इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पुरुष और नारी का अन्तर
स्थिति को रखते हैं।
प्रथम तीन दिन पूर्व मास का सञ्चित आर्तव प्रवाहित होने लगता है।
चौथे दिन से नया आर्तव बनने लगता है। आर्तव के अति न्यून होने के कारण उस दिन की रात्रि में गर्भ स्थित होने पर इससे पुत्र का जन्म तो होगा, परन्तु वह आर्तव न्यून होने के कारण अल्पायु हो सकता है।
पाँचवें दिन की रात्रि में कन्या, छठे दिन की रात्रि में मध्यम आयु का पुत्र जन्म लेता है।
सातवें दिन की रात्रि में स्त्री के आर्तव में प्रजनन क्षमता के तत्व कम होते हैं। इस प्रकार के आर्तव से उत्पन्न कन्या में बन्ध्या दोष बन जाता है।
आठवें दिन की रात्रि में पुत्र, नवें दिन की रात्रि में कन्या, दसवें दिन की रात्रि में चतुर पुत्र उत्पन्न होता है।
११वीं १३वीं रात्रि में स्त्री का आर्तव अत्यन्त उत्तेजक होता है। इन रात्रियों में स्थापित गर्भ से उत्पन्न कन्या का शरीर अत्यन्त उत्तेजक आर्तव से निर्मित होता है। इसी कारण वह उत्पन्न कन्या अत्यन्त कामुक और विषयी हो जाती है। उसे इस प्रकार के पाप कर्म करने से कोई रोक नहीं सकता। ११वीं १३वीं रात्रि में अधिक उत्तेजक आर्तव के कारण स्त्रियों, उस दिन विषय वासना की अधिक इच्छुक होती हैं। इस होने वाली भयंकर हानि को ध्यान में रखते हुये इस दिन सहवास नहीं करना चाहिये।
बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में स्त्री का उत्तेजक और उग्र आर्तव बिलकुल शान्त हो जाता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में उत्तम पुत्र होता है।
१५-१६ रात्रियों में स्थापित गर्भ से संसार को चकित करने वाली दिव्य विभूतियों जन्म लेती हैं। इन दोनों दिनों में स्त्री का आर्तव परिपूर्ण, शुद्ध पवित्र और दोष रहित होता है, इसी कारण
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सन्तान में दिव्यता प्रवेश करती है।
पुत्र की तिथियों में कोई विकार युक्त तिथि नहीं है। वह युवा होकर तामस पूर्ण, उत्तेजक भोजन, साहित्य, संगत आदि के अधिक सेवन से ही अधिक विषयी बन जाता है। उसे केवल भोजन साहित्य और संगत के त्याग से ही नियन्त्रित किया जाता है।
५- यदि अधिक कामुक अथवा विषयी हो तो वर्जित तिथियों में कण्डोम का प्रयोग कर सकते हो। अधिक विषयी होना अच्छा नहीं, इसका दुष्परिणाम ५०वर्ष की आयु के पश्चात् अवश्य ही भुगतना पड़ेगा। शरीर अधिक जरजरित हो जाता है।
६- किसी भी प्रकार के नशे की अवस्था में गर्भ स्थिति हो जाने पर, उससे उत्पन्न सन्तान, किसी भी प्रकार की मानसिक विकृति का किसी भी अवस्था अथवा आयु में शिकार बन सकती है, इसे कोई रोक नहीं सकता। पौरुष शक्ति-वर्धक औषधियों में नशा ही प्रधान होता है।
७- गर्भावस्था में मैथुन और कामुक अथवा उत्तेजक साहित्य का अवलोकन करने से गर्भित सन्तान अधिक कामुक और विषयी हो जाती है। अथवा अच्छा साहित्य पढ़ने से अच्छी सन्तान होती है।
८- महिलाओं के मासिक धर्म के समय पर प्रयोग में आने वाला 'पैड' उत्तम है, स्वच्छ है। यह अवस्था एक अत्यन्त सम्बेदनशील, कोमल, प्रक्रिया की है। इसमें संचित आर्तव का प्रवाह होता है। ऐसी अवस्था में खेलना, कूदना, दौड़ना, साइकिल चलाना आदि कार्य अत्यन्त हानिप्रद हैं। ऐसा करने से आर्तव का साव तीव्र हो जाता है, जो भविष्य में गर्भपात और बन्ध्या दोष का कारण बन सकता है। इस अवस्था में जीन्स या कसी पैंट अथवा कच्चा पहरना भी हानिकारक है। ढीली सलवार, धोती, पेट्टीकोट पहरना ही हितकर है।
९- एक ट्रक ड्राइवर के घर में बच्चे ने जन्म लिया। बच्चे इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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