेद १०/१०/४

गन्धर्व अर्थात् पुरुष जलीय परमाणुओं से युक्त हो और स्त्री भी जलमयी हो अर्थात् स्त्री और पुरुष अग्नि और जल के स्वभाव से युक्त न होकर दोनों एक ही प्रकृति के हों तो वही हम दोनों में बड़ा दोष है जो सन्तान उत्पन्न होने में बाधक है।

अब यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य शरीर में गर्म और ठण्डा तार क्या है। शरीर में गर्म और ठण्डा तार नासिका स्वर हैं। नासिका के दायें स्वर चलने को गर्म तार कहते हैं और नासिका के बायें स्वर चलने को ठण्डा तार कहते हैं। रति समय स्त्री-पुरुष दोनों के दायें स्वर चलते हैं तो गर्भ स्थित नहीं होगा। इसी प्रकार रति समय दोनों के बायें स्वर चलते हैं तो भी गर्भ स्थित नहीं होगा गर्भ स्थित उसी अवस्था में होगा, जब रति समय एक का बायाँ और दूसरे का दायाँ स्वर चल रहा हो। आप कहेंगे कि स्त्री-पुरुष दोनों ही प्राकृतिक रूप से गर्म और ठण्डे तार हैं, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक और पुरुषों में घनात्मक विद्युत शक्ति

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वीरेन्द्र गुप्तः

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